'FYUP छात्रों के लिए है संजीवनी पर सवाल DU की स्वायत्ता का है'

कॉमर्स स्ट्रीम से आए साहिल एफवाईयूपी को बेहतर मानते हुए उन बातों पर जोर डालते हैं कि परिसर में सिर्फ राजनीति हो रही है। कहा जा रहा है कि तीन साल में जो एक साल जोड़ा जाएगा, उसमें वे सारी बातें शामिल होंगी, जो भारत के अन्य रोजगारपरक कोर्सों में या तो वक्त की कमी के चलते नहीं आ पातीं या छात्रों-शिक्षकों की दिलचस्पी की कमी की वजह से।
आज से नहीं बदली है व्यवस्था-
कोर्सों में सालों का जोड़ घटाना आज से नहीं है यह व्यवस्था 1960 से चली आ रही है। 1970 तक 11+3 से 12+3 का बदलाव आया। इस बदलाव से नौकरी की परिपक्वता बढ़ी साथ ही ज्ञानार्जन के लिए वक्त और साधन मिले। डीयू का यह फैंसला भले ही मोदी सरकार के आने के बाद सक्रिय हुआ हो, पर आज का कॉर्पोरेट सैक्टर इस तरह के कोर्स से बाहर निकले स्टूडेंट के पक्ष में ज्यादा है।
नया DU सिलैबस फाउंडेशन कोर्स के साथ बुनियाद रखने को तैयार है, जिसमें Indian language , information technology, business entrepreneurship , management, communication skills, geography, history, culture, civilisation, environment व public health। इस तरह की बुनियादी सुविधाएं संबंधित छात्रों के कोर्स में जुड़ेंगी।
अराजकता है बाधक-
साहिल ने डीयू घमासान पर बताया कि छात्र यूनियन व छात्रों के बीच ऐसा संवाद नहीं हो पा रहा, जिससे कि प्रतिनिधत्व करते वक्त एबीवीपी या एनएसयूआई साफगोई से छात्रों की बात रख सके। डूटा व डीयू वीसी के बीच का मतभेद राजनैतिक हो सकता है, पर छात्रों का जनमत भी मायने रखता है।
इसलिए काम आएगा FYUP-
इसी क्रम में फाइनल ईयर के दौरान discipline-related skills के एसाइनमेंट होंगे, जिनसे छात्र थयोरिटेकल प्रोसेस को प्रैक्टिकली इंप्लिमेंट कर सकें। यदि इस फैसले का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक रिपोर्टों पर करें तो आंकड़े बताते हैं कि देश-दुनिया के अपराधों में शामिल छात्र, ज्यादातर उस वर्ग से हैं, जो कि पढ़ा लिखा है व नौकरी की तलाश में है। ऐसे में एक साल का जुड़ाव, ना सिर्फ छात्रों को वक्त देगा, साथ ही उनमें ऐसी स्किल्स डिवेलप करेगा, जिनसे उनहें नौकरी मिलने में ही नहीं, बल्कि बनाए रखने में भी मदद मिले।
(जैसा कि DU छात्र साहिल से बातचीत में बताया)












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