55 साल पहले एक आदिवासी बच्ची ने क्या सपना देखा था ? 15वीं राष्ट्रपति की जिगरी दोस्त ने बताया
मयूरभंज (ओडिशा), 22 जुलाई: द्रौपदी मुर्मू का देश की 15वीं राष्ट्रपति के तौर पर चुनाव सिर्फ राजनीतिक गुणा-भाग का मामला नहीं है। यह भारतीय समाज के सबसे वंचित तबके की बहुत ही गरीब परिवार में पैदा हुई एक महिला का सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने का मसला है। यहां तक पहुंचने में उन्हें कितने संघर्ष करने पड़े होंगे, कितना त्याग करना पड़ा होगा, इसे आसानी से कुछ शब्दों में समझना और समझा पाना आसान नहीं है। क्योंकि, आज भी मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा एक पिछड़ा ही इलाका है। लेकिन, फिर भी बिना किसी पारिवारिक विरासत के यहां तक अपने दम पर पहुंचना रिसर्च का विषय है।

द्रौपदी मुर्मू की जिगरी दोस्त ने बताई वह खास बात
63 साल की तापती मंडल तब नहीं समझ पाईं कि अपनी जिगरी दोस्त की जिस बात को 55 साल पहले आई-गई कर दी थी, उस बात में कितना दम था। मंडल भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी टुडू (द्रौपदी मुर्मू) की बचपन की दोस्त हैं। दोनों ने बचपन से गांव के उसी अस्त-व्यस्त टाइप के स्कूल से शिक्षा की शुरुआत की थी। मुर्मू का शुरू से पढ़ाई में लगाव था और वह अपने क्लास में टॉपर थीं। एक बार क्लास में एक इंस्ट्रक्टर ने छात्रों से एक कविता सुनाने को कहा, मुर्मू उसके लिए स्वेच्छा से तैयार बैठी थीं। उनकी दोस्त को पता था कि वह कौन सी कविता सुनाएंगी और क्यों। जो कविता सुनाई गई, उसके बारे में इंस्ट्रक्टर ने बताया कि वह पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पसंदीदा कविता थी। जब मुर्मू ने उसकी आखिरी लाइन सुनाया, 'देअर आर माइल्स टु गो अर्लियर दैन आई स्लीप', तब उनकी दोस्त ने उनसे मजाक में पूछा कि क्या वह पहले पीएम की तरह ही सबसे आगे रहने की तैयारी कर रही हैं? हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मंडल ने कहा है, 'मैं उस दिन को याद करके हंसताी हूं। हो सकता है, तब भी, वह अपने निजी भविष्य की भविष्यवाणी ही कर रही थी।' तब मुर्मू ने अपनी दोस्त की ओर घूम कर कहा था, 'क्यों नहीं ?'

55 साल बाद वह भविष्यवाणी सच हो गई!
55 साल बाद उस आदिवासी तेजस्वी लड़की ने अपने ही सवाल का जवाब ढूंढ़ लिया। 21 जुलाई, 2022 को 64 साल की वही द्रौपदी टुडू या द्रौपदी मुर्मू देश की सबसे युवा राष्ट्रपति बन चुकी हैं। ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव की आबादी करीब 2,500 है और अधिकांश संथाल समाज के लोग रहते हैं। गांव में आज भी प्रकृति मौजूद है और यह शहरों की चकाचौंध से काफी दूर है। ज्यादातर लोगों की आजीविका छोटे-मोटे वन उत्पादों पर ही निर्भर है। एक हेल्थसेंटर है, लेकिन डॉक्टर अनियमित हैं। लिहाजा 25 किलोमीटर दूर रायरंगपुर सब डिविजनल अस्पताल का ही भरोसा रहता है। ऊपर से जंगली हाथियों की चिंता कभी खत्म नहीं होती। 60 साल पहले द्रौपदी मुर्मू जब बड़ी हो रही थीं, तो हालात और भी विपरीत थे।

बहुत ही तंगहाली में बीता बचपन
1971 की जनगणना के मुताबिक मयूरभंज जिले की साक्षरता 12.22% थी। उपरबेड़ा गांव में कोई भी लड़की 10वीं पास नहीं थी। एक तरह से द्रौपदी मुर्मू ने मानो तय किया था कि वह सबमें पहली रहेंगी। बासुदेव बेहरा, जिन्होंने चुनी गईं राष्ट्रपति को पहली से सातवीं तक पढ़ाया, उनका कहना है, 'वह शोध में अच्छी थीं, और उन्होंने जो कुछ भी निर्णय लिया, उसपर अमल किया....मैंने उनसे कहा कि उनमें अपार संभावनाएं हैं, और वह भविष्य में एक इंस्ट्रक्टर बनेंगी।' लेकिन, मुर्मू के लक्ष्य के लिए गांव छोटा था। उनके पिता बिरंची टुडू ग्राम प्रथान थे, लेकिन बाकियों की तरह वे भी सीमांत किसान ही थे। लेकिन, बेटी में पढ़ने का लगन देखकर पिता ने भी अपनी हैसियत के मुताबिक पूरा साथ दिया। वह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए भुवनेश्वर गईं और वहीं कॉलेज की भी पढ़ाई पूरी की। उनकी बुआ सरस्वती टुडू ने बताया कि उनके भाई द्रौपदी मूर्मू को 10 रुपये महीना भेजते थे। इससे ज्यादा न तो वह मांग सकती थीं और ना ही उनके पिता देने में सक्षम थे। वह कैंटीन तक नहीं जा पाती थीं, क्योंकि उनके पास इसके लिए भी पैसे नहीं होते थे।

1979 से जीवन में आने लगा बदलाव
1979 में मुर्मू के जीवन में थोड़ा बदलाव तब शुरू हुआ जब, उन्हें ओडिशा सचिवालय में जूनियर असिस्टेंट की पहली नौकरी मिली। फिर उनकी श्याम चरण मूर्मू के साथ शादी हुई और निजी जीवन में भी बड़े बदलाव आने शुरू हुए और आर्थिक स्थिति में भी प्रगति देखने को मिली। हालांकि, निजी जीवन में उन्हें कई दुखों का भी सामना करना पड़ा। दो बेटों और पति के खोने की टीस उनके जीवन से कभी दूर नहीं हो पाई। उतार-चढ़ाव के बीच जीवन आगे बढ़ता रहा। 1997 में वो रायरंगपुर के जिस अधिसूचित परिषद क्षेत्र में रहती थीं और पली-बढ़ी थीं, वहां के कई वार्ड आदिवासी महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए। पार्टियों को सही उम्मीदवार की तलाश थी और द्रौपदी मुर्मू पर सबकी नजरें टिक गईं। कांग्रेस और तब नई-नई बनी बीजू जनता दल दोनों ने उनसे संपर्क किया। लेकिन, स्थानीय आदिवासी नेताओं के प्रभाव में उन्होंने बीजेपी को चुन लिया। यहीं से स्थानीय राजनीति से शुरुआत करते हुए, वह प्रदेश स्तर पर पहुंचीं। राज्य में कैबिनेट मंत्री रहीं, बीजेपी के संगठन के लिए काम किया और फिर एक दिन झारखंड की पहली आदिवासी और महिला गवर्नर बन गईं।

जश्न में डूबा है उनका गांव
रांची जाने के बावजूद भी उन्होंने अपने क्षेत्र को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया। 2016 में उन्होंने पहाड़पुर में आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय हाई स्कूल का निर्माण करवाया। इसका नाम उन्होंने अपने पति और दोनों बेटों- श्याम, लक्ष्मण, सिपुण के नाम पर एसएलएस रखा। इसी का असर गुरुवार को दिखा। जब दिल्ली में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटों की गिनती चल रही थी तो उनके गांव और पूरे प्रदेश में जश्न का माहौल था। लोग सड़कों पर उतरकर नाच-गा रहे थे। मिठाइयां बांट रहे थे। हालांकि, उनकी बचपन की जिगरी दोस्त तापती मंडल अपनी खुशी का इजहार अलग तरीके से कर रही हैं। वही अपने दो कमरों के घर में ही बैठी रहीं, लेकिन प्रार्थना सिर्फ अपनी दोस्त के लिए करने में मशगूल रहीं। टीवी से उनकी नजर हटनी मुश्किल थी कि कब अपनी बचपन की यार की एक झलक देखने को मिल जाए। उन्होंने कहा, 'सुबह प्रार्थना के बाद, मैंने भगवान से उसकी रक्षा करने का अनुरोध किया, वह जल्दी से अपने घर उपरबेड़ा आ जाए।' वो आगे कहती हैं, 'मैं उसे देखना चाहती हूं। मैं अपनी जिगरी दोस्त से मिलना चाहती हूं, भारत की राष्ट्रपति से।'












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