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कभी कांग्रेस के गढ़ रहे दक्षिण के एक और राज्य में मजबूत हो रही है भाजपा

By आर एस शुक्ल
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नई दिल्ली। कहते हैं जब बुरे दिन आते हैं, तो सब कुछ खराब ही होता जाता है और अच्छे दिन आते हैं, तो सब कुछ अपने आप बनने लगता है। आंध्रप्रदेश से अलग होकर बने राज्य तेलंगाना में कांग्रेस और भाजपा के साथ यही होता लग रहा है। इसके लक्षणों में हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों को देखा जा सकता है। कभी आंध्रप्रदेश कांग्रेस का गढ़ रहा है और वहां उसकी सरकारें बनती रही हैं। अब वह दोनों ही राज्यों आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में न केवल सत्ता से बाहर है बल्कि दोनों ही राज्यों में लगातार कमजोर होती जा रही है। तेलंगाना में तो उसे बड़ा करारा झटका लगा है जब उसके 18 विधायकों में से 12 ने सत्तारूढ़ टीआरएस के साथ जाने का फैसला कर लिया। इस ताजा घटनाक्रम से तात्कालिक रूप से टीआरएस को फायदा पहुंचता नजर आ रहा है, लेकिन दूरगामी रूप से माना जा रहा है कि इसका लाभ भाजपा को मिलेगा जो लगातार इस नए राज्य में खुद को मजबूत करने की कोशिशों में लगी हुई है। असल में कांग्रेस की कमजोरी ही भाजपा की ताकत मानी जाती है। सियासी हलकों में यह आम राय है कि कांग्रेस जितनी कमजोर होगी, भविष्य में इसका लाभ भाजपा को ही मिलना है।

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस सत्ता से बाहर है

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस सत्ता से बाहर है

इस सबकी जड़ में आंध्रप्रदेश का बंटवारा और इसको लेकर कांग्रेस का ढुलमुल रवैया भी एक बड़ा कारण माना जाता रहा है। भाजपा शुरू से यह आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस ने वादा करने के बावजूद बंटवारे को लटकाए रखा। इसका जहां भाजपा को लाभ हुआ वहीं कांग्रेस को खामियाजा भी भुगतना पड़ा। टीआरएस सबसे ज्यादा फायदे में इसलिए रही कि उसने अलग तेलंगाना राज्य के लिए बड़ा आंदोलन चलाया था। ऐसे में जब बटवारा हुआ तो तेलंगाना में 2014 में टीआरएस और आंध्रप्रदेश में टीडीपी की सरकार बनी। टीडीपी से पहले आंध्रप्रदेश में कांग्रेस के वाईएस राजशेखर रेड्डी की सरकार थी जिनकी 2009 में हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी। इसके बाद जगन मोहन मुख्यमंत्री बनना चाहते थे जो कांग्रेस को स्वीकार नहीं था। कांग्रेस ने रोसैया को मुख्यमंत्री बना दिया। बाद में जगन मोहन कांग्रेस से अलग हो गए और अपनी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस बना ली। इसके अलावा उन्होंने आंध्रप्रदेश के बटवारे के खिलाफ आंदोलन चलाया और भूख हड़ताल भी की। वह बहुत जल्दी-जल्दी राज्य में अपनी ताकत मजबूत करते जा रहे थे। 2014 में आंध्रप्रदेश में टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और अलग राज्य बने तेलंगाना में टीआरएस के के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में सरकार बनी। इस तरह दोनों ही राज्यों से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इस बीच इन दोनों राज्यों में भाजपा भी खुद को स्थापित करने की कोशिशों में लगी रही।

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तेलंगाना में कांग्रेस को झटका, 12 विधायकों ने लिया टीआरएस में जाने का फैसला

तेलंगाना में कांग्रेस को झटका, 12 विधायकों ने लिया टीआरएस में जाने का फैसला

आंध्रप्रदेश में तय समय पर लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव हुए जिसमें टीडीपी और कांग्रेस दोनों को करारी हार का सामना पड़ा जबकि वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी को बड़ी जीत हासिल हुई। तेलंगाना में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने समय से पहले 2018 में ही विधानसभा के चुनाव करवा लिए। इसके पीछे उनकी अपनी तमाम राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं रही हैं जो भले ही पूरी न हो सकी हों। लेकिन यह हुआ कि उनकी पार्टी दोबारा सत्ता में आ गई और वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। 119 सीटों वाली विधानसभा में टीआरएस को 88 सीटें मिलीं। 19 सीटें जीतकर कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा को एक ही सीट मिली। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस को तेलंगाना में बहुत करारा झटका तब लगा जब उसके 12 विधायकों ने टीआरएस में जाने का फैसला कर लिया। कांग्रेस के एक विधायक का इस्तीफा लोकसभा चुनाव जीत जाने की वजह से पहले ही हो चुका था। अगर 12 विधायकों के टीआरएस में शामिल होने की अनुमति मिल जाती है तो कांग्रेस की संख्या छह ही रह जाएगी। इस तरह उसका विपक्षी दल का दर्जा भी खत्म हो जाएगा। राज्य विधानसभा में एआईएमआएम की सदस्य संख्या सात है। तेलंगाना में इससे पहले की विधानसभा के दौरान भी कांग्रेस सदस्य टीआरएस में शामिल हुए थे। इससे ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपने विधायकों को भी साथ नहीं रख पा रही है।

कांग्रेस विधायकों की टूट से सत्ताधारी टीआरएस फायदे में

कांग्रेस विधायकों की टूट से सत्ताधारी टीआरएस फायदे में

तात्कालिक रूप से अगर देखा जाए, तो लगता है कि फिलहाल कांग्रेस विधायकों की टूट से सत्ताधारी टीआरएस फायदे में हैं। लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि भविष्य के लिए यह स्थिति भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी। अभी भले ही टीआरएस मजबूत लग रही है लेकिन उसकी कमजोरियां भी सामने आ रही हैं। हालिया लोकसभा चुनावों में मुख्यमंत्री राव की बेटी तक को हार का सामना करना पड़ा है। इसका संदेश इस रूप में गया है कि आने वाले दिन टीआरएस के लिए बहुत उम्मीद वाले नहीं नजर आते। इसके विपरीत यह माना जा रहा है कि राज्य में भाजपा खुद को लगातार मजबूत करती जा रही है। लोकसभा चुनावों में भाजपा को चार सीटों पर जीत मिली है जिसे उसकी बड़ी सफलता के रूप में लिया जा रहा है। कांग्रेस को भी राज्य की तीन सीटों पर जीत मिली हैं। 2019 से पहले अविभाजित आंध्रप्रदेश में भाजपा को 1980 और 1990 के दशक में इस तरह की सफलता मिली थी। तब टीडीपी के साथ लड़ने पर उसे सात और चार सीटों पर जीत मिली थी। हालिया लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिला 19.45 प्रतिशत वोट बताता है कि अगर इसमें आने वाले समय में थोड़ा भी इजाफा होता है, तो उसकी कितनी मजबूत स्थिति हो सकती है। जाहिर है भाजपा की मजबूती मतलब कांग्रेस की कमजोरी क्योंकि उसे वही वोट ज्यादा मिलेंगे जो कांग्रेस के होंगे। भाजपा के नेता भी इस तरह के दावे कर रहे हैं कि 2024 में वह राज्य में अपने दम पर सरकार बनाएंगे। दरअसल बीते समय में भाजपा के कमजोर रह जाने के पीछे एक बड़ा कारण तेलंगाना राज्य गठन को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान रुख स्पष्ट न होना माना जाता है जिसका खामियाजा भुगतने को मजबूर होना पड़ा था। इसकी वजह से तमाम भाजपाई टीआरएस की ओर चले गए थे जो अब पुनर्वापसी कर रहे हैं।

आश्चर्य नहीं कि जल्द तेलंगाना में भाजपा सत्ता की दावेदार बन जाए

आश्चर्य नहीं कि जल्द तेलंगाना में भाजपा सत्ता की दावेदार बन जाए

कांग्रेस वैसे भी पूरे देश में गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनावों में उसे जीत जरूर मिली थी लेकिन लोकसभा चुनाव में एक बार फिर उसका प्रदर्शन बहुत निराशाजनक रहा है। पहले एकीकृत आंध्रप्रदेश और आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी उसे कोई राह सूझती नहीं नजर आ रही है और एक तरह से यह दोनों ही राज्य उसके हाथ से पूरी तरह निकल चुके हैं। लगता नहीं कि निकट भविष्य में वह इन राज्यों में खुद को खड़ी कर पाएगी। टीआरएस भी भले ही तेलंगाना में अभी सत्ता में हो, लेकिन इसकी संभावनाएं भी जताई जाने लगी हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों तक उसकी लोकप्रियता में कमी आ जाएगी। ऐसे में इस राज्य में अगर किसी के लिए जमीन उर्बरा लग रही है, तो वह भाजपा है जो पूरे देश में अपना कब्जा जमाने के लिए हरसंभव कोशिश में लगी है। उसे त्रिपुरा में सफलता पहले ही मिल चुकी है। पश्चिम बंगाल फतह करने में भी वह लगी ही है। तेलंगाना पर भी उसकी निगाह है। इसमें कांग्रेस जरूर बाधा रही है लेकिन अब वह भी खत्म होती लग रही है। अगर कांग्रेस ने खुद को नए सिरे से खड़ा करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा कि आगामी विधानसभा चुनावों के बाद तेलंगाना में भाजपा सत्ता की दावेदार बन जाए।

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English summary
BJP getting strengthened in another state of South, that was a stronghold of Congress.
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