भाजपा-शिवसेना में तकरार, खून बढ़ा कांग्रेस-एनसीपी का
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जिस तरह से लड़ रहे हैं,उससे उनके सियासी दुश्मन जरूर आनंद में होंगे। अगर यह क्रम जारी रहा तो यह महाराष्ट्र में अपनी लगभग तयशुदा जीत को हार में बदलने में कामयाब होंगे।

कांग्रेस-राकांपा गठबंधन सरकार के पंद्रह साल के कुशासन के प्रति लोगों में इतनी नाराजी है कि भाजपा-शिवसेना को इसका लाभ लेना चाहिए। कई राजनीतिक विश्लेषकों का तो यह भी मत है कि यदि भाजपा और शिवसेना का अलगाव भी हो जाता है और दोनों पृथक रूप से चुनाव लड़ते हैं, तब भी सत्तारूढ़ गठबंधन बहुमत हासिल करने में कामयाब नहीं हो सकेगा।
वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक अजय बोस कहते हैं कि भाजपा और शिवसेना के बीच जारी तनातनी से उनके सामने हार का खतरा भले ही न हो, लेकिन इससे इस बात का संकेत जरूर मिलता है कि चुनावों के बाद सरकार बनाने और उसे चलाने में किस तरह की दिक्कतें पेश आने वाली हैं। जब चुनावों से पहले ही ये हाल हैं तो कल्पना ही की जा सकती है कि चुनाव जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री चुनने, मंत्रिपरिषद के मंत्रियों के नाम तय करने और मिलकर सरकार चलाने को लेकर किस तरह के घमासान की स्थिति निर्मित हो सकती है।
भाजपा और शिवसेना की उजली संभावनाओं के बावजूद उनके बीच हो रही खटपट के अनेक कारण हैं। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना दोनों के ही पास मजबूत नेतृत्व और ताकतवर संगठन का अभाव है। उद्धव ठाकरे के रूप में शिवसेना के पास एक निर्विवाद नेता जरूर है, लेकिन उद्धव अपने पिता बालासाहेब ठाकरे की छाया भी नहीं हैं, जिन्होंने अपने दबंग नेतृत्व के जरिए दशकों तक शिवसेना की बागडोर संभाले रखी थी। उद्धव की सेहत भी उनका साथ नहीं दे रही है।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो महाराष्ट्र में पार्टी अनेक धड़ों में बंटी हुई है। इनमें फिलवक्त नितिन गडकरी सबसे कद्दावर नेता हैं, लेकिन माना जाता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पसंदीदा व्यक्तियों में शुमार नहीं हैं।
शिवसेना के अंगूठे के नीचे काम करे
भाजपा को यह कभी नहीं ठीक लगा कि महाराष्ट्र में वह शिवसेना के अंगूठे के नीचे काम करे। बालासाहेब ठाकरे के जीते जी तो वह कुछ कर नहीं सकती थी, लेकिन अब वह शिवसेना के प्रभाव से बाहर निकलने की भरसक कोशिश करती नजर आ रही है। यही कारण है कि भाजपा शिवसेना जितनी ही सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर अड़ी हुई है। वह यह भी चाहती है कि मुख्यमंत्री का पद उसकी झोली में आए।
भाजपा में आज भी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे परिपक्व और मंजे हुए नेता होते तो महाराष्ट्र में निर्मित हो रही परिस्थितियों का बड़ी आसानी से हल खोजा जा सकता था। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मौजूदा जोड़ी के पास यह हुनर नहीं है कि वे रूठे हुए सहयोगियों को मना सकें।
दूसरी तरफ शिवसेना भाजपा की बढ़ती महत्वाकांक्षा से सतर्क हो गई है। उद्धव ठाकरे और उनके साथी भरसक कोशिश कर रहे हैं कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने राज्य में हमेशा अपने से नीचे रखा, कहीं वह उससे बड़ी न हो जाए और कहीं इसका फायदा उठाकर राज ठाकरे की मनसे भी उस पर बढ़त न बना ले।












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