...और तब तेजस्वी के सामने नीतीश कुमार को झुकाना पड़ेगा सिर
[अजय मोहन] बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में जनता दल यूनाइटेड के पास 101 सीटें हैं, वहीं लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल के पास भी इतनी ही। यानि दोनों के पास मैजिक नंबर 123 से कम सीटे हैं। जरा सोचिये 10 साल तक राज करने के बाद नीतीश कुमार में इतना दम नहीं है कि वे 123 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर सकें। इससे साफ जाहिर है कि नतीश पहले ही हार मान चुके हैं। करियर खत्म नहीं हो जाये, इस डर से उन्होंने लालू प्रसाद यादव का हाथ थामा है। जिस तरह से बिहार का मूड बदल रहा है, उससे यही लग रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री का करियर अब लालू की मुठ्ठी में है।
लालू-नीतीश, दोनों के पास बराबर सीटे हैं। ऐसे में कैसी-कैसी संभावनाएं बन रही हैं, यह जानकर आप खुद भी शॉक्ड रह जायेंगे-
1.अगर राजद के पास जदयू से ज्यादा सीटें आ गईं तो?
पहली संभावना- नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की दावेदारी करने लायक भी नहीं रहेंगे। ऐसे में लालू यादव अपने बेटों- तेजस्वी प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने की जिद ठान लेंगे। और तब तेजस्वी के सामने नीतीश को सिर झुकाना पड़ेगा।
दूसरी संभावना- लालू यादव राबड़ी देवी को एक बार फिर से बिहार की मुख्यमंत्री बनाने की जिद ठान सकते हैं। और उस वक्त नीतीश के सामने सिर्फ दो विकल्प होंगे, पहला- महागठबंधन से टूट कर विपक्ष में बैठने का या फिर चुप-चाप राबड़ी देवी के नेतृत्व में सरकार बनाना।
2. जदयू के पास राजद से ज्यादा सीटें आ गईं तो?
पहली संभावना- तो भी नीतीश का करियर तो लालू की मुठ्ठी में ही रहेगा। क्योंकि जादुई आंकड़ा तब भी नीतीश के पास नहीं होगा। ऐसे में लालू यादव अपने बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाने की जिद कर सकते हैं। क्योंकि बिहार में उपमुख्यमंत्री बनाने का चलन पहले भी रहा है।
दूसरी संभावना- तो नीतीश कुमार की संभावित सरकार में से महत्वपूर्ण विभाग लालू अपने विधायकों को दिलाने के हर संभव प्रयास करेंगे।
3. अगर जदयू और राजद के पास लगभग बराबर सीटें आयीं तो?
तब उत्तर प्रदेश का इतिहास बिहार में दोहरा सकता है। जी हां छह-छह महीने की सरकार! जो बसपा ने भाजपा के संग मिलकर बनायी थी। और ऐसा हुआ तो और बिहार विकास की नई राह पर चला, तो भविष्य कभी भी उसका श्रेय नीतीश अपने ऊपर नहीं ले पायेंगे।













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