'लिव-इन, समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी एक्ट की अनुमति नहीं दी जा सकती', केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में जवाब
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि लिव-इन पार्टनर और समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी कानून की इजाजत नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने सरोगेसी एक्ट के कई प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल किया। जिसमें केंद्र ने लिव-इन कपल और समलैंगिक जोड़े (same sex couples) को सरोगेसी एक्ट के दायरे में लाने का विरोध किया। केंद्र ने कहा कि इनको सरोगेसी कानून के तहत सेवाओं का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
इस मामले में केंद्र ने एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया है। सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि 19 जनवरी को हुई राष्ट्रीय बोर्ड के विशेषज्ञ सदस्यों की बैठक में राय थी कि अधिनियम (एस) के तहत परिभाषित "युगल" की परिभाषा सही है और समान-लिंग वाले जोड़ों और लिव-इन पार्टनर्स को इस कानून के तहत अनुमति नहीं दी जा सकती है।
केंद्र ने अतिरिक्त हलफनामे में कहा कि लिव इन जोड़े या समलैंगिक जोड़े किसी कानून से बंधे नहीं होते हैं। ऐसे में इन मामलों में सरोगेसी के जरिए पैदा हुए बच्चे का भविष्य और सुरक्षा हमेशा सवालों के घेरे में रहेगी। केंद्र ने अपना जवाब सरोगेसी अधिनियम, 2021 और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2021 की शक्तियों को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में केंद्र की ओर से दलीलें दी कि समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी एक्ट में दायरे में लाना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे इस कानून के दुरुपयोग को बढ़ावा मिलेगा। और भविष्य में ऐसे बच्चे के सुरक्षा को लेकर आशंका हमेशा बनी रहेगी।
केंद्र ने अकेली और अविवाहित महिला को सरोगेसी एक्ट से बाहर रखने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए बताया कि अभी सिर्फ दो ही कंडीशन में अकेली महिला को सरोगेसी की इजाजत है, जिसमें पहला महिला विधवा हो और समाज के डर से खुद बच्चा न पैदा करना चाहती हो या फिर दूसरा तलाकशुदा हो और वो दोबारा शादी नहीं करना चाहती, और बच्चा पालने की इच्छा रखती हो। कानून के तहत महिला की उम्र 35 साल से ज्यादा होनी चाहिए।












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