'मुसाफिर हैं हम भी...', बशीर बद्र की लाइन से CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस कृष्ण मुरारी को दी विदाई
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश रहे कृष्ण मुरारी के विदाई समारोह में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने शायराना अंदाज में विदाई दी।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी आज शीर्ष अदालत से सेवानिवृत्त हो गए। इस दौरान उनके सहयोगियों ने विदाई रात्रिभोज कार्यक्रम का आयोजन किया। साथ ही सभागार में आज कविता से भरी एक भावनात्मक शाम रही। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अपने सहयोगी के लिए शायरी के साथ साथी न्यायाधीशों को लुभाया।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने उन्हें एक मूल्यवान मित्र के रूप में जाना है, जिसे वो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उनके कार्यकाल के दौरान से जानते हैं। इसके साथ ही सीजेआई ने लोकप्रिय कवि बशीर बद्र की पंक्ति सुनाते हुए कहा कि "मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी , किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।" निवर्तमान न्यायाधीश के बारे में बात करते हुए, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने याद किया कि कैसे न्यायमूर्ति मुरारी हमेशा शांत रहते थे और कभी अपना आपा नहीं खोते थे।

सीजेआई ने यह भी खुलासा किया कि जब अदालत पेपरलेस हो गई तो जस्टिस मुरारी को शुरुआत में किस तरह संघर्ष करना पड़ा। पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य के तौर पर शिवसेना और दिल्ली सरकार के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान जस्टिस मुरारी को लैपटॉप और आई-पैड का इस्तेमाल करने में झिझक हुई। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा ने तब उनकी मदद की, जिसके बाद वो उपकरणों के साथ सहज पाए।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने एक और शायरी के साथ अपना भाषण समाप्त किया "आपके साथ कुछ लम्हे काई यादें बतौर इनाम मिले, एक सफर पर निकले और तुझ्बे तमाम मिले (तुम्हारे साथ कुछ पल मिले, और यादें बहुत सारी, इनाम के तौर पर हम सफर पर निकले और बहुत सारे अनुभव मिले)।
न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी ने कहा कि वो भाग्यशाली हैं कि डीवाई चंद्रचूड़ दो बार मुख्य न्यायाधीश रहे- एक बार इलाहाबाद में और फिर उच्चतम न्यायालय में। उन्होंने अपने सहयोगियों के प्रति उदारता के लिए सीजेआई को धन्यवाद दिया।
न्यायमूर्ति मुरारी ने तब खुलासा किया कि वह न्यायिक क्लर्कों से आई-पैड के लिए मदद मांगते रहे और जब तक उन्हें पता नहीं चला तब तक ऐसा करते रहे। उन्होंने कहा, "मैं प्रौद्योगिकी के साथ जुड़ने का अवसर देने के लिए सीजेआई को धन्यवाद देता हूं, जिसके बिना काम करना मुश्किल है।"
उन्होंने आगे कहा कि "ये अदालत न केवल बहुसांस्कृतिक लोकाचार का संरक्षक है, यह अदालत विविधता का भी प्रतीक है। इस अदालत में कई भौगोलिक क्षेत्रों के लोग शामिल हैं, जो सभी धर्मों, जातियों, पंथों और राष्ट्र की बहुलता और सच्चे सार को दर्शाते हैं।"
जस्टिस मुरारी ने शायराना अंदाज में कहा कि कदम उठे भी नहीं और सफर तमाम हुआ, गजब है राह का इतना भी मुख्तसर होना'' (एक कदम भी नहीं उठाया और सफर खत्म हो गया, यह आश्चर्यजनक है कि रास्ता कैसे छोटा हो गया )।"












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