नरेंद्र मोदी को पटखनी देने के लिए क्या फिर हाथ मिला सकते हैं नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर?

नीतीश कुमार
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नीतीश कुमार

बिहार में इस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मुलाक़ात को लेकर चर्चा गर्म है.

नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर दोनों ने ख़ुद इस बात की पुष्टि कर दी है कि उन दोनों की मुलाक़ात हुई है.

मीडिया से बातचीत के दौरान नीतीश कुमार ने कहा कि उनके पूर्व सहयोगी पवन वर्मा उनसे मिलने के लिए उनके घर आए थे और पवन वर्मा के ही साथ प्रशांत किशोर भी आए थे.

नीतीश ने कहा कि प्रशांत किशोर से कोई ख़ास बातचीत नहीं हुई और किसी से मिलने में आख़िर क्या दिक़्कत़ है. नीतीश ने कहा कि प्रशांत किशोर से तो उनके बहुत पुराने संबंध हैं.

लेकिन पत्रकारों ने जब नीतीश से यह पूछा कि क्या आप चाहते हैं कि वो आपके साथ आ जाएँ, तो नीतीश ने कहा कि यह आप उन्हीं से पूछ लीजिए.

प्रशांत किशोर के अभियान 'जन सुराज' की तरफ़ से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मुलाक़ात की पुष्टि की गई है. उन्होंने इसे सामाजिक शिष्टाचार मुलाक़ात क़रार दिया.

बयान में प्रशांत किशोर ने कहा, "नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, मैं मई से बिहार में काम कर रहा हूँ. तब से कई बार मिलने की बात हुई, लेकिन नहीं मिल पाए थे. इसलिए शिष्टाचार के नाते उनसे मुलाक़ात हुई है."

प्रशांत किशोर दो अक्तूबर से बिहार में पदयात्रा करने वाले हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने जो रास्ते चुने हैं, वो उस पर क़ायम हैं और वो उनसे पीछे नहीं हटेंगे.

लेकिन प्रशांत ने इतना ज़रूर कहा कि अगर नीतीश कुमार एक साल में 10 लाख लोगों को नौकरी देने का अपना वादा पूरा कर देते हैं, तो ही फिर कुछ बात हो सकती है.

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि प्रशांत किशोर ने 2015 में नीतीश कुमार के साथ काम करना शुरू किया था और नीतीश-लालू के गठबंधन ने 2015 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी को हराकर शानदार जीत हासिल की थी.

बाद में प्रशांत किशोर जद-यू में शामिल हो गए थे और उन्हें नीतीश कुमार ने पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया था. एक समय ऐसा भी था जब उन्हें नीतीश के बाद पार्टी का सबसे शक्तिशाली नेता और नीतीश के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा था.

लेकिन फिर नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर में कुछ मुद्दों पर मतभेद होने लगे और आख़िरकार प्रशांत किशोर को पार्टी से बर्ख़ास्त कर दिया गया था.

अब एक बार फिर नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की मुलाक़ात हुई है. भले ही दोनों इसे एक शिष्टाचार के तहत हुई मुलाक़ात कह रहे हैं, लेकिन राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं और जो कहा जाता है अक्सर उसके विपरीत चीज़ें होती हैं.

इसीलिए नीतीश और प्रशांत किशोर की इस ताज़ा मुलाक़ात के बाद अब सवाल उठना लाज़िमी है कि इस मुलाक़ात के राजनीतिक मायने क्या हैं और क्या एक बार फिर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के लिए काम कर सकते हैं.

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नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार
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नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार

'मुलाक़ात की कड़ियाँ 2024 के चुनाव से जुड़ती हैं'


प्रभात ख़बर अख़बार के संपादक अजय कुमार बीबीसी के साथ बातचीत में कहते हैं कि नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की मुलाक़ात की कड़ियाँ 2024 के लोकसभा चुनाव से जुड़ती हैं.

नीतीश कुमार कह चुके हैं कि वो 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के ख़िलाफ़ सभी विपक्षी पार्टियों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने की कोशिश करेंगे.

नीतीश का हालिया दिल्ली दौरा इस बात का सबूत है जब उन्होंने कांग्रेस के राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत लगभग सभी पार्टियों के नेताओं से मुलाक़ात की.

अजय कुमार के अनुसार, विपक्ष के किसी भी संभावित गठजोड़ में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रोल क्या होगा, इसको लेकर अभी भी स्थिति बहुत साफ़ नहीं है.

एक समय बीजेपी के गठबंधन में शामिल रहने वाली ममता बनर्जी इस समय ख़ुद को बीजेपी और ख़ासकर नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक विरोधी के तौर पर पेश कर रही हैं. लेकिन किसी भी विपक्षी गठबंधन में उनकी अपनी क्या भूमिका होगी यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है.

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ममता की भूमिका


अजय कुमार के अनुसार, यहाँ पर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के लिए बड़े मददगार हो सकते हैं.

अजय कुमार कहते हैं, "नीतीश कुमार की मुहिम में ममता बनर्जी जुड़ेंगी या नहीं. प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के साथ काम कर चुके हैं. इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में जो छोटी-छोटी पार्टियाँ हैं, उनको नीतीश कुमार के साथ जोड़ने में प्रशांत किशोर की बड़ी भूमिका हो सकती है."

बिहार की राजनीति पर बारीक नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा प्रशांत किशोर की इसी ख़ासियत का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि ''प्रशांत किशोर अब तक देश के 11 मुख्यमंत्रियों के साथ काम कर चुके हैं और कुछ एक को छोड़ दिया जाए तो उनकी सफलता का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा है.''

नलिन वर्मा के अनुसार नीतीश कुमार इस देश के एक बड़े क्षेत्रीय नेता हैं और उनके राजनीतिक वजूद को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. नलिन वर्मा के अनुसार देश की सभी विपक्षी पार्टियों के बीच कई मुद्दों पर आपसी मतभेद ज़रूर हैं, लेकिन सभी पार्टियाँ चाहती हैं कि बीजेपी को हराया जाए.

नलिन वर्मा कहते हैं, "अगर विपक्षी पार्टियाँ वाक़ई बीजेपी को हराना चाहती हैं तो उन्हें अपने आपसी मतभेद को हटाकर एक होने का रास्ता बनाना होगा, अभी भी आम चुनाव में क़रीब पौने दो साल बाक़ी है. ऐसे में प्रशांत किशोर की भूमिका अहम हो सकती है क्योंकि वो एक सफल चुनावी रणनीतिकार हैं. राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं से उनके संबंध और राष्ट्रीय राजनीति की उनकी समझ बहुत गंभीर है. आधुनिक राजनीतिक मैनेजमेंट करने वालों में भारत में फ़िलहाल उनके बराबर का कोई दिखाई नहीं पड़ता है."

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प्रशांत किशोर
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प्रशांत किशोर

एक-दूसरे पर बयानबाज़ी


प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीतिक कौशल पर अगर शक नहीं भी किया जाए तो हाल के दिनों या महीनों में नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर जिस तरह से एक-दूसरे पर बयानबाज़ी करते आएँ हैं, उसके बाद क्या उनके लिए फिर एक बार साथ मिलकर काम करना आसान होगा?

पिछले हफ़्ते नीतीश कुमार दिल्ली में थे और उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि प्रशांत किशोर को बिहार में विकास के बारे में कुछ भी पता नहीं है. वो बेकार की बातें करते रहते हैं. नीतीश ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो बीजेपी को मदद पहुँचाने के लिए यह सब कह रहे हैं.

प्रशांत किशोर ने भी नीतीश कुमार पर हमले करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के लिए फ़ेविकोल का ब्रैंड एम्बेसेडर जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं. बिहार में विकास के नीतीश कुमार के सभी दावों को भी वो खोखला क़रार देते रहे हैं.

लेकिन नलिन वर्मा राजनीति में इस तरह की बयानबाज़ी को ज़्यादा अहमियत नहीं देते हैं. वो कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केवल दो-तीन महीने पहले कहा था कि इस देश में जयप्रकाश नारायण और लोहिया के बाद अगर कोई सच्चा समाजवादी नेता है तो वो नीतीश कुमार हैं. अब बीजेपी के नेता नीतीश कुमार को क्या नहीं बोल रहे हैं."

उनके अनुसार, एक-दो महीने पहले तक तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार भी एक-दूसरे को क्या नहीं कह रहे थे.

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क्या राजनीतिक माहौल बदल रहा है?


अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार
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अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुरूर अहमद कहते हैं कि नीतीश कुमार से मिलकर और 10 लाख की नौकरी का ज़िक्र करके प्रशांत किशोर ने एक संकेत दिया है कि वो नीतीश कुमार के साथ मिलकर दोबारा काम कर सकते हैं.

सुरूर अहमद इसे जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह के पार्टी छोड़ने से भी जोड़कर देखते हैं.

सुरूर अहमद कहते हैं, "प्रशांत किशोर का आरसीपी से समीकरण बहुत ही ख़राब था. अब जब आरसीपी पार्टी से बाहर हैं तो प्रशांत किशोर पार्टी में दोबारा शामिल हो सकते हैं. प्रशांत किशोर को शायद इस बात का अंदाज़ा हो गया है कि उनकी संभावित पदयात्रा उतनी कामयाब नहीं होगी, इसलिए उन्हें यह बात सूट कर रही है कि वो नीतीश के साथ दोबारा काम करें. प्रशांत किशोर भले ही एक सफल चुनावी रणनीतिकार कहे जाते हों, लेकिन वो उन्हीं जगहों पर ज़्यादा कामयाब हुए हैं, जहाँ पर पहले से माहौल उस पार्टी के पक्ष में था. प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय स्तर पर बदले हुए राजनीतिक माहौल का कुछ अंदाज़ा हो रहा है.''

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2004 में वाजपेयी की हार


तो क्या 2024 के आम चुनाव में बीजेपी 2014 की तुलना में कमज़ोर होती हुई दिख रही है, इस सवाल के जवाब में सुरूर अहमद कहते हैं, "2004 के चुनाव में वाजपेयी बहुत ही मज़बूत दावेदार लग रहे थे, लेकिन जब चुनाव हुए तो राज्यों के स्तर पर कांग्रेस ने जो गठबंधन किया था उसी के कारण बीजेपी की हार हुई थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी राज्यों में किस तरह विपक्षी गठबंधन होता है उस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा."

सुरूर अहमद के अनुसार, अगर नीतीश कुमार विपक्ष का चेहरा होते हैं, तो कुर्मी-कोइरी वोटों पर बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश और गुजरात में असर पड़ सकता है.

लेकिन अगर प्रशांत किशोर एक बार फिर नीतीश कुमार के साथ आते हैं तो क्या उनकी हैसियत पार्टी में पहली जैसी होगी, इस पर नलिन वर्मा कहते हैं कि इस समय दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है.

नलिन वर्मा कहते हैं, "प्रशांत किशोर फ़िलहाल एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन अगर वो चुनावी रणनीतिकार के अपने पुराने रूप में वापस लौटते हैं तो उन्हें भी एक नेता की ज़रूरत है. उन्हें कोई ममता, कोई राहुल या कोई नीतीश चाहिए जिन्हें वो आगे रखकर अपना काम कर सकें. उसी तरह आधुनिक दौर की बदली हुई राजनीति में किसी जननेता को भी एक चुनावी रणनीतिकार की ज़रूरत है. इसलिए दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है और प्रशांत किशोर अगर साथ आते हैं तो किसी अहम भूमिका में ही रहेंगे."

प्रशांत किशोर और नीतीश कुमार दोबारा साथ आएंगे या नहीं अभी यह नहीं कहा जा सकता है, लेकिन दो अक्तूबर को इस बारे में कुछ अंदाज़ा हो सकता है जब प्रशांत किशोर अपनी पदयात्रा शुरू करेंगे, तब देखना होगा कि उस समय नीतीश कुमार के लिए वो किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

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