क्या दहेज लेने के बाद भी पिता की संपत्ति पर बेटी का अधिकार होता है, जानें क्या कहता है कानून?

शादी के समय दहेज देने पर भी पिता की संपत्ति पर बेटी का अधिकार समाप्त नहीं होगा, बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने 16 मार्च को अपने एक फैसले में कहा।

Bombay High court Dowry

Daughter Right In Father's Property: बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर एक बड़ा निर्णय सुनाया है। अदालत ने तेरेजिन्हा मार्टिन्स डेविड बनाम मिगुएल गार्डा रोसारियो मार्टिन्स मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि शादी के समय दहेज देने के बावजूद बेटी का पिता की संपत्ति में हिस्सा होगा। न्यायमूर्ति एमएस सोनक ने बेटी के हिस्से की संपत्ति को उसकी अनुमति के बिना उसके भाइयों को हस्तांतरित करने के डीड को भी रद्द कर दिया है।

क्या कहा जज ने
न्यायमूर्ति एमएस सोनक ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि बेटियों को कुछ दहेज दिया गया था, इसका मतलब यह नहीं है कि बेटियों का पारिवारिक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं रह जाता है। बेटियों के अधिकारों को उस तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता था जिस तरह से वे पिता की मृत्यु के बाद भाइयों द्वारा किया गया है। अदालत ने कहा कि घर की बेटियों को पर्याप्त दहेज प्रदान करने के बारे में कोई सबूत नहीं है और यह निष्कर्ष निकाला कि बहनों को बाहर करने के लिए भाइयों द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति हड़प ली जा रही थी।

पूरा मामला समझिए
दरअसल, यह मामला चार बहनों -चार भाइयों और मां से जुड़ा है। बड़ी बेटी ने याचिका दायर करके एक डीड का हवाला दिया था। जिसमें बेटी के दिवंगत पिता ने बेटी को संपत्ति का उत्तराधिकार घोषित किया था। इस याचिका में 8 सितंबर, 1990 की एक दूसरी डीड का भी जिक्र किया गया था। इसमें मां ने परिवार की एक दुकान को भाइयों के नाम ट्रांसफर कर दिया था। याचिका में इस डीड को रद्द करने की मांग की गई थी। ये भी मांग की गई थी कि दुकान को उसकी सहमति के बिना भाइयों में ट्रांसफर ना किया जाए।

भाइयों ने दी ये दलील
भाइयों ने दावा किया कि चार बेटियों को उनकी शादियों में पर्याप्त दहेज देकर तय किया गया था। सूट की दुकान पैतृक संपत्ति नहीं थी, बल्कि तीन बेटों और उनके दिवंगत पिता द्वारा बनाई गई साझेदारी फर्म की संपत्ति थी, अदालत को बताया गया था। उन्होंने डीड ऑफ सक्सेशन को चुनौती देते हुए एक काउंटर क्लेम दायर किया। हालांकि अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया।

भाई द्वारा बहनों की संपत्ति छीनने की कोशिश: हाईकोर्ट
रिकॉर्ड पर सबूत से पता चलता है कि बहनों को बाहर करने के लिए संयुक्त परिवार की संपत्ति को भाइयों द्वारा विशेष रूप से छीन लिया गया था। केवल इसलिए कि बहनों में से एक का भाइयों के पक्ष में बयान देने का मतलब यह नहीं है कि पारिवारिक व्यवस्था या मौखिक विभाजन का मामला कानूनी रूप से निपट गया। घर की बेटियों को पर्याप्त दहेज देने के बारे में कोई सबूत नहीं है।

बेटा और बेटी को संपत्ति में हिस्सा को लेकर क्या है कानून
बता दें कि साल 2005 के संशोधन के बाद कानून यह कहता है कि बेटा और बेटी को संपत्ति में बराबर हक मिलना चाहिए। साल 2005 से पहले तक हिंदू परिवारों में बेटे को ही संपत्ति का हकदार माना जाता था। इसलिए पैतृक संपत्ति के मामले में बेटी को बेटे जैसा हक नहीं दिया जाता था।

कानूनी विशेषज्ञ के मुताबिक 20 दिसंबर 2004 से पहले अगर किसी पैतृक संपत्ति का बंटवारा हो गया है तो उसमें लड़की का कानूनी तौर पर भी उस संपत्ति में हक नहीं बनेगा क्योंकि इस मामले में पुराना हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम लागू होगा। यह कानून हिंदू धर्म से जुड़े लोगों के अलावा बौद्ध, सिख और जैन समुदाय के लोगों पर भी लागू होता है।

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