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डार्क वेब: ज़हरीले नशे की स्याह दुनिया, ख़तरे में है कौन?

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    डार्क वेब
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    "डार्क वेब के बारे में पहली बार मुझे 2010 में पता चला था, जब एक फ़िल्म देखी थी. 2014 में अपने बर्थडे पर मैंने सोचा कि कुछ थ्रिल हो जाए. लाइफ़ बहुत बोरिंग हो गई थी और कुछ अलग करना चाहता था. बस उठाया लैपटॉप और ऑर्डर कर दिया. एलएसडी, मेथाफ़ेटामीन, कोकीन, हेरोइन, एमडीएमए, डीएमटी या प्रिस्क्रिप्शन ड्रग; जो चाहिए, सब घर पर डिलीवर हो जाता है."

    तरंग पूरे उत्साह के साथ बता रहे थे कि डार्क वेब कितना 'ईज़ी और एक्साइटिंग' है. वह एलएसडी, कोकीन और हेरोइन वगैरह घर पर सब्ज़ी की तरह डिलीवर होने को एक सुविधा की तरह देखते हैं.

    उन्होंने कहा, "वेबसाइट के डीलर ने हमसे पूछा कि आपको डिलीवरी कैसे चाहिए. उन्होंने ही सजेस्ट किया कि खाने या खिलौने के डिब्बे में ले लो. हमने खिलौने के डिब्बे में लाने को कहा."

    तरंग बताते हैं, "गारंटी कार्ड और रसीद ज़िपलॉक के पाउच में डालकर भेजे गए. डिलीवरी वाले ने न फ़ोन किया, न कुछ पूछा. बस डिलीवरी का टाइम पूछने के लिए एक मेल आया. ठीक तय समय पर नॉक किया और दे दिया सामान. जब तक आया नहीं था, तब तक लग रहा था कि हम लुट गए, कुछ नहीं आने वाला. ऐसा भी डर था कि पुलिस फ़ोन करने वाली है लेकिन जब आ गया तो हमने बार-बार ऑर्डर करना शुरू कर दिया."

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    क्या है डार्क वेब?

    डार्क वेब इंटरनेट का वो कोना है जहां कई सारे ग़ैर क़ानूनी धंधे चलते हैं.

    जो इंटरनेट हम इस्तेमाल करते हैं, वो वेब की दुनिया का बहुत छोटा सा हिस्सा है, जिसे सरफ़ेस वेब कहते हैं. इसके नीचे छिपा हुआ इंटरनेट डीप वेब कहलाता है. एक अनुमान के मुताबिक़, इंटरनेट का तक़रीबन 90 फ़ीसदी नेट छिपा हुआ (डीप वेब) है.

    डीप वेब में वो हर पेज आता है जिसे आम सर्च इंजन ढूंढ नहीं सकते मसलन यूज़र डेटाबेस, स्टेजिंग स्तर की वेबसाइट, पेमेंट गेटवे वगैरह.

    डार्क वेब इसी डीप वेब का वो कोना है जहां हज़ारों वेबसाइट्स गुमनाम रहकर कई तरह के काले बाज़ार चलाती हैं.

    यहां कितनी वेबसाइट, कितने डीलर और खरीदार हैं, इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है.

    पुणे साइबर सेल के डीसीपी सुधीर हीरेमठ के मुताबिक़, "कोई भी दावे से डार्क वेब का आकार या उस पर चल रहे धंधों के स्केल का अंदाज़ा नहीं लगा सकता. लेकिन ऐसी रिपोर्ट आई थी कि जब एफ़बीआई ने 'सिल्क रोड' को पहली दफ़ा बंद किया, तभी इसका कारोबार 120 करोड़ अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया था."

    'सिल्क रोड' डार्क वेब पर चलने वाला बहुत बड़ा नशे का बाज़ार था जिसे एफ़बीआई ने पहली बार 2013 में बंद किया था.

    अगर एक दिन इंटरनेट बंद हो जाए तो!

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    कब शुरू हुआ डार्क वेब?

    डार्क वेब की शुरुआत 1990 के दशक में अमरीकी सेना ने की थी जिससे वे अपनी ख़ुफ़िया जानकारी शेयर कर सके और कोई उन तक पहुँच न पाए. उनकी रणनीति थी कि उनके संदेश भीड़ की बातचीत में छिप जाएं इसके लिए उन्होंने इसे आम जनता के बीच जारी कर दिया.

    डार्क वेब के ज़रिए सायनाइड जैसे ज़हर और ख़तरनाक नशीले सामान की होम डिलीवरी होती है.

    डीसीपी हीरेमठ बताते हैं कि "हर तरह के हथियार और कॉन्ट्रेक्ट किलर्स (भाड़े के क़ातिल) भी मिलते हैं. वसूली करने और मालवेयर भेजने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है."

    उनके मुताबिक़, "भारत में डार्क वेब का इस्तेमाल नशे, चाइल्ड पोर्न और पाइरेसी के लिए सबसे ज़्यादा होता है."

    अलग-अलग देशों में स्थानीय क़ानून और पुलिस की सतर्कता का स्तर अलग-अलग है इसलिए इन ग़ैर-क़ानूनी धंधों का चलन भी देश के हिसाब से बदलता है.

    डार्क वेब जालसाज़ भी इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि इस पर जाली पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और बाक़ी आईडी प्रूफ़ भी मिल सकते हैं.

    डार्क वेब पर किसी भी तरह के ख़ुफ़िया दस्तावेज़ चुराने और सरकारी डेटा में सेंध लगाने की कुव्वत रखने वाले हैकर भी मिल जाते हैं.

    दहशतगर्दों की मौजूदग़ी की ख़बरें भी आती रहती हैं. बताया जाता है कि ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाला संगठन डार्क वेब के ज़रिए चंदा जुटाता है और सूचनाएं शेयर करता है.

    हालांकि पुलिस भारत के संदर्भ में दहशतगर्दी में इसके इस्तेमाल से इंकार करती है.

    बिटकॉइन, डार्क वेब- चरमपंथ का छुपा हुआ बटुआ

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    बहुत मुश्किल है निगरानी

    डीसीपी हीरेमठ के मुताबिक़ "डार्क वेब को एक्सेस करने के लिए ख़ास ब्राउज़र होते हैं जो प्याज़ की तरह लेयर्ड यानी परत-दर-परत सुरक्षित होते हैं."

    आगे समझाते हुए डीसीपी कहते हैं कि "ओपन इंटरनेट और आम सर्च इंजन पर होने वाले कामों पर नज़र रखी जा सकती है. गूगल तो हमें हर जगह ट्रैक करता है लेकिन डार्क वेब की जासूसी करना बेहद मुश्किल है. डार्क वेब इंटरनेट तो इस्तेमाल करता है लेकिन उनके पास ऐसे सॉफ़्टवेयर होते हैं जो कंप्यूटर के आईपी पते को छिपा देते हैं. जिससे ये हमारी नज़र में नहीं आ पाता और हम असली यूज़र तक नहीं पहुंच पाते."

    यानी पुलिस नहीं जान पाती कि डार्क वेब पर कौन कहां बैठकर, क्या बेच या खरीद रहा है, या क्या देख और दिखा रहा है.

    यही वजह है कि पुलिस, अपराधियों का अड्डा बन चुके डार्क वेब पर पूरी तरह रोक नहीं लगा पाती है.

    कैसे करती हैं ख़ुफ़िया एजेंसियाँ जासूसी

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    बिटकॉइन से होता है भुगतान

    डार्क वेब अपने आप में डिजिटल मार्केट की ही तरह है सिवाय इसके कि ये ग़ैर-क़ानूनी है और इस पर मिलने वाली चीज़ों को ख़रीदना और बेचना भी अपराध है.

    अमेज़न, फ़्लिपकार्ट की तरह ग्राहकों को लुभाने और वापस बुलाने के लिए ऑफ़र्स और फ़्रीबीज़ भी दिए जाते हैं - जैसे एक के साथ एक मुफ़्त, कुछ ग्राम ज़्यादा वगैरह.

    इसके अलावा आप वहां मौजूद बाक़ी यूज़र्स के साथ चैट भी कर सकते हैं.

    भुगतान बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी से होता है. क्रिप्टोकरेंसी डिजिटल मुद्रा है जिसमें नोट या सिक्के की जगह डिजिटल कोड मिलता है.

    क्रिप्टोकरेंसी का ट्रैक रखना भी बड़ा मुश्किल है इसलिए ग़ैर क़ानूनी गतिविधियों में इसे धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है.

    कितनी महफ़ूज़ है इंटरनेट की दुनिया

    डार्क वेब, बिटकॉइन
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    युवाओं को क्यों लुभाता है डार्क वेब?

    भारत में सात करोड़ से ज़्यादा लोग नशे की गिरफ़्त में बताए जाते हैं हालाँकि कोई सरकारी आँकड़ा मौजूद नहीं है. 2016 में सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय ने बताया था कि सरकार एम्स के साथ मिलकर एक सर्वे करने जा रही है जिसके आंकड़े 2018 में मिलेंगे.

    डार्क वेब युवाओं को वो तीन चीज़ें देता है जिनकी वो तलाश में रहते हैं - एडवेंचर, एनोनिमिटी और वेराइटी (जोखिम, छिपे रहने की सुविधा और विकल्प).

    मिसाल के लिए, 14 साल की उम्र से नशा कर रहे तरंग को 2014 से पहले भी आसानी से अपनी पसंद का नशा मिल जाता था.

    वे कहते हैं, "ड्रग्स तो स्कूल-कॉलेजों के बाहर बिकता है. बस्तियों में मिलता है. रिक्शा वाले घर दे जाते हैं. यहां तक कि पनवाड़ी भी रोलिंग पेपर रखते हैं." लेकिन उसके बाद भी वो डार्क वेब पर गए क्योंकि ये उन्हें ज़्यादा 'प्राइवेट' और 'थ्रिलिंग' लगा.

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    डार्क वेब पर नशे का कारोबार 2011 के बाद फला-फूला

    'सिल्क रोड' ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई. लेकिन 2013 में एक बार बंद होने के बाद, अगले साल तक इसने फिर पैर जमाने की कोशिश की.

    2014 में इसे फिर एक बार ख़त्म करने में यूरोपोल ने एफ़बीआई की मदद की.

    पिछले साल जुलाई में डच नेशनल पुलिस, एफ़बीआई और डीईए ने डार्क वेब के दो और बड़े बाज़ारों 'हंसा' और 'एल्फ़ाबे' को भी बंद कराने का दावा किया.

    इस टास्कफ़ोर्स के अधिकारियों के मुताबिक़ इन बाज़ारों के डेटाबेस से उन्हें बहुत से डीलर्स और खरीदारों के सुराग मिले लेकिन जानकार इससे बहुत उत्साहित नहीं दिखते.

    उनकी दलील है कि ये पाइरेसी और पोर्न पर बैन लगाने जैसा ही है. दस साइट बंद करो तो बीस और खुल जाती हैं.

    मिसाल के तौर पर डीसीपी हीरेमठ बताते हैं कि 'सिल्क रोड का भी तीसरा वर्शन' आने की बात चल रही है.

    चुनौती कठिन है लेकिन पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां जुटी हुई हैं.

    डीसीपी हीरेमठ बताते हैं, "विदेशी एजेंसियां इन कामों के लिए एजेंट इस्तेमाल करती हैं जो शुरू से लेकर आख़िर तक पूरे काम का हिस्सा बनकर जानकारी जुटाते हैं."

    इस साल 19 फ़रवरी को ब्रिटेन में डार्क वेब पर बच्चों को ब्लैकमेल करके, उनका शोषण करने वाले पीडोफ़ाइल मैथ्यू फ़ॉल्डर को 32 साल की सज़ा सुनाई गई.

    सालों तक चकमा देते रहे शातिर फ़ॉल्डर को पकड़ने में एफ़बीआई, अमरीकी होमलैंड सिक्योरिटी, यूरोपोल के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और इसराइल ने भी ब्रिटेन की मदद की थी.

    कबूतर जा-जा... ड्रग्स देकर आ-आ...

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    भारतीय पुलिस क्या कर रही है?

    हमारे देश में डार्क वेब से निपटने के लिए कोई ख़ास क़ानून नहीं है. ऐसे में पुलिस इसे रोकने के लिए क्या कर रही है?

    अंतरराष्ट्रीय पब्लिक पॉलिसी की जानकार सुबी चतुर्वेदी बताती हैं कि, "हमारी पुलिस के लिए मुश्किल ये है कि क़ानून में ऐसे कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत वो इन क्रिमिनल्स को ट्रेस कर सकें. जो हमारा रेग्यूलर सीआरपीसी या आईटी एक्ट है वो इन पर लग तो जाता है लेकिन बिना ट्रेस करे आप ये नेटवर्क क्रैक कैसे करेंगे. साथ ही हमारे पास कोई स्पेशल यूनिट नहीं है."

    तो फिर हमारी पुलिस डार्क वेब पर काम कैसे करती है, इसके जवाब में डीसीपी हीरेमठ कहते हैं कि "इंफ़्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी की समस्या तो है. लेकिन हम दूसरी एजेंसियों से मदद लेते हैं. साथ ही ह्यूमन इंटेलीजेंस यानी लोगों से मिलने वाले सुराग पर बहुत निर्भर करते हैं."

    लोगों की हिस्सेदारी ना सिर्फ़ इन लोगों को पकड़वाने बल्कि युवाओं को इससे बचाने में भी बेहद अहम है.

    सुबी कहती हैं, "ये बाज़ार अपनी तकनीक और कोड लगातार अपग्रेड करते रहते हैं. ऐसे में सिर्फ़ पुलिस या ख़ुफ़िया एजेंसियां इनका तोड़ नहीं निकाल सकती. समुदाय और पेरेंट्स की भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका है. ये ऐसा काम है जो घर में हो रहा है. आजकल सारे बच्चे इंटरनेट पर हैं, उन्हें अपने माता-पिता से ज़्यादा तकनीकी जानकारी है. इसलिए अभिभावकों को ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है. देखें कि उनके व्यवहार में कोई बदलाव तो नहीं आ रहा. उन्हें सहारा दें."

    ऐसे होती है आपके फ़ोन और लेपटॉप की जासूसी

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    व्हिसल ब्लोअर्स भी इस्तेमाल करते हैं

    डार्क वेब का इस्तेमाल कुछ और कामों के लिए भी किया जाता है.

    अमरीका के व्हिसल ब्लोअर एडवर्ड स्नोडेन ने डार्क वेब पर ही बताया था कि अमरीका की ख़ुफ़िया एजेंसियां किस तरह निगरानी के नाम पर लोगों की निजी जानकारी चुरा रही हैं.

    विकीलीक्स वाले जूलियन असांजे ने भी बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में माना था कि उनके काम में डार्क वेब से बहुत मदद ली.

    मध्य पूर्व और अफ़्रीकी देशों के कुछ कार्यकर्ता भी अपने देश के बारे में बताने के लिए डार्क वेब का इस्तेमाल करते हैं.

    कंपनियों की जासूसी कर रहा है अमरीका- स्नोडेन

    मेरा मक़सद पूरा हुआ- एडवर्ड स्नोडेन

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    English summary
    Dark Web The dark world of poisonous intoxication who is in danger

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