Attari Border: मां से जुदा होकर लौटे मासूम, कहा-'दिल टूट गया, मां के बिना नहीं रह सकते'
Attari Border News: जम्मू कश्मीर के पहलगाम 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव गहराता जा रहा है। सुरक्षा कारणों से भारत ने अटारी बॉर्डर को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है और पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करने के साथ-साथ भारतीय नागरिकों को भी जल्द लौटने की सलाह दी है।
इस बीच मानवता को झकझोर देने वाली कुछ मार्मिक कहानियां भी सामने आई हैं, जिनमें सबसे तकलीफ़देह है उन मासूम बच्चों की, जो अपनी मां से जुदा होकर पाकिस्तान लौटने को मजबूर हो गए हैं। आजतक की खबर के मुताबिक, 11 साल की ज़ैनब और 8 साल की ज़ेनिश अपनी नानी से मिलने दिल्ली आई थीं।

लेकिन अब उन्हें अपनी मां को भारत में छोड़कर पाकिस्तान लौटना पड़ रहा है, क्योंकि मां के पास भारतीय पासपोर्ट है। जबकि बच्चियों के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट और वो वहां के नागरिक हैं। विदाई के वक्त ज़ैनब की आंखों में आंसू थे। उसने कहा, 'मां के बिना लौट रही हूं, दिल टूट गया है। मैं मां के बिना नहीं रह सकती।'
ज़ैनब ने आतंकियों के खिलाफ कड़ी सजा की मांग करते हुए कहा कि ऐसे हमलों से सिर्फ निर्दोष लोगों की जान ही नहीं जाती, बल्कि कई परिवार भी टूट जाते हैं। जैनब ने नम आंखों से कहा कि जो हम जैसे आम लोग हैं, उन्हें इस लड़ाई का शिकार नहीं बनाना चाहिए। ऐसी ही एक और मार्मिक कहानी है छोटे से मोहम्मद अलयान की, जो अपनी मां को भारत में छोड़कर पाकिस्तान लौट रहे हैं।
अलयान ने कहा, 'मेरी मां के पास इंडियन पासपोर्ट है, इसलिए वो हमारे साथ नहीं आ पा रहीं। मैं मां के बिना पाकिस्तान जा रहा हूं। मैं अपील करता हूं कि मां को हमारे पास भेजा जाए।' अलयान के पिता मोहम्मद इरफान ने बताया कि उनका परिवार पिछले महीने कराची से भारत आया था, लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि बच्चों को लेकर उन्हें वापस लौटना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि मेरे बच्चे बुरी तरह टूट चुके हैं। आतंकियों ने हमारी ज़िंदगी उथल-पुथल कर दी है। हम प्रधानमंत्री मोदी से अपील करते हैं कि इस मुश्किल घड़ी में हमारी मदद करें। इरफान की पत्नी शरमीन पिछले 18 सालों से पाकिस्तान में रह रही थीं, लेकिन भारतीय नागरिकता के कारण अब उन्हें पाकिस्तान लौटने की अनुमति नहीं मिल रही। इरफान कहते हैं कि हम फंस गए हैं, ना इधर के रहे ना उधर के। बच्चों को मां से जुदा करना किसी सजा से कम नहीं।












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