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Elephants are in danger now
कुदरत ने उसे विशालकाय शरीर तोहफे में दिया है, वह हम इंसानों का दोस्त है और हमारे इशारे पर कई सौ किलो वज़न रखने से भी नहीं हिचकता। तमाम जानवरों की तरह वह इंसानों पर तब तक बोझ नहीं बना, जब तक उसके लिए घने जंगल और नहर-तालाब मौज़ूद रहे। आज वह या तो चंद सरकारी वनों में सिसक-सिसककर चिंघाड़ रहा है या फिर किसी मेले-सर्कस में कोड़ों की मार के बदले कर्तब दिखाने को मजबूर है। बात उस हाथी की, जिसे पुराणों ने भगवान गणेश का रूप व इंद्र की सवारी कहा है।

आज वही गजराज दुःखी है, कराह रहा है और अपने हिस्से की ज़मीन और जि़ंदगी के लिए हम इंसानों के 'विकास माॅडल' पर आंसू बहा रहा है। मस्तमौला और मनुष्यों का सहयोगी कहे जाने वाले इस जीव की लुप्त होतीं प्रजातियां, शिकारियों की गोलियों से छलनी जिस्म, और तस्करी के तराजू में रखी देह आज अपने हिस्से का इंसाफ मांग रही है।

2010 में एक क्षेत्रीय मीडिया संस्थान ने उड़ीसा में बड़ी संख्या में हाथियों को खतरा बताया था। बीते दो दशक में यहां लगभग 570 हाथी बिजली करेंट और अवैध शिकार की भेंट चढ़ चुके हैं, जो अपने आप में काफी भयावह आंकड़ा है। हालिया रिपोर्ट कहती है कि 261 हाथियों को शिकारियों ने बेरहमी से निशाना बनाया है, और बाकियों की मौत अन्य संदिग्ध कारणों से हुई है। वन्यजीव कार्यकर्ता बिश्वजीत मोहंती की मानें तो पिछले 20 सालों में हाथियों पर तस्करों का चाबुक लगातार चला है।

इस विशालकाय बेजुवान के अंगों का अच्छे दामों में बिकना इसका बड़ा कारण है। मोहंती ने इन हालातों के लिए जि़म्मेदार संस्थाओं के ढुल-मुल रवैये की भी कड़ी आलोचना की है। कई बार मृत पाये गए हाथियों के क्षत-विक्षत और गायब विशेष अंग जैसे दांत, नाखून इस बात की ओर तुरंत इशारा कर देते है कि उन्हें तस्करी की नीयत से रौंदा गया है।

पश्चिम बंगाल में इसी साल मार्च की शुरुआत में रेलवे लाइन क्राॅस कर रहा एक नर-व्यस्क हाथी तेज़ रफतार ट्रेन से कुचलकर मर गया था, जिस पर सरगर्मी से कोई चर्चा भी नहीं हुई, और मामला कागज़-कलम के बीच ही दम तोड़ गया। अलीपुर द्वार से कुछ किलोमीटर दूरी पर स्थित बक्सा टाइगर रिज़र्व का यह हाथी शहरी आवोहवा से बेखबर शायद भटकता हुआ पटरियों पर आ पहुंचा था। ऐसे कई मामले गाहेबगाहे घटते रहते हैं, और सम्बंधित वनविभाग व पुलिस चैकियों के रजिस्टरों में दर्ज होते रहते हैं, पर अफसोस कि इन समस्याओं के निदान पर न तो वन्य महकमा सक्रिय रहता है और न ही स्थानीय प्रशासन।

प्रकृति से इस जीव को कुछ आदतें विरासत में मिलीं हैं, जैसे हरे-भरे लहलहाते मैदानों में विचरण करना, पेड़ के तनों, खासकर लंबी घास का जमकर आहार लेना। तेज़ी से फैल रहीं विकास की 'बैसाखियों' ने तमाम जीव-जंतुओं समेत हाथियों को भी कोई खास सहारा नहीं दिया। घने जंगलों का सम्राज्य छीनकर हाथी को या तो तमाशबीनों के बीच प्राणि उद्यानों में लाया गया या फिर वे अपनी भरपेट खुराक की मजबूरी में सर्कस-नौटंकी वालों की कठपुतली बन गए।

इन्हीं हाथियेां की एक खूबसूरत प्रजाति जो सिर्फ थाइलेंड जैसे देशों तक सिमट कर रह गई है, जिन्हें हम 'सफेद हाथी' कहते हैं। भारत में वन्यजीव विभाग के हालिया आंकड़ों में कुल 20,000-25,000 हाथी दर्ज हैं, जिन पर भी अब बेहद निगरानी व सतर्कता बरतने की ज़रूरत है। 4-5 टन वजनी व अमूमन 21-22 फीट लंबे इस जानवर को जो लोग बोझ समझते हों, वे इसकी उपयोगिता को एक बार ज़रूर जान लें। हाथी दिन में लगभग 19 घंटे जंगलों में चरता रहता है, और 125 वर्गमील क्षेत्र में घूमते हुए करीब 220 पाउंड गोबर गिराता है, जो कि बीजों व पौधों के विकास के लिए संजीवनी है।

इन्हें झुण्ड में विचरण करना बेहद पसंद हैं। गन्ने के खेत में यदि वे एक बार घुस जाएं, तो बड़ी प्रसन्नचित्त मुद्रा में बाहर निकलते हैं। हाथी दिन में एक ही बार पानी पीते हैं, पर साफ-सुथरा पानी हमेशा उनकी प्राथमिकता रही है। वे न सिर्फ हमसे निःस्वार्थ सहयोग और सम्मान चाहते हैं बल्कि हमारे जंगलों की शान-ओ-शौकत भी इन्हीं से है। एसियन स्पेसीस ऐक्सपर्ट डाॅ. बार्ने लांग कहते हैं ''तेज़ी से बढ़ रही जनसंख्या ने न सिर्फ जंगल काटकर इमारतें खड़ीं कीं हैं, साथ ही साफ पानी के तालाब-नहरों को भी गायब कर दिया है। ''

बड़े से कान वाले इस जीव ने तो, इस धरती पर आ रहे खुद के विनाश के संकेत सुन लिए हैं पर हम अब भी इनकी खुद को बचाने की गुज़ारिश और सहेजने की करुण पुकार नहीं सुन पाये हैं। वन्यजीव सफारी में हाथियों की दशा को वर्तमान स्थिति से और बेहतर करने की ज़रूरत है। हाथी बेहद शांतिप्रिय और मस्तमौला जीव है, जो आज मन ही मन, हमसे संवेदना और सुरक्षा की गुहार लगा रहा है। तस्करों व शिकारियों को वन्यजीव कानून में कड़ी से कड़ी सजा की मांग उठनी चाहिए। संगीन स्थिति में इन्हें सजा-ए-मौत का भी प्रावधान हो, तभी इनमें बेजुबानों को मारने की फितरत खत्म होगी।

सिर्फ सरकार और सियासत के भरोसे इस विशालकाय जीव को छोड़ना निहायत बेईमानी होगी। घने जंगल-ज़मीनों पर रफ्तार से दौड़ रहा आधुनिक औद्योगीकरण का पहिया व वन्य संपदा के अनावश्यक दोहन के बीच ही कोई संतोषजनक रास्ता निकालना होगा, जो हमारे विकास में भी बाधक न हो और इन बेजुबानों के हित में भी। जल्द ही लंबी सूंढ़, उंचा कद, भारी वज़न व बेहद सरल स्वभाव वाले इस गजराज पर यदि 'इंसानी हमले' कम नहीं हुए, तो वह दिन दूर नहीं जब हाथी किस्से कहानियों और तस्वीरों में कैद रह जायेगा और हम एक जीते-जागते, हंसते-खेलते अद्भुत जीव को हमेशा-हमेशा के लिए खो देंगे।

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