बिहार विधानसभा चुनाव: कांग्रेस-BJP ने RJD-JDU पर सीटों की डील में ऐसे बनाया दबाव
नई दिल्ली- बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां अपनी-अपनी क्षेत्रीय सहयोगियों से सीटों की बेहतर डील करने में काफी हद तक सफल हुई हैं। कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी हैं कि पिछले चुनावों के मुकाबले सीटों के मायने में इन सभी को फायदा हुआ है। इस डील में सबसे बड़ी बाजी कांग्रेस के हाथ लगी है। जिस पार्टी का प्रदेश में तीन दशकों से ज्यादा वक्त से अपना कोई जनाधार नहीं बचा है, उसने सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी आरजेडी को भी तालमेल में अपनी शर्तें मानने का मजबूर कर दिया है। दबाव भाजपा ने जदयू पर भी बढ़ाया है, लेकिन वह तब जबकि उसका जमीन पर जनाधार भी काफी बढ़ा है।

कांग्रेस ने आरजेडी से तालमेल के मामले में ज्यादा बड़ी बाजी मारी है। बीजेपी तो लोकसभा चुनावों में पिछले दो बार से बिहार में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भी है। लेकिन, कांग्रेस 2015 में राजद और जदयू के साथ 41 सीटों पर लड़कर भी इस बार 70 सीटें दावे के साथ लेने में सफल हुई है। कांग्रेस 2015 में भले ही 27 सीटें जीती थी (राजद-जदयू के साथ रहकर), लेकिन सच्चाई ये है कि उसका अपना जनाधार 1985 के बाद से पूरी तरह से मटियामेट हो चुका है। फरवरी 2005, अक्टूबर 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों में उसके जीतने का हिसाब क्रमश: 10, 9 और 4 से ज्यादा कभी नहीं पहुंच पाया। वजह ये है कि 1984-85 तक कांग्रेस के पास जो सवर्ण, दलित और मुसमानों का वोट बैंक होता था, वो सारे आज उससे काफी दूर जा चुके हैं। 1989 से लोकसभा चुनावों में उसका अंक गणित 4, 1, 2, 5, 4, 3, 2, 2, 1 पर सिमट चुका है। वह भी तब जब वह लालू यादव की पार्टी की पिछलग्गू बन कर चली है।
भाजपा और जदयू 10 साल बाद बिहार विधानसभा चुनाव साथ लड़ रहे हैं। दो चुनावों के बीच अंतर ये हुआ कि जदयू को उसे 2010 से 19 ज्यादा सीटें देनी पड़ी हैं और दोनों ही दलों ने आपस में लगभग बराबर सीटों का बंटवारा किया है। बीजेपी को 243 में से 121 सीटें मिलीं, जो उस चुनाव के मुकाबले 19 ज्यादा है। यानि तब जदयू बड़े भाई की भूमिका में था, अब जुड़वां के रोल में है। स्ट्राइक रेट के हिसाब से भी भाजपा की सफलता अच्छी मानी जा सकती है। क्योंकि, 2015 में वह बगैर जेडीयू के 157 सीटों पर लड़ी थी, फिर भी 53 पर ही जीत पाई थी। इस तरह से बिहार में छत्रपों वाली क्षेत्रीय दलों पर दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने इस चुनाव में सीट लेने में पूरी धाक जमाई है। हालांकि, दोनों मामले में वजहें एकदम अलग हैं। इंडिया टुडे से बातचीत में पटना यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र के प्रोफेसर रघुनंदन शर्मा कहते हैं, 'ना सिर्फ बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी बड़ी हुई है, इसके लिए नरेंद्र मोदी की लहर को धन्यवाद है, बल्कि आरजेडी जैसी पार्टी लालू प्रसाद की गैरमौजूदगी के चलते कमजोर हुई है।'
वैसे जेडीयू और बीजेपी की ओर से अपने-अपने सहयोगियों को सीटें देने के चलते नीतीश कुमार फिर भी भाजपा के बड़े साथी नजर आ रहे हैं। 'हम' को 7 सीटें देने के बाद उनकी पार्टी 115 सीटों पर लड़ रही है, लेकिन वीआईपी को 11 सीटें देने के बाद बीजेपी के पास अपने लड़ने के लिए सिर्फ 110 सीटें ही बची हैं। हालांकि, सीटों के मामले में 2015 के मुकाबले राजद और जदयू भी इस बार कहीं ज्यादा सीटों पर लड़ रही हैं, खासकर लालू यादव की पार्टी। लेकिन, पिछली बार जदयू साथ थी। इस बार वह नहीं है तब भी आरजेडी कुल सीटों की करीब एक-तिहाई सीटों पर ही लड़ने को मजबूर है। क्योंकि, उसे कांग्रेस को उसकी उम्मीदों से ज्यादा सीटें देने को लाचार होना पड़ा है। इसका दर्द एक राजद नेता ने कुछ यूं बयां किया है, 'विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले आरजेडी का ज्यादा दांव पर लगा हुआ है। कांग्रेस भविष्य पर बिना कोई खास प्रभाव पड़े एक और चुनाव हार सकती है। लेकिन, आरजेडी को अगर बड़ा नुकसान हुआ तो इसके लिए तबाही की तरह होगी, क्योंकि पिछले साल लोकसभा चुनाव में भी यह खाली हाथ रही थी।'
राजद नेता ने माना है कि जब 1990 से 2005 के बीच लालू यादव का शासन था और केंद्र में भी वह किंगमेकर के रोल में होते थे, उसकी तुलना में कांग्रेस की ज्यादा मांग मांगनी पड़ी है। 'लालू जी चुनाव में प्रचार नहीं कर सकते, तेजस्वी यादव के पास कोई विकल्प नहीं था, कांग्रेस को साथ लेकर चलना ही था।'












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