प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर क्यों है डॉक्टरों की अलग-अलग राय?
कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन, रेमडेसिविर के साथ-साथ जिस चीज़ की सबसे ज्यादा माँग रही वह है प्लाज़्मा. सोशल मीडिया पर भी लोग प्लाज़्मा के लिए एसओएस मैसेज शेयर करते रहे. लेकिन सोमवार को इंडियन काउंसिल मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर ने कोविड-19 के इलाज को लेकर जारी की गई गाइडलाइन से प्लाज़्मा थेरेपी को हटा दिया है.
इसका कारण दिया गया कि प्लाज़्मा थेरेपी से मरीज़ को फ़ायदा नहीं पहुँच रहा है, लेकिन मंगलवार को इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) के वित्तीय सचिव ने कहा कि- अगर कोई डॉक्टर प्लाज़्मा थेरेपी का इस्तेमाल करना चाहता है तो बेशक वह मरीज़ की मर्ज़ी के मुताबिक़ कर सकता है.
इस बयान के साथ ये सवाल पैदा होने लगा कि डॉक्टर्स के एक असोसिएशन की राय क्या देश की सबसे बड़ी मेडिकल रिसर्च कॉउंसिल से अलग है?
प्लाज़्मा थेरेपी पर क्या है आईएमए का कहना?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने आईएमए के राष्ट्रीय सचिव डी. जयालाल से बात की.
जयालाल ने बताया कि ''आईएमए, आईसीएमआर की गाइडलाइन और प्लाज़्मा के इस्तेमाल को लिस्ट से हटाने के पूरी तरह पक्ष में है, लेकिन हम ये कहना चाहते हैं कि एक साल से ये थेरेपी इस्तेमाल की जा रही है और अगर किसी डॉक्टर को लगता है कि उसे इस थेरेपी का सहारा लेना चाहिए तो वह ऐसा कर सकता है. देखिए प्लाज़्मा थेरेपी का मक़सद है किसी ऐसे शख़्स जिसमें एंटीबॉडी मौजूद हैं उनमें से एंटीबॉडी मरीज़ को शरीर में पहुँचाना. इसे कई तरह की परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाता है और ये नहीं कहा जा सकता कि प्लाज़्मा थेरेपी का कोई फ़ायदा ही नहीं हुआ है. आईएमए लोगों से यही कह रहा है कि लोग आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक़ इलाज करें, लेकिन मरीज़ और परिवार के लिखित कंसेंट के साथ अगर डॉक्टर को लगता है कि ये थेरेपी मदद कर सकती है तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.''
आईसीएमआर के प्रोटोकॉल को मानने की क़ानूनी बाध्यता किसी भी डॉक्टर या स्वास्थकर्मी के लिए नहीं होती लेकिन ये माना जाता है कि देश के मेडिकल स्टॉफ़ के लोग इस प्रोटोकॉल के तहत ही इलाज करें.
जब क्लिनिकल ट्रायल में प्लाज़्मा थेरेपी को बार-बार इस आधार पर ख़ारिज किया गया है कि इसके कारगर होने के प्रमाण कम है तो क्यों डॉक्टरों को इसके इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में जयालाल कहते हैं कि ''कई ऐसी दवाएं भी हैं जैसे आइवरमैक्टिन और क्लोरोक्वीन, विटमिन सी जैसे कई ड्रग है जिसको लेकर 50 फ़ीसद तक भी प्रमाण नहीं हैं कि इन दवाओं से मरीज़ को आराम मिल रहा है या इलाज में ये दवाएं कारगर हैं लेकिन भारत जैसे देश में जहां ग्रामीण इलाक़ों तक संक्रमण फैल गया है वहां ऐसे मामले सामने आए हैं जहां आइवरमैक्टिन की मदद से कुछ हद तक आराम मिला है.''
''प्लाज़्मा को लेकर जिस तरह की मारा-मारी मची हुई थी उसे देखते हुए भी आईसीएमआर ने ये साफ़ करते हुए इसे हटाया है कि जिस व्यापक स्तर पर इसे इस्तेमाल किया जा रहा है उसे लेकर कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं हैं.''
प्लाज़्मा थेरेपी है क्या?
प्लाज़्मा ख़ून का एक तरल हिस्सा है. कोरोना संक्रमण से जो लोग रिकवर कर चुके हैं उनके शरीर के ख़ून से प्लाज़्मा निकाला जाता है जिसमें वायरस के एंटीबॉडी मौजूद होते हैं.
संक्रमण से ठीक हो चुके व्यक्ति के एंटीबॉडी संक्रमित व्यक्ति के शरीर में डाले जाते हैं. कोरोना के मामले में इस थेरेपी का इस्तेमाल पहली लहर के वक़्त से ही किया जा रहा है. इसके लिए प्लाज़मा डोनर को बीते 28 दिनों तक कोरोना के कोई भी लक्षण ना हों ये ज़रूरी है.
क्यों इस थेरेपी को लेकर शुरू से रहा है विवाद
आईसीएमआर ने प्लाज़्मा थेरेपी को लेकर बीते साल एक स्टडी की थी, जिसका मक़सद इस थेरेपी के कोविड संक्रमित मरीज़ों पर असर को समझना था. इसे PLACID ट्रायल के नाम से जाना जाता है. सितंबर, 2020 को सामने आई इस रिपोर्ट में मेडिकल काउंसिल ने पाया कि प्लाज़मा थेरेपी कोरोना के मामलों को गंभीर होने से रोकने में और लोगों की मौत रोकने में कारगर है.
ये ट्रायल 22 अप्रैल से 14 जुलाई, 2020 के दौरान 464 लोगों पर किया गया था.
इसके बाद आईसीएमआर के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर बलराम भार्गव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि वे प्लाज़्मा थेरेपी को कोविड के इलाज के नेशनल गाइडलाइन से हटाने पर विचार कर रहे हैं.
14 मई को साइंस जरनल लैंसेट की रिपोर्ट सामने आई और इसमें भी कहा गया कि गंभीर रूप से संक्रमित कोरोना मरीज़ों पर प्लाज़्मा थेरेपी 'का कोई असर' नहीं सामने आया है. जिन मरीज़ों को गंभीर संक्रमण के हालात में अस्पताल में भर्ती किया गया उन्हें ये थेरेपी देने पर भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ.
क्यों डॉक्टर्स की बटी हुई है राय?
आईएमए का कहना है कि देश भर में डॉक्टरों को आईसीएमआर के कोविड गाइडलाइन का पालन तो करना चाहिए लेकिन अगर मरीज़ और परिवार की इच्छा हो तो डॉक्टर प्लाज़्मा थेरेपी दे सकते हैं.
प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल के विरोधाभास और कंफ्यूज़न पर सर गंगाराम अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन के वाइस चेयरमैन अतुल कक्कड़ कहते हैं, ''हमने इस थेरेपी का इस्तेमाल किया है, इसका असर कुछ लोगों पर अलग तो कुछ पर अलग रहा है, लेकिन हमने इस थेरेपी के नकारात्मक प्रभाव भी देखें हैं जैसे एलर्जिक इंफ़ेक्शन, वायरल-इंफ़ेक्शन और इसके अलावा हमने सायटोमेग्लो वायरस का मामला भी देखा जिसमें जब व्यक्ति की इम्यूनिटी कम हो जाती है तो शरीर में पहले से मौजूद वायरस सक्रिय हो जाते हैं और नुक़सान पहुँचाने लगते हैं.''
''इसके अलावा आईसीएमआर ने एक बहुत ज़रूरी बात कही है कि जब एक शरीर में एंटी बॉडीज़ डाले जाते हैं तो वायरस ख़ुद को बचाने की कोशिश करता है और उस एंटबॉडी के असर को रोकने के लिए वह शरीर के अंदर म्यूटेट करने लगता है. ऐसे लोग जो ये थेरेपी लेते हैं उनमें वायरस के म्यूटेशन की संभावना बढ़ जाती है.''
दरअसल यूके और अमेरिका की एक स्टडी ने ये पाया था कि प्लाज़मा थेरेपी कोरोना वायरस के म्यूटेशन का बड़ा कारण हो सकती है.
आईसीएमआर के प्रमुख डॉक्टर बलराम भार्गव ने भी इस स्टडी के साथ सहमति जताते हुए कहा था कि प्लाज़्मा जैसे अप्रमाणित थेरेपी के रैंडम इस्तेमाल से वायरस के इम्यून सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है और वह म्यूटेट कर सकता है.
आईसीएमआर गाइडलाइन ये साफ़ करती है कि प्लाज़्मा का इस्तेमाल कोविड के इलाज में नहीं होना चाहिए.
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