2019 में राम मंदिर पर अध्यादेश या विधेयक लाकर बाजी पलट सकती है बीजेपी?
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई तीन महीने के लिए टाल दी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को कहा कि जनवरी में उपयुक्त पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर मुद्दे को लेकर राजनीति तेज हो गई है। बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार से अध्यादेश लाने की अपील की है। वहीं, दूसरी ओर AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार को खुली चुनौती दे डाली है। ओवैसी ने कहा कि अगर 56 इंच का सीना है तो राम मंदिर मामले पर सरकार अध्यादेश क्यों नहीं लाती। 2014 लोकसभा चुनाव के बीजेपी के घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा काफी नीचे था, लेकिन जिस तरह से घटनाक्रम चल रहा है, उससे इस बात की पूरी संभावना बन रही है कि 2019 लोकसभा चुनाव में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा सबसे ऊपर होगा। यह बात सच है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी सरकार की मुश्किल बढ़ा दी है, लेकिन एक सच यह भी है कि इस फैसले से बीजेपी को नया चुनावी मुद्दा भी मिल सकता है।

मोदी सरकार अध्यादेश लाई तो क्या होगा ?
सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुनवाई तीन महीने टालने के बाद दो बातें मुख्य तौर पर उभरकर सामने आ रही हैं। पहली मोदी सरकार अध्यादेश लाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करे और दूसरी विधेयक लाकर कानून बनाया जाए। अब सबसे पहले जानते हैं कि अध्यादेश आखिर है क्या। सरकार को कुछ विशेष परिस्थितियों में कानून बनाने के लिए जो सीमित शक्तियां दी गई हैं, उनमें एक है- अध्यादेश। संविधान के मुताबिक, राष्ट्रपति को अनुच्छेद-123 के तहत अध्यादेश पारित करने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल की सलाह पर अध्यादेश पारित करते हैं। राष्ट्रपति की ओर से जारी अध्यादेश को 6 सप्ताह के भीतर संसद के दोनों सदनों में पारित कराना आवश्यक होता है। ऐसा नहीं होने पर अध्यादेश प्रभावहीन हो जाता है। मतलब मोदी सरकार राम मंदिर निर्माण के लिए अगर अध्यादेश ले भी आती है तो दो प्रमुख चुनौतियां सामने आएंगी। पहली- इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। दूसरी- 6 सप्ताह के भीतर लोकसभा और राज्यसभा से इसे पारित कराना होगा। ऐसे में अध्यादेश से राम मंदिर निर्माण की राह बेहद कठिन दिखती है, हां इतना जरूर है कि अध्यादेश लाकर बीजेपी को चुनावी फायदा जरूर मिल सकता है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगी बीजेपी की रणनीति
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव दिसंबर में होने हैं। इन राज्यों के परिणाम सामने आने के बाद ही बीजेपी राम मंदिर निर्माण पर कोई ठोस कदम उठाएगी। यदि विकास के नाम पर उसे इन विधानसभा चुनावों में जीत मिलती है तो संभव है कि मोदी सरकार राम मंदिर निर्माण पर अध्यादेश के बारे में विचार भी न करे, लेकिन कहीं अगर उसके हाथ हार लगी तो हिंदुत्व की शरण में जाने के सिवाय बीजेपी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा। ऐसे में मोदी सरकार चुनाव से ऐन पहले अध्यादेश ला सकती है।

अध्यादेश या विधेयक दोनों में कौन सा विकल्प बीजेपी के लिए बेहतर
यदि बीजेपी 2019 लोकसभा चुनाव राम नाम पर लड़ने का मन बनाती है तो उसके पास दो विकल्प होंगे, पहला- अध्यादेश और दूसरा शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने का। हालांकि, इनमें कोई भी कदम उसके लिए आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा करने पर नीतीश कुमार जैसे एनडीए के सहयोगी अलग जाने का फैसला ले सकते हैं। अध्यादेश की तुलना में सदन के पटल पर विधेयक लाना बीजेपी के लिए ज्यादा मुफीद होगा। हालांकि, लोकसभा में तो बीजेपी इसे पास करा सकती है, लेकिन राज्यसभा में इसकी राह आसान नहीं। ऐसे में कानून न बन पाने का ठीकरा बीजेपी विपक्ष पर फोड़कर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। बीजेपी भले ही मंदिर निर्माण में सफल न हो, लेकिन वह कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने का पूरा प्रयास करेगी।

राम मंदिर पर अब और इंतजार के मूड में नहीं संघ
राष्ट्रीय स्वयं सेवक राम मंदिर निर्माण को लेकर अब और इंतजार के मूड में नहीं है। दशहरा पर मोहन भागवत स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि अगर अदालत के फैसले में देरी होती है तो सरकार को कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करना चाहिए। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (एबीएपी) के संतों ने पहले ही मोदी सरकार को अल्टीमेटम दे रखा है। हिंदू संगठन मोदी सरकार पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर स्वयं नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनावी रणनीति का ताना-बाना भी हिंदुत्व ही है। ऐसे में राम मंदिर निर्माण से दूरी बनाकर चलना उनके लिए भी आसान नहीं होगा।
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