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नज़रिया:आंबेडकर का जाति विनाश और हेडगेवार की समरसता

मोहन भागवत
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मोहन भागवत

पुणे के पास भीमा कोरेगांव में दलितों के सालाना जमावड़े पर हमले और उसके बाद के आंदोलन से संघ यानी आरएसएस चिंतित है.

मध्य प्रदेश के विदिशा में संघ के मध्य क्षेत्र की समन्वय बैठक में इसके संकेत नजर आए, जहां संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आह्वान किया कि काम करने वालों को मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ देना चाहिए.

इस सिलसिले में उन्होंने घर में बर्तन साफ करने वाली, बाल काटने वाले, कपड़े धोने वालों और जूते-चप्पल सुधारने वाले से संपर्क करने और उन्हें घर बुलाने का अपील की.

इससे पहले 2015 में संघ ने आह्वान किया था कि हिंदुओं की तमाम जातियों के कुएं, मंदिर और श्मशान एक होने चाहिए. आरएसएस के लिए जाति समस्या के समाधान का यही मॉडल है. यह समरसता है, यही एकात्मवाद है. तमाम जातियों के लोग, छोटे-बड़े सभी समरसता के साथ रहें, यही संघ चाहता है. जाति बनी रहे लेकिन समरसता के साथ.

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डॉक्टर बीआर आंबेडकर
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डॉक्टर बीआर आंबेडकर

आरएसएस और आंबेडकर के मॉडल में अंतर

आरएसएस ने कभी जाति के विनाश की बात नहीं की. जाति के विनाश यानी 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' का मॉडल बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का है. बाबा साहेब जातियों के बीच समरसता की बात नहीं करते. उनके मुताबिक जाति के ढांचे में ही ऊंच और नीच का तत्व है, इसलिए जातियां रहेंगी तो जातिभेद भी रहेगा.

बाबा साहेब का मॉडल वंचितों को समर्थ और सक्षम बनाकर उन्हें इस काबिल बनाने का है कि वे जातिवाद को चुनौती दे सकें. अपने ऐतिहासिक भाषण एनिहिलेशन ऑफ कास्ट में वे सवर्ण हिंदुओं से आह्वान करते हैं कि अगर वे अपने धर्म को बचाना चाहते हैं तो उन्हें जाति का विनाश करना होगा और चूंकि जाति का स्रोत उनके धर्मग्रंथ हैं, इसलिए उनसे मुक्ति पानी होगी.

बाबा साहेब के लिए जाति एक बीमारी है, जिसने हिंदुओ को जकड़ रखा है और इस बीमारी से बाकी लोग भी परेशान है. बाबी साहेब एक डॉक्टर की तरह सलाह देते हैं कि बीमारी ठीक करनी है तो ग्रंथों से मुक्ति पा लो.

दूसरी ओर, आरएसएस का मॉडल जातिवाद से भिड़ने का नहीं, एकात्म होने का है. यानी मतभेद के साथ समरसता बरतने का है. आरएसएस के मॉडल में जातियां बनी रहेंगी, जाति के आधार पर ऊंच और नीच भी बने रहेंगे, लेकिन वे मिल जुलकर रहेंगे.

यही वजह है कि आरएसएस सहभोज जैसे आयोजन करता है, जिसमें तमाम जातियों के लोग साथ में भोजन करते हैं. साथ पढ़ने-लिखने, साथ में शाखा में जाने और भाईचारे के साथ रहने को संघ जाति समस्या का पर्याप्त और असरदार समाधान मानता है.

इसी आधार पर संघ के लोग बहुत सहजता से यह दावा करते हैं कि संघ जातिवाद को नहीं मानता और संघ में जातिवाद नहीं है.

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उग्र प्रतिक्रिया

देश भर से आने वाली दलित उत्पीड़न की खबरें बताती हैं कि दावा चाहे जो भी हो, लेकिन समाज में ऐसी कोई समरसता हो नहीं पाई है. जिन प्रदेशों में दशकों से बीजेपी का शासन रहा और आरएसएस की मर्जी के मुताबिक शासन चला, वहां भी कोई वास्तविक समरसता नहीं आई है.

जातिवाद वहां भी पूरी क्रूरता के साथ मौजूद है. जाति हिंसा और भेदभाव को खत्म करने में समरसता और एकात्मवाद का मॉडल पूरी तरह फेल साबित हुआ है. इसके अलावा राजकाज, न्याय, शिक्षा, नौकरशाही आदि संस्थाओँ में दलितों का हाशिए पर होना भी जारी है. दलितों के लिए देश अब भी एक हद तक ही सुधरा है.

इस बीच बदलाव यह हुआ है कि दलितों ने पहले की तरह सब कुछ चुपचाप सह लेने से इनकार कर दिया है. दलित उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाओं की अब दलित समाज में उग्र प्रतिक्रिया होती है. लोग ऐसे सवालों पर सड़कों पर आने लगे हैं. इसलिए देश भर में इस मुद्दे पर बवाल हो रहा है. इसे ही कुछ लोग जातिवाद का बढ़ जाना मानते हैं.

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पुलिस बल
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दलितों का जश्न वर्चस्व को चुनौती?

महाराष्ट्र में इस बार विवाद ज्यादा ही गंभीर हो गया और यहां तक कहा जा रहा है कि इस बार मतभेद बहुत नीचे तक पहुंच गया और समाज में स्थायी किस्म की कड़वाहट आ गई है.

महाराष्ट्र के दलित सौ साल से भी ज्यादा समय से हर साल एक जनवरी को भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होते हैं और उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद करते हैं, जब भारत के सर्वाधिक क्रूर जातिवादी पेशवा शासन को उनके पूर्वजों ने धूल चटाई थी.

इस युद्ध की अलग अलग व्याख्याएं हैं. कोई चाहे तो इसे अंग्रजों की जीत के तौर पर देख सकता है, तो कोई इसे पेशवाई की हार के तौर पर. पेशवाई को अगर मराठा साम्राज्य की निरंतरता में देखें, जो कि वह है नहीं, तो इसे अंग्रेजों के हाथों मराठों की हार के तौर पर भी देखा और दिखाया जा सकता है.

बहरहाल इस युद्ध की एक दलित व्याख्या है और इस व्याख्या से सहमत लोग भीमा कोरेगांव को सामाजिक लोकतंत्र के प्रतीक के तौर पर देखते हैं.

भीमा कोरेगांव में दलितों के सालाना जलसे से जाति यथास्थितिवादी हमेशा असहज रहे हैं. जाति वर्चस्व के समर्थकों को लगता है कि दलितों का इस तरह जश्न मनाना उनके लिए एक चुनौती है. लेकिन इस साल से पहले कभी भी इस समारोह पर हिंसक हमला नहीं हुआ.

अब तक का विरोध विचार के स्तर पर ही था लेकिन इस साल विरोध ने हिंसक रूप ले लिया. इस तरह जातिवाद विरोधी और जातिवादी शक्तियां आमने-सामने आ गईं.

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आरएसएस की चिंता

आरएसएस के लिए यह चिंताजनक बात है. भीमा कोरेगांव को लेकर आरएसएस की शुरूआती प्रतिक्रिया में एक अनिश्चिय और ढुलमुलपन दिखता है. वह आम तौर पर खामोश रहने की रणनीति पर अमल करता है. किसी भी एक पक्ष में खुलकर आना उसके लिए संभव नहीं था.

हालांकि भीमा कोरेगांव की दलित व्याख्या से आरएसएस पूरी तरह असहमत है, लेकिन इसे औपचारिक तौर पर कहना उसके लिए आसान नहीं है.

संघ के कार्यकर्ता नीचे के स्तर पर बेशक यह संदेश लेकर जा रहे हैं कि भीमा कोरेगांव को विराट हिंदू एकता को तोड़ने के लिए उछाला जा रहा है और "निशाने पर भारत" है.

लेकिन संघ नहीं चाहेगा कि वह दलितों के खिलाफ खड़ा नजर आए. भीमा कोरेगांव में हुए बड़े जमावड़े और वहां समारोह पर हुए हमले के खिलाफ महाराष्ट्र के सैकड़ों कस्बों और शहरों में हुए विरोध ने उसकी नींद उड़ा दी है इसलिए संघ बेहद संभलकर चल रहा है.

संघ की कोशिश होगी कि आक्रमण की धार किसी तरह मुसलमानों के खिलाफ मोड़ दी जाए ताकि विराट हिंदू एकता कायम हो सके और दलितों या पिछड़ों के सवाल कहीं पीछे छूट जाएं.

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दलित आक्रोश की आंच का असर

संघ की चिंता सिर्फ भीमा कोरेगांव की घटनाएं नहीं हैं. पिछले तीन साल में, खासकर केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से दलितों का आक्रोश सरकार और बीजेपी को लेकर बढ़ा है. संघ बेशक कहे कि वह सांस्कृतिक संगठन है, लेकिन बीजेपी के साथ उसका गर्भनाल का संबंध किसी से छिपा हुआ भी नहीं है.

बीजेपी अगर दलितों के निशाने पर आती है या बीजेपी को लेकर अगर दलितों के अंदर किसी किस्म का आक्रोश पैदा होता है तो इसकी आंच आरएसएस तक पहुंचना तय है. हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के मामले में संघ सीधे निशाने पर रहा.

रोहित वेमुला के संगठन आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन और संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के आपसी झगड़े से ही यह विवाद शुरू हुआ और इसमें संघ और बीजेपी के राष्ट्रीय स्तर तक के नेताओं ने अपनी भूमिकाएं निभाईं.

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गुजरात के ऊना में चार दलितों की पिटाई के बाद विरोध प्रदर्शन
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गुजरात के ऊना में चार दलितों की पिटाई के बाद विरोध प्रदर्शन

बाकी हैं सवाल

इसके बाद गुजरात के ऊना में भी गोरक्षकों ने जिस तरह दलितों पर अत्याचार किए, उससे संघ की विचारधारा को लेकर दलितों की कड़वाहट बढ़ी. सहारनपुर में भी दलितों ने देखा कि संघ और बीजेपी के नेता, अत्याचार करने वालों के साथ हैं.

केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह के बयानों से भी दलितों और बीजेपी के बीच दूरी बढ़ी है. दलितों को प्रमोशन में आरक्षण दे पाने में बीजेपी की अक्षमता को लेकर भी दलित नाराज हैं. पूर्ण बहुमत की सरकार होने के कारण बीजेपी इस सवाल को हल कर सकती है. लेकिन ऐसा करने से उसके कोर सवर्ण वोटर के नाराज हो जाने का खतरा है.

दलित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर संघ और बीजेपी ने एक प्रतीकात्मक मिसाल कायम करने की कोशिश की है लेकिन इससे दलितों के वास्तविक सवाल हल नहीं हुए हैं.

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