CEC-EC की नियुक्तियों वाले नए बिल पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की क्या चिंताएं हैं? जानिए
केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों वाला जो नया विधेयक पेश किया है, उसको लेकर कुछ पूर्व सर्वोच्च चुनाव अधिकारियों को काफी चिंताएं और आशंकाएं हैं।
कुछ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को लगता है कि नया विधेयक चुनाव आयोग के 'नैतिक कद' को कमतर करेगा और 'यह पीछे ले जाने वाला' और 'दुर्भाग्यपूर्ण' विधेयक है। इसकी वजह ये है कि अभी सीईसी और ईसी को सुप्रीम कोर्ट के जज के स्तर का दर्जा प्राप्त है, जबकि नए बिल में इसे देश के कैबिनेट सचिव के समान लाने का प्रावधान है।

चुनाव आयोग के 'कद' को लेकर चिंता
चिंता मुख्य तौर पर 'नैतिक कद' और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को देखते हुए जाहिर की जा रही है। क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट के जज और कैबिनेट सचिव का वेतनमान सुप्रीम कोर्ट के जजों के ही समान है। हालांकि, पूर्व सीईसी एन गोपालस्वामी ने ईटी को बताया है कि चुनाव आयोग टीएन शेषन जैसे दिग्गजों की कसौटी पर काम करता है, इसलिए अगर इस तरह के प्रयास होते भी हैं तो भी चुनाव आयोग का जो एक ऊंचा कद स्थापित है, उसे नहीं छीना जा सकता।
एससी के जज से कैबिनेट सचिव जैसा दर्जा मिलने को लेकर चिंता
उन्होंने कहा, 'ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यह संविधान के अनुच्छेद 324 पर आधारित सीईसी और ईसी को हटाने के प्रावधान के भी विपरीत है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए भी समान प्रक्रिया है। ये वेतन और प्रक्रिया के बीच एक तरह की विसंगति पैदा करता है.......संवैधानिक तौर पर सीईसी-ईसी सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर है..... जबकि अब विधायी तौर पर वह भारत सरकार के शीर्ष सचिव के बराबर होगा।'
'ऐसा होना अकल्पनीय था'
इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि इस तरह की कोशिशों से चुनाव आयोग का जो अपना एक ऊंचा मानक स्थापित है और सभी मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों ने उसे निभाने की कोशिश की है, उसपर कोई असर नहीं पड़ने वाला। लेकिन सभी पूर्व सीईसी इतने आशावादी नहीं दिख रहे हैं। एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसे आयोग के 'नैतिक कद' के लिए झटका बताया है और कहा है कि ऐसा होना 'अकल्पनीय' था।
सीईसी-ईसी की मानसिकता पर चोट-पूर्व सीईसी
एक अन्य पूर्व सीईसी ने उस अखबार से नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहा कि 'यह संकेत की तरह है...सुप्रीम कोर्ट के जज सरकार से पूरी तरह से आजाद हैं और तथ्य ये है कि वह कोर्ट में उनके प्रति जवाबदेह होती है। दूसरी तरफ कैबिनेट सचिव सरकार के प्रति जवाबदेह होता है। इसलिए, सीईसी-ईसी सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर तो कभी नहीं थे, लेकिन सरकार की तुलना में आजादी की भावना के लिए समान होने की स्थिति दी गई। इसे बदलकर, आप एक तरह से सीईसी-ईसी की मानसिकता पर चोट कर रहे हैं और इसे सरकार के अधीन रहने जैसा कार्यकारी पद बना रहे हैं।'
अधिकारियों वाली सब कमेटी लेकर भी सवाल
एक और पूर्व सीईसी ने भी नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि सबसे बड़ी चिंता वह सब कमेटी को लेकर है, जिसे चुनाव आयोग में आयुक्तों की नियुक्तियों के लिए उम्मीदवारों को चुनना है। उनके मुताबिक, 'ये भी चिंताजनक है कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाला सचिवों का एक पैनल उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करेगा। यह एक बाध्यकारी समीकरण बनाता है जो हर स्तर पर अवांछनीय है। यह भी विचारणीय है कि जरूरत पड़ने पर सीईसी अभी शीर्ष सरकारी अधिकारियों को बुला सकता है। बाध्यकारी समीकरण की वजह से यह मुश्किल हो जाएगा.....'
हालांकि, एक अन्य पूर्व सीईसी ने भी गोपालस्वामी वाले विचार का समर्थन करते हुए कहा कि बदलाव से राजनेताओं और सत्ताधारी दल के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर चुनाव आयोग के विश्वास पर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा, लेकिन आखिरकार सबकुछ व्यक्ति पर ही निर्भर करेगा।
उनके मुताबिक,'कुछ हद तक यह प्रभावित कर सकता है, लेकिन आखिर में यह उस व्यक्ति पर निर्भर करेगा जो भारतीय चुनाव आयोग की अगुवाई कर रहा होगा।.......सुकुमार सेन, टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त भी हुए हैं और साथ ही साथ ऐसे भी हुए हैं, जिनके बारे में लगा है कि उन्होंने समझौता किया...'












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