नज़रिया:क्या गुजरात ने कांग्रेस को संजीवनी दी?
गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे हम सबके सामने हैं जहां 99 सीटों के साथ बीजेपी विजेता घोषित हो चुकी है और कांग्रेस को 77 सीटें ही मिल पाईं.
इससे पहले 1985 में कांग्रेस को 149 सीटों के साथ भारी बहुमत मिला था. उस साल माधवसिंह सोलंकी मुख्यमंत्री बने थे.
उस वक्त का 'कुशासन' आज भी कई लोगों को याद है जहां हिंदू-मुस्लिम हिंसा ज़ोरों पर थी और कानून व्यवस्था का बुरा हाल था.
कई हिंदू व्यापारी उस ज़माने को मुस्लिम अपराधियों और कर्फ्यू की वजह से याद करते हैं. इसके बाद 1990 के चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ़ 33 सीटें ही मिल पाईं.
साल 1995 में थोड़ा सुधार दिखा जब 45 सीटें मिलीं, फिर 1998 में 53 सीटें, 2002 में 51, साल 2007 में 59 और 2012 में 61 सीटें.
कुछ कमज़ोर हुई भाजपा
77 सीटें कांग्रेस की कमज़ोर स्थिति का संकेत नहीं है बल्कि इतनी सीटों का मतलब है कि कांग्रेस गुजरात में सत्ता के लिए मज़बूत दावेदार है.
अब ऐसा कहना सही रहेगा कि कांग्रेस आखिरकार माधवसिंह सोलंकी के ज़माने से आगे बढ़ चुकी है.
सबसे बड़ी बात ये है कि ऐसा तब हुआ जब गुजरात बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी अब प्रधानमंत्री भी हैं. कांग्रेस के लिए ये कोई छोटी उपलब्धि नहीं है.
कांग्रेस ने बीजेपी के गढ़ में उस वक्त बढ़त ली है जब मोदी प्रधानमंत्री हैं और गुजरात की मोदी-शाह की जोड़ी एक के बाद एक राज्य चुनाव जीतती आ रही है.
इतना ही नहीं मोदी और अमित शाह की बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत के अपने लक्ष्य के तहत उससे राज्य दर राज्य छीनती जा रही है.
'अन्य' वाले गायब
ये सच है कि बीजेपी ने 22 साल के शासन के बाद सत्ता विरोधी लहर को तो हरा दिया है.
लेकिन आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि भाजपा किसी भी और चुनाव से ज़्यादा गुजरात विधानसभा चुनावों में कमज़ोर हुई है.
इसका वोट प्रतिशत बढ़ा है लेकिन वो तो कांग्रेस का भी बढ़ा है. 'अन्य' वाले तो गायब ही हो गए हैं.
कांग्रेस के बागी नेता शंकरसिंह वाघेला की बनाई नई पार्टी तो कहीं नज़र ही नहीं आई.
कांग्रेस ने अपनी सहयोगी पार्टी, भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ मिलकर भाजपा से अपने वोट फीसदी के अंतर को कम कर लिया है.
करीबी मुक़ाबला
अब ये अंतर 7 फीसदी है, पहले ये 10 फीसदी हुआ करता था. लेकिन ये आंकड़ा गुमराह करता है क्योंकि ये अंतर बीजेपी के शहरी इलाकों की सीटें जीतने की वजह से बना है.
कई सीटों पर बहुत कम वोटों का अंतर रहा, खासकर ग्रामीण इलाकों की सीटों पर. इससे भी पता चलता है कि मुक़ाबला कितना आस-पास का था.
अगर ज़रा सी और चीज़ें कांग्रेस के हक़ में होती तो कांग्रेस ये चुनाव जीत भी सकती थी. 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी का वोट 43.3 फीसदी था.
उसके तीन साल बाद उत्तर प्रदेश चुनावों में 41.35 फीसदी वोट भाजपा को मिले थे.
वोट प्रतिशत और सीट दोनों के हिसाब से पता चलता है कि भाजपा की लोकप्रियता 2014 से 2017 तक ज्यों की त्यों उत्तर प्रदेश में बनी रही थी.
सत्ता विरोधी लहर
लेकिन ऐसा गुजरात में नहीं था. 2014 में भाजपा ने गुजरात में 59 फीसदी वोट के साथ सभी 26 लोकसभा सीटें जीती थीं.
कांग्रेस को 33 फीसदी वोट मिला था यानी बीजेपी से 26 फीसदी कम.
अगर लोकसभा के नतीजों को विधानसभा के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी 182 में से 162 सीटें जीती थी.
बहुमत से बस ज़रा से ऊपर सीटें लेकर बीजेपी ने दरअसल गिरावट दर्ज की है.
जब भाजपा के नेता कहते हैं कि इन आंकड़ों को मत देखिए बल्कि ये देखिए कि 22 साल से गुजरात में सत्ता विरोधी लहर थी, तो इसका मतलब है कि भाजपा भी मानती है कि मोदीमय भाजपा भी सत्ता विरोधी लहर से परे नहीं है.
कांग्रेस मुक्त भारत
2013 से जिस तरह कांग्रेस हारती आ रही है, उससे कांग्रेस मुक्त भारत की बात हकीकत नज़र आने लगी थी.
लेकिन गुजरात में बढ़त मिलने के बाद कांग्रेस का मनोबल भी बढ़ेगा कि वो वापसी कर सकती है, वो भाजपा को टक्कर दे सकती है और सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठा सकती है.
भाजपा एक बार फिर गुजरात में सरकार बनाने जा रही है लेकिन कांग्रेस ने 1985 के बाद इस बार सबसे ज़्यादा सीटें हासिल की हैं.
ये कहना गलत नहीं होगा कि विजेता दूसरे नंबर पर रहा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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