पुलवामा हमला: 'सड़क पर पड़ा खून देखकर सबकी चीखें निकल गई', काफिले में शामिल जवान की आंखों देखी
श्रीनगर। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने देश को झकझोर का रख दिया है। इस फिदायीन हमले में 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए हैं। जिस सीआरपीएफ के काफिले पर हमला हुआ वह गुरुवार सुबह जम्मू से श्रीनगर के लिए रवाना हुआ था। इस काफिले में शामिल एक सीआरपीएफ के जवान ने घटना का आंखों देखा जो मंजर बताया वह रुला देने वाला था। जवान ने बताया कि, पलक झपकते ही बस विस्फोट के बाद गायब हो गई। सीआरपीएफ के सूत्रों ने बताया कि, कई दिनों से हो रही बर्फबारी और अलगावादियों के बांद के चलते नेशनल हाईवे बंद था। जिसके चलते सीआरपीएफ के दो काफिलों के 78 वाहन सड़क पर जाम में फंस गए थे। इसके बाद जब हाईवे खुला तो 2500 से अधिक जवानों के लेकर ये काफिला श्रीनगर की ओर चल पड़ा। लेकिन श्रीनगर से तीस किमी पहले पुलवामा में इस काफिले पर फिदायीन हमला हो गया। जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान मारे गए।

जम्मू से श्रीनगर दो काफिले एक साथ जा रहे थे
हमले के शिकार हुए काफिले के एक सीआरपीएफ जवान ने बताया कि, आमतौर पर काफिले जम्मू से नियमित वाहनों में सुबह जल्दी शुरू होते हैं। इसके बाद काफिले को काजीगुंड में रोका जाता है। आगे के रास्ते में खतरों को देखते हुए यहां पर जवानों को बख्तरबंद वाहनों में शिफ्ट कर दिया जाता है। हालांकि, गुरुवार को भीड़ और जाम से बचने के लिए जम्मू से श्रीनगर दो काफिले एक साथ जा रहे थे। लेकिन इसमें से एक काफिले को बख्तरबंद गाड़ियां मिली, जबकि दूसरे काफिले में बसें थी। हमले की शिकार हुई बस दूसरे काफिले में थी। जोकि पुलवामा के लेथपोरा इलाके में विस्फोटक से भरी एसयूवी की शिकार हो गई। इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए। सीआरपीएफ के इस जवान ने बताया कि, समस्या यह थी कि सात दिनों तक कोई काफिला जम्मू से श्रीनगर नहीं गया गया। जवान छुट्टी के बाद घरों से और अन्य पोस्टिंग से लौट रहे थे। लेकिन वे रास्ता बंद होने के चलते श्रीनगर नहीं जा पा रहे थे।

जम्मू से सुबह 3.30 बजे रवाना हुआ था काफिला
सीआरपीएफ कॉस्टेबल ने बताया कि, जम्मू स्थित सीआरपीएफ के हेडक्वार्टर से कोई काफिला ना जाने के कारण कैंप में 5 से 6 हजार जवान इकट्ठा हो गए। जिसके चलते जम्मू के कैंप में समस्या खड़ी हो गई। इसके बाद ये फैसला लिया गया कि, दो काफिलों को एक साथ श्रीनगर रवाना किया जाएगा। कांस्टेबल के अनुसार, काफिले को जम्मू से सुबह तड़के 3.30 बजे रवाना किया गया था। काफिला लगभग 11 बजे क़ाज़ीगुंड पहुंचा। जवान ने बताया कि, काजीगुंड में, हम हमेशा बख्तरबंद वाहनों में चले जाते हैं।

विस्फोट इतना बड़ा था कि, बख्तरबंद वाहन भी नहीं झेल पाते
जवान ने बताया कि, क्योंकि हम बहुत सारे लोग थे, इसलिए काफिले में कुछ लोगों को ही बख्तरबंद वाहनों में शिफ्ट किया जा सका, बाकि जवानों को नॉर्मल वाहनों में बैठाया गया। इसके बाद दोनों काफिलों को एक साथ आगे बढ़ने के लिए कहा गया था। जवान ने कहा कि, अगर विस्फोटक से भारी एसयूवी ने बख्तरबंद गाड़ी को टक्कर मारी होती तो शायद कुछ लोगों की जान बचाई जा सकती थी। लेकिन वह साधारण बस से जा टकराई। जिसके चलते इतने जवान मारे गए।

विस्फोट के बाद हम अंधे जैसे हो गए
कांस्टेबल के अनुसार, काजीगुंड से निकलने के बाद काफिला दोपहर 3 बजे के करीब लेथपोरा पहुंचा। जब काफिला लेटूमोड पार कर रहा था तभी अचानक एक तेज स्कॉर्पियो राजमार्ग पर आ गई। एक मिनट से भी कम समय में वह दूसरे काफिले की दूसरी बस से जा टकराई। इसके बाद हमें एक तेज रोशनी दिखाई दी, जिसके चलते हम अंधे जैसे हो गए। विस्फोट इतना जोर का था कि हम कुछ समय के लिए कुछ भी सुनने में असमर्थ थे। हमारी पूरी बस हिल गई और खिड़की और शीशे टूट गए। हम इतने सदमे में थे कि हम कम से कम 10 मिनट तक बस में बैठे रहे।

'हमने जो मंजर देखा सबकी चीखें निकल गईं, बस गायब हो चुकी थी'
जवान ने बताया कि, मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। इसके कुछ देर बाद हमें महसूस किया कि, गन से फायरिंग हो रही है। मैं यह दावे के साथ नहीं कह सकता हूं कि, कि जो गोलीबारी हो रही थी वह आतंकी कर रहे थे या हमारे जवान हमले के बाद फायरिंग कर रहे थे। इसके बाद हम लोग अपने वहानों से बाहर निकले और उस जगह की ओर भागे जहां विस्फोट हुआ था। हमने जो मंजर देखा सबकी चीखें निकल गईं। बस गायब हो चुकी थी। चारों ओर खून और शव पड़े हुए थे। हमारे कई साथी मंजर देखकर रो पड़े। जिसमें कई सारे मेरे दोस्त थे।

'हमले के बाद कई जवान सदमे के चलते खाना तक नहीं खा पा रहे हैं'
सीआरपीएफ के कॉस्टेबल ने बताया कि, बस में दो जवान ऐसे भी सवार थे जिन्होंने हाल ही में ट्रेनिंग खत्म की थी। वे पोस्टिंग के लिए श्रीनगर जा रहे थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी यूनिट तक नहीं देखी थी। शाम को काफिला श्रीनगर पहुंचा। साथी जवानों का दुख गुस्से में बदल गया था। जवान ने बताया कि, हमले के बाद उनके कई साथी खाना खाने की हालत में नहीं हैं। कई साथी बदला लेने की मांग कर रहे हैं। कई ऐसे हैं जो गुस्से में हैं। जवान ने कहा कि, बिना किसी लोकल सपोर्ट के कोई भी कार में इतना विस्फोटक नहीं ले जा सकता है।

'सभी जवानों को बख्तरबंद वाहन में ले जाना संभव नहीं था'
सीआरपीएफ अधिकारी का कहना है कि, जब आपके पास इतना बड़ा काफिला हो, तो इतने बख्तरबंद वाहन उपलब्ध कराना संभव नहीं है। साथ ही यह पहली बार नहीं है जब मौसम में गड़बड़ी या कानून-व्यवस्था की स्थिति के चलते इतने दिनों तक आवाजाही को रोका गया हो। सीआरपीएफ के इतने बड़े काफिले को स्थानांतरित करना उनकी मजबूरी थी। काफिले को रवाना करने से पहले सभी एसओपी, जिसमें रोड ओपनिंग एक्सरसाइज और एरिया सेनिटेशन को शामिल किया जाता है का पालन किया जाता है। यह एक अभूतपूर्व हमला था और विस्फोट की तीव्रता को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि, एक बख्तरबंद वाहन अधिक सुरक्षा प्रदान करता।
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