कोरोना संकट ने तोड़ा घर ख़रीदने या बेचने का सपना?

निर्माणाधीन इमारतें
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नॉएडा के सेक्टर-118 की निम्मी शर्मा इन दिनों, सुबह-शाम, भारत में कोरोना वायरस के नए मामलों से जुड़ी ख़बरें देखती रहती हैं.

पिछले नौ वर्षों से निजी क्षेत्र में काम करने वाली निम्मी ने इसी साल मार्च महीने में "शादी के अलावा अपनी ज़िंदगी का दूसरा सबसे बड़ा फ़ैसला लिया था".

उन्होंने उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नॉएडा में एक थ्री-बेडरूम फ़्लैट बुक कराया था और उसके लिए बैंक से 33 लाख रुपए का क़र्ज़ भी लिया था.

चूँकि उनका नया, निर्माणाधीन फ़्लैट 44 लाख रुपए का है तो उन्होंने उसके लिए अभी तक की अपनी 11 लाख की जमा-पूँजी भी उसमें झोंक दी थी. साथ ही हर महीने देना है मौजूदा किराए के फ़्लैट का 18 हज़ार महीना भी.

24 मार्च को देश में कोरोना वायरस से बचने के लिए लॉकडाउन की घोषणा होने के चार दिन पहले से ही उनकी और उनके पति की निजी कम्पनी ने दोनों को 'वर्क फ़्राम होम' के लिए कह दिया था.

फिर लॉकडाउन शुरू हुआ और इस दंपति की चिंताएँ भी.

एक तरफ़ जहाँ कम्पनी का काम ठप पड़ा है और सैलेरी में कटौती या नौकरी जाने का ख़तरा सिर पर मँडरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ हज़ारों की ईएमआई और घर के किराए का बोझ भी सता रहा है.

निम्मी शर्मा ने बताया, "हम दोनों यही प्रार्थना करते रहते हैं कि कोरोना के केस बढ़ने बंद हो जाएँ और चीज़ें पहले की तरह नॉर्मल होने लगें. पति-पत्नी में से किसी एक भी नौकरी पर बात आ गई तो क्या करेंगे. होम लोन, किराया, गाड़ी के लोन की क़िस्त कहाँ से देंगे".

भारतीय रियल एस्टेट का हाल

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए भारत में पिछले तीन हफ़्तों से आवश्यक वस्तुओं के अलावा हर तरह का कारोबार और उत्पाद बंद है.

ज़ाहिर है भारत के विशाल रियल एस्टेट सेक्टर में भी, चाहे वो व्यावसायिक हो या घरेलू, हर तरह का काम ठप है.

सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में न तो निर्माण हो सकता है, न बिक्री और न ही ख़रीद-फ़रोख़्त की रजिस्ट्री क्योंकि अधिकांश दफ़्तर भी बंद हैं.

लेकिन भारतीय रियल एस्टेट की मुसीबत सिर्फ़ कोरोना वायरस से शुरू नहीं हुई है.

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जानकारों के मुताबिक़ पिछले दो-तीन साल से गिरावट या लम्बा ठहराव देखते रहे इस सेक्टर का हाल कोरोना के दस्तक देने के पहले से बुरा था.

इंडस्ट्री डाटा के मुताबिक़ भारत के नौ बड़े शहरों में साल 2019 के अक्तूबर से दिसंबर महीनों के बीच घरों की बिक्री में 30% तक की गिरावट देखी गई थी.

वजह थी एक लम्बे समय से अटके हुए हाउसिंग प्रोजेक्ट्स का काम ठप रहना और सैंकड़ों बिल्डरों का ख़ुद को दीवालिया घोषित करना.

रियल एस्टेट कंसलटेंट नाइट&फ़्रैंक के प्रबंध निदेशक ग़ुलाम ज़िया के मुताबिक़, "पिछले पाँच साल से जूझते इस सेक्टर को हाल ही में थोड़ी उम्मीद दिखी थी जब हैदराबाद, बेंगलुरू और दिल्ली के कुछ इलाक़ों में दफ़्तरों और फलैट्स की सेल में थोड़ी बढ़ोतरी आई थी."

उन्होंने कहा, "कोरोना वायरस का आना इस सेक्टर के लिए वैसा ही साबित हुआ है जैसे कि ताबूत में आख़िरी कील गाड़ने वाली कहावत का इस्तेमाल होता है. बड़े से बड़ा डेवेलपर अपनी साइटों पर फँसे लेबर को रख नहीं पा रहा और इस सबका नतीजा होगा बढ़ी हुई क़ीमतें जिसके चलते ख़रीदार कम होते चले जाएँगे".

ग़ुलाम ज़िया
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अगर हाउसिंग या घरेलू सेक्टर की बात की जाए तो अनुमान है कि भारत में फ़िलहाल पाँच लाख से भी ज़्यादा ऐसे फ़लैट्स मौजूद हैं जिनका कोई ख़रीदार नहीं.

इनमें क़रीब 20-30% ऐसे फलैट्स भी हैं जिनमें पिछले कुछ वर्षों से निर्माण भी ठप रहा है.

केंद्र सरकार ने पिछले वर्षों के दौरान होम लोन पर ब्याज दरें कम की थी और ख़रीदारों को टैक्स छूट भी दी थी जिससे हाउसिंग सेक्टर में नई जान फूंकी जा सके.

साथ ही फँसे हुए प्रोजेक्ट्स के लिए 25,000 करोड़ के स्ट्रेस-फ़ंड की घोषणा भी की थी.

इसके बाद से होम लोन ब्याज दरें भी लगातार घटीं हैं और फ़िलहाल 7- 8.5 % की दरें पिछले एक दशक में सबसे कम बताई जा रहीं हैं.

लेकिन इन्हीं वर्षों के बीच भारत के रियल एस्टेट सेक्टर को सरकार के तीन बड़े फ़ैसलों से भी ताल-मेल बैठाने में समय लगा है.

इनमें पहला था, 2017 में लागू किए गए रेरा क़ानून (रियल एस्टेट डेवेलपमेंट एंड रेग्युलेशन एक्ट) के बाद के हालातों से निबटना.

इस क़ानून के तहत बिल्डर को नए प्रोजेक्ट का 70 फ़ीसदी पैसा एक अलग अकाउंट में रखना अनिवार्य हो गया था. सबसे अहम बात थी कि बिल्डर एक प्रोजेक्ट की रक़म दूसरे प्रोजेक्ट के लिए नहीं इस्तेमाल कर सकते थे और नए प्रोजेक्ट शुरू के करने के पहले कई स्तर पर अनुमोदन लेना अनिवार्य हो चुका था.

रियल एस्टेट सेक्टर के सामने दूसरी बड़ी चुनौती आई जीएसटी यानी 'एक देश-एक कर' वाले क़ानून से जिसके तहत "देश को एक बड़ा बाज़ार बनाने में मदद मिलनी थी और भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी पर लगाम लगनी थी".

तीसरा बड़ा फ़ैसला था नोटबंदी जिसका प्रमुख उद्देश्य बाज़ार में काले धन का सफ़ाया बताया गया था.

इस पर तो बहस अभी भी जारी है कि भारत में नोटबंदी लागू करने में सफलता कितनी मिली लेकिन जानकारों का मानना है कि "नोटबंदी का शायद सबसे बड़ा असर रियल एस्टेट में ब्लैक मनी के बेशुमार आदान प्रदान पर हुआ".

गोवा यूनिवर्सिटी के राजनीतिक अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर राहुल त्रिपाठी बताते हैं, "जो ब्लैक मनी अदृश्य बताया जाता था उसके बारे में बिना प्रमाण के कुछ भी कहना कठिन है. लेकिन रियल एस्टेट- कमर्शियल और हाउसिंग- में लगभग सभी को लगता था कि काले धन का बोलबाला बढ़ चुका था जो अब कम दिखता है".

कोरोना के दौर में

तो एक तरफ़ जब ये बात तय सी है कि भारतीय रियल एस्टेट एक बड़ी चुनौती से गुज़र रहा था उसी समय उसे कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन ने अपनी चपेट में ले लिया है.

ज़ाहिर है, ख़रीदार के अलावा प्रोपर्टी बेचने वालों पर भी इसका गम्भीर असर दिख रहा है.

ग्रेटर नॉएडा के रहने वाले प्रोपर्टी डेवेलपर सोनू नागर ज़मीन ख़रीदने के बाद उसके प्लॉट बेचने का काम काफ़ी दिनों से कर रहे हैं. लेकिन कोरोना के चलते लागू हुए लॉकडाउन ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

सोनू नागर

उन्होंने बताया, "दासना, NH-24 से सटे हमारे दो प्रोजेक्ट्स अधूरे पड़े हैं. अस्सी बीघा ज़मीन ख़रीद कर उसमें डेवेलपमेंट कर रहे थे और जिससे ज़मीन ख़रीदी थी उसे 60% पैसे भी दे दिए थे. एक तरफ़ पूरा पेमेंट करने का दबाव है और दूसरी तरफ़ कोरोना लॉकडाउन के बाद ख़रीददार नहीं दिख रहा. पता नही आगे क्या होने वाला है, बचा भुगतान कहाँ से करेंगे".

इंडस्ट्री के जानकार भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कोरोना संकट जैसा दौर रियल एस्टेट ने पहले कभी नही देखा था.

विवेक कौल के मुताबिक़, "अब ये साफ़ हो गया है कि लॉकडाउन 40 दिन तो चलेगा ही. इस दौरान कई लोगों की नौकरियां जाएँगी और तनख़वाहें घटेंगी. मध्यम वर्गीय लोगों का अपना एक घर होने का सपना चकनाचूर होगा क्योंकि पैसे नहीं होंगे तो लोन कहाँ से अदा करेंगे. ये सेक्टर पहले से ही चरमरा रहा था और कोविड-19 एक ऐसा हथौड़ा है जो इसे कुचल के रख देगा".

सरकार ने भी स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए बैंकों से लोगों की ईएमआई आगे खिसकाने और क्रेडिट कार्ड के भुगतान टालने जैसे आदेश जारी किए हैं.

लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि उपभोगताओं को इन सभी चीज़ों का भुगतान आगे चल कर ब्याज के साथ करना ही होगा, इनको माफ़ नहीं किया गया है.

सरकार ने देशभर के उन किराएदारों को भी थोड़ी राहत दी है जिनकी आमदनी लॉकडाउन के दौरान प्रभावित होती है. उनके मकान मालिकों से किराया न लेने का भी सुझाव है.

सवाल ये भी उठता है कि रियल एस्टेट सेक्टर और उसके अंतर्गत आने वाले हाउसिंग सेक्टर में क्या इस तरह की निराशा पहले भी दिखी है.

रियल एस्टेट कंसलटेंट नाइट&फ़्रैंक के प्रबंध निदेशक ग़ुलाम ज़िया बताते हैं, "पिछले सौ वर्षों में ऐसा कभी देखने को नहीं मिला. जबकि 1980 और 1990 के दशक में तो प्रोपर्टी मार्केट अभेद लगने लगा था. इसका नया अवतार क्या होगा, ये तो कोरोना संकट ख़त्म होने के बाद ही दिख सकेगा".

आर्थिक तंगी और लॉकडाउन के बीच रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़ी संस्थाओं ने भी सरकार से अपनी अपीलें बढ़ा दी हैं.

आदिल शेट्टी

इंडियन चेंबर आफ़ कॉमर्स के महानिदेशक राजीव सिंह के अनुसार, "कोविड-19 से पैदा हुई स्थिति में अनुमान यही है कि क़रीब 65% लोग अपने लोन का भुगतान नहीं कर सकेंगे ये वो लोग हैं जिन्होंने घरों या कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में कंस्ट्रक्शन लिंक्ड प्लान (ऐसे लोन जिनकी किस्तें निर्माण कार्य से जुड़ी होती हैं) ले रखे हैं."

ज़ाहिर है, मौजूदा समय में न सिर्फ़ भारत बल्कि सभी देशों के सामने कोरोना महामारी से निबटना सबसे बड़ी प्राथमिकता है.

इस महामारी से निबटने के बाद का मंज़र कैसा होगा, किस सेक्टर और किस इंडस्ट्री पर इसका असर कितना दिखेगा, ये कहना फ़िलहाल थोड़ी जल्दबाज़ी हो सकती है.

लेकिन ये निश्चित है कि रियल एस्टेट सेक्टर पर भी इसके असर गहरे दिखेंगे, ख़ास तौर से हाउसिंग के क्षेत्र में.

बैंकिंग और पर्सनल फ़ाइनैंस एक्सपर्ट आदिल शेट्टी के अनुसार, "रियल एस्टेट सेक्टर जब भी इससे उबरेगा, उसमें प्रमुख भूमिका बजट घरों की ही रहेगी, जो थोड़े सस्ते होंगे. महंगे या प्रीमियम फलैट्स की डिमांड घटना तय है".

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