सवर्ण वोट बैंक पर ही कांग्रेस को क्यों है भरोसा? बिहार और यूपी में यह कैसी मजबूरी

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान अजय राय को मिलने के बाद एक बार फिर से सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस फिर से सवर्ण वोट की राजनीति पर निर्भर होना चाहती है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी रहती है कि कांग्रेस अक्सर उत्तर भारत और पूर्वी भारत में सवर्ण वोट को आकर्षित करने की कोशिश करती है। तो चलिए आज इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे कि कांग्रेस 2024 लोकसबा चुनाव में सवर्ण वोट बैंक को क्यों साधना चाहती है...

दरअसल, यूपी और बिहार में वोटरों के लिहाज से कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है। कांग्रेस, ओबीसी और दलित समाज के बीच अपनी पैठ बिठाने में नाकाम हो रही है। इसलिए वह सवर्ण वोट की तरफ जाती है। दरअसल, इंदिरा और राजीव गांधी के समय भी यूपी और बिहार में कांग्रेस को सबसे ज्यादा वोट सवर्ण लोग ही देते थे। लेकिन, बाद में भारतीय जनता पार्टी के आने के बाद यह ट्रेंड बिल्कुल बदल गया है। भाजपा ने मंदिर और हिंदुत्व का मुद्दा उठाकर 80 फीसदी से अधिक सवर्ण वोटरों को अपने पाले में कर लिया है। नीचे पढ़ें पूरा विश्लेषण...

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ओबीसी-दलित वोटों का कई पार्टियों में बंटवारा, कांग्रेस के हिस्से न के बराबर वोट
दरअसल, यूपी और बिहार में ओबीसी और दलित वोटों का बंटवारा, कई पार्टियों के बीच हो जाता है जिनमें भाजपा को सबसे अधिक, फिर समाजवादी पार्टी इसके बाद बसपा समेत कई अन्य छोटे दल को फायदा मिलता है। कांग्रेस को इस वर्ग से न के बराबर वोट मिलते हैं। इसलिए कांग्रेस को अपने पारंपरिक वोट पर ज्यादा भरोसा लगता है। पंडित नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के नाम पर सवर्ण वोटरों को साधने की कोशिश होती है।

यूपी में भाजपा के नाराज सवर्ण वोटरों को साधने की कोशिश
कांग्रेस पार्टी ने प्रयाग प्रांत के प्रांतीय अध्यक्ष अजय राय को यूपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा से नाराज सवर्ण वोटबैंक को साधने का प्रयास किया है। बता दें कि अजय राय भूमिहार जाति से आते हैं। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा चुनाव 2014 व 2019 में वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध उम्मीदवार बनाया था लेकिन पार्टी को जोरदार झटका लगा था। माना जा रहा है कि राय की पूर्वांचल में बेहतर पकड़ के चलते पार्टी को लोकसभा चुनाव में फायदा हो सकता है। हालांकि, अभी यह देखने वाली बात होगी कि सवर्ण वोटर कितना भरोसा करते हैं।

यूपी ही नहीं बिहार, झारखंड में भी सवर्ण वोटरों पर भरोसा
बता दें कि उत्तर प्रदेश ही नहीं बिहार और झारखंड में भी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सवर्ण ही हैं। दरअसल, बिहार में भी दलित ,ओबीसी, एससी, एसटी वोटों में कई पार्टियों के बीच बटवारा हो जाता है। यहां राजद, जदयू, भाजपा का इन वोटरों पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। कांग्रेस को कुछ वोट तो सहयोगी पार्टी की वजह से मिल जाती है। लेकिन यहां कांग्रेस का कोर और पारंपरिक वोटर्स ब्राह्मण और भूमिहार ही हैं। बिहार में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह हैं जो कि भूमिहार जाति से आते हैं। अखिलेश प्रसाद सिंह बिहार कांग्रेस के कैंपेन समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लालू प्रसाद से मनमुटाव के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

झारखंड में राजेश ठाकुर को मिली है कमान
झारखंड में राजेश ठाकुर को कमान दी गई है। जो खुद एक सवर्ण हैं जिससे यहां भी सवर्ण वोटरों में कांग्रेस सेंधमारी की कोशिश करती है। कांग्रेस को पता है कि अन्य कास्ट के वोट उन्हें सहयोगी दल की सहायता से ही मिलने वाले हैं। इसलिए पारंपरिक सवर्ण वोटरों को साधकर आगे बढ़ने की कोशिश करती है।

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