Exclusive: क्या संकेत दे रही है अमित शाह को कोर्ट की क्लीन चिट
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह पर सोहराबुद्दीन के फेक एंकाउंटर मामले में संलिप्त होने की बात आज सिरे से खारिज हो गई जब मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने सीबीआई की चार्जशीट को खारिज कर अमित शाह को क्लीन चिट दे दी। खास बात यह है कि उन्हें तुलसी प्रजापति केस में भी क्लीन चिट दे दी। यह मामला क्या है, इसने कितने उतार-चढ़ाव देखे और शाह के नाम पर किस तरह की राजनीति हुई यह हम आपको बताने जा रहे हैं इस लेख में।

सबसे पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि सोहराबुद्दीन का एंकाउंटर तब हुआ था, जब अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे। आज उन्हें क्लीन चिट इसलिये दे दी गई, क्योंकि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे।
आज जब फैसला आना था तब सुबह से ही अधिवक्ता अनिरबन रॉयसुबह ने ट्वीट्स की झड़ी लगा दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस डिस्चार्ज पिटीशन की प्रासंगिकता को समझाने की कोशिश की। अंतत: कोर्ट में डिस्चार्ज पिटीशन पर जिरह हुई और अमित शाह को सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति दोनों मामलों से बरी कर दिया गया।
किस तरह किया गया सीबीआई का इस्तेमाल
पिछले कई सालों से जिस तरह अमित शाह पर सोहराबुद्दीन मामले का जिन्न हावी रहा, उससे यह भी पता चल गया कि किस तरह राजनीति के गलियारे में सीबीआई का इस्तेमाल किया जाता है। इतने वर्षों में यह भी उभर कर सामने आ गया है कि देश में पुलिस एंकाउंटरों का भी राजनीतिकरण आसानी से किया जा सकता है। जाहिर है इन सबके पीछे कोई न कोई साजिश तो थी।
सोनिया गांधी और सोहराबुद्दीन केस
जिस तरह सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और यूपीए सरकार ने अपनी राजनीतिक दुश्मनी निभाने के लिये सीबीआई का इस्तेमाल किया, उससे यह सफ है कि सीबीआई यूपीए के लिये एक खिलौने के समान ही थी।
नीती सेंट्रल के लिये लिखने वाले कार्तिकेय तन्ना ने फरवरी 2014 को एक लेख लिखा था, "हाउंडिंग ऑफ अमित शाह"। उस लेख में उन्होंने लिखा कि कभी न खत्म होने वाले आरोप, लीक की गईं चुनिंदा बातें और सनसनीखेज रिर्पोटिंग के बीच सीबीआई इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अमित शाह के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं। इशरत जहां एंकाउंटर में भी अमित शाह के खिलाफ कोई केस नहीं बनता है। उन्होंने लिखा कि आलम तो यह है कि सीबीआई की अदालत आगे चलकर अमित शाह के खिलाफ केस को आगे भी नहीं बढ़ा पायेगी।
कार्तिकेय ने आगे लिखा राजनीति के खिलाड़ियों ने मीडिया और राजनीति के विष्लेशकों के माध्यम से मामले को हलका बाने की कोशिश की लेकिन सच्चाई को झुठला नहीं पाये। विरोधियों ने जिस प्रकार की बातें फैलाईं उन्हें सुनने के बाद ऐसा लगा कि वाकई में वो बातें बहुत ठोस थीं, लेकिन आज जब कोई के समक्ष वकील कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर पाये, तो वो बातें कोई मायने नहीं रखतीं।
कार्तिकेय ने अपने लेख में यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने किस तरह सीबीआई को आड़े हाथों लिया-
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जवाब मांगा और पूछा कि दूसरी एफआईआर दर्ज करने की क्या जरूरत आन पड़ी। ताज़ा चार्जशीट तो पूरी तरह असंवैधानिक थी, जिसे दाखिल कर सीबीआई ने अमित शाह के अधिकारों का हनन किया। उन अधिकारों का जो भारतीय संविधान की धारा 14, 20 और 21 के तहत दर्ज हैं।
इस मामले में किस प्रकार राजनीति हुई यह उसी से साफ होता है कि दबाव में आकर सीबीआई ने अपने मकसद को अंजाम दिया। अमित शाह के खिलाफ जिस तरह सीबीआई ने राजनेताओं के दबाव में काम किया, उससे साफ है कि अब सीबीआई में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है। सीबीआई ने तो नरेंद्र मोदी को भी मामले में खींचने के अथक प्रयास किये थे, लेकिन सफल नहीं हुई। खैर अब सीबीआई को स्वतंत्र संस्थान बनाना बेहद जरूरी है।
इन आपराधिक मामलों के जरिये किस तरह अमित शाह को फंसाने की कोशिशें की गईं, यह इसी से साफ है कि जुलाई में जब वो भाजपा के अध्यक्ष बने तब उन पर विरोधियों ने जमकर जुबानी हमले किये। असल में वो हमले एक प्रकार की भड़ास ही थी।
तब कार्तिकेय तन्ना ने लिखा-
हाल ही में राणा अयूब के कॉलम में अमित शाह पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमित शाह ने सीबीआई कोर्ट के जर्ज का मुंबई ट्रांसफर कराया है, क्योंकि वह जज सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे थे। जब उस कॉलम पर विवाद उठा, तो उन्होंने उसे वापस ले लिया।
इससे साफ था कि जब मोदी के खिलाफ जोर नहीं चल पाया तो राजनीति के चलते लोगों ने शाह को टार्गेट करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय ने अपने लेख में स्पष्ट रूप से बताया कि किस तरह टीवी चैनल और अखबार अमित शाह की छवि को धूमिल करने में जुटे हुए हैं। उन सभी ने फर्जी मुठभेड़ को ही मुद्दा बनाया।
एक रिपोर्ट यह भी आयी कि अमित शाह की जगह सुप्रीम कोर्ट में ललित उपस्थित हुए। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर प्रकाशित की, जिसमें लिखा कि ललित कभी भी अमित शाह के प्रतिनिधि बनकर कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए।
कुल मिलाकर देखा जाये तो आज मुंबई की अदालत के फैसले ने तमाम राजनीतिक प्रयासों को धता बता दिया है। यह भी सीख दी है कि महज खबर छपवा देने से कोई भी खिलाड़ी अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे सकता। न्याय पालिका में आकर दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जाता है।












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