कांग्रेस ने तेलंगाना में CPI से निभाई यारी, लेकिन CPM से क्यों हुआ मोहभंग?
तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी ने सीपीआई के साथ डील फाइनल कर ली है। पार्टी ने चुनाव पूर्व गठबंधन के तहत सीपीआई के लिए 119 सीटों में से एक सीट छोड़ने का समझौता किया है। लेकिन, सीपीएम के साथ उसका तालमेल नहीं हो सका है।
कांग्रेस और वामपंथी दल के बीच हुए समझौते के तहत सीपीआई सिर्फ कोठागुडम सीट पर चुनाव लड़ेगी और राज्य की अन्य सभी 118 सीटों पर वह कांग्रेस के उम्मीदवारों का समर्थन करेगी। जानकारी के मुताबिक कांग्रेस ने सीपीएम को भी ऐसा ही ऑफर दिया था, लेकिन बात नहीं बनी। लेकिन, दोनों के बीच गठबंधन नही हो पाने की एक और वजह बताई जा रही है।

कांग्रेस-सीपीआई में डील पक्की, सीपीएम से नहीं बनी बात
पहले यह कहा जा रहा था कि अगर मुनुगोडे सीट सीपीआई के लिए छोड़ने को कांग्रेस राजी नहीं हुई तो पार्टी वहां उसके साथ दोस्ताना मुकाबला भी कर सकती है। लेकिन, अब लेफ्ट पार्टी का मन पूरी तरह से कांग्रेस के समर्थन में बदल चुका है और वह यहां से भी कांग्रेस प्रत्याशी के राज गोपाल रेड्डी का समर्थन करने को तैयार हो गई और जहां-जहां सीपीएम उम्मीदावर उतारेगी, वहां पर वह उसका भी विरोध करती नजर आएगी।
जीतने पर सीपीआई को दो एमएलसी सीट देने का भी दिया आश्वासन
तय फॉर्मूले के तहत सीपीआई के प्रदेश सचिव के संबाशिवा राव कोठागुडम सीट से चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, दोनों दलों में एक यह भी करार हुआ है कि अगर तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनती है तो वह सीपीआई के उम्मीदवार के लिए एमएलसी की भी दो सीटें छोड़ेगी।
सीपीएम 14 सीटों पर घोषित कर चुकी है उम्मीदवार
तेलंगाना विधानसभा में इस बार शुरू से यह चर्चा थी कि कांग्रेस पार्टी सीपीएम और सीपीआई के लिए दो-दो सीटें छोड़ेगी। लेकिन, सीपीएम के प्रति कांग्रेस का मोहभंग होता देख, वह अपना अलग रास्ता नापने का फैसला कर चुकी है। कांग्रेस से मिली बेरुखी को देखते हुए सीपीएम ने पहले 14 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं।
सीपीएम को अलग होने का कांग्रेस ने दिया मौका!
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीपीएम के लोगों का कहना है कि पार्टी तेलंगाना में खम्मम के आदिवासी क्षेत्र की सीटों से चुनाव लड़ना चाहती थी, जहां इसका थोड़ा जनाधार भी है। लेकिन, कांग्रेस उन चारों सीटों में से उसके लिए कोई भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी, जिसपर चुनाव लड़ने की उसकी इच्छा थी। सीपीएम, कांग्रेस से पलैर, भद्राचलम, मिरयालगुजा या वायरा जैसी सीटें मांग रही थी। जब कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई तो उसने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।
सीपीएम से कांग्रेस के मोहभंग होने का असली कारण?
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने एक वामपंथी पार्टी के साथ दोस्ती और दूसरे के साथ बैर रखने का जो फैसला किया है, उसके पीछे तेलंगाना आंदोलन है। क्योंकि, सीपीएम ने अलग तेलंगाना राज्य का विरोध किया था। ऐसे में उसके साथ गठबंधन करना पार्टी को नुकसान भी पहुंचा सकता था। जबकि, दूसरी तरफ सीपीआई तेलंगाना के पक्ष में थी और इसका समर्थन किया था। इसीलिए कांग्रेस का इसके साथ गठबंधन करना आसान हो गया।
वैसे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक सोमवार शाम को सोनिया गांधी ने सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी को फोन करके उन्हें सीपीआई की तरह ही समझौते के लिए कहा, ताकि कांग्रेस, सीपीआई और सीपीएम का गठबंधन हो जाए।
हालांकि, 2018 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में भी सीपीआई कांग्रेस की अगुवाई वाले प्रजा कुटमी गठबंधन का हिस्सा थी, जिसमें तब टीडीपी और टीजेएस भी शामिल थी। जबकि, सीपीएम बहुजन लेफ्ट फ्रंट के तहत चुनाव लड़ी थी, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा पार्टियां और संगठन शामिल थे। हालांकि, दोनों ही वामपंथी पार्टियां राज्य में खाता खोलने में भी नाकाम रह गई थीं।












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