असम-पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव का केरल पर पड़ता असर
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह असम और पश्चिम बंगाल में अपने चुनावी भाषणों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का ज़िक्र नहीं कर रहे हैं, लेकिन क़ानून लागू होने की आशंका से भयभीत प्रवासी मज़दूर हज़ारों रुपये ख़र्च करके केरल से अपने राज्यों की ओर लौट रहे हैं.
असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले हज़ारों मज़दूर केरल से अपने राज्य वापस जा रहे हैं जिसका असर हॉस्पिटालिटी, प्लाइवुड, प्लांटेशन और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योग-धंधों पर पड़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़ अगले दो हफ्तों में उत्पादन पर लगभग 50 प्रतिशत तक असर पड़ सकता है.
केरल प्लाइवुड इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष मुजीब रहमान ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''फ़िलहाल हमारे उत्पादन पर लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक असर पड़ चुका है. अगले दो हफ्तों में ये बढ़कर दोगुना हो जाएगा. कुल मिलाकर उत्पादन आधा रह जाएगा.''
तिरुवनंतपुरम में सीनियर डिवीज़नल कॉमर्शियल मैनेजर डॉक्टर राजेश चंद्रन का कहना है, ''चुनाव की वजह से असम और पश्चिम बंगाल लौटने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. इस समय कोई नहीं कह सकता कि स्पेशल ट्रेन कब चलाई जाएंगी, क्योंकि इस तरह के फ़ैसले एक दिन से भी कम समय में लिए जाते हैं.''
कोच्चि शहर में ही हर दिन लगभग पांच प्रवासी मज़दूर असम और पश्चिम बंगाल की ओर जा रहे हैं. केरल में कोच्चि की तरह और भी जगहें हैं जहां से प्रवासी मज़दूरों की इस तरह वापसी हो रही है. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों से ट्रेन टिकटों की मांग बढ़ गई है.
इस बार वोट नहीं दिया तो..
असम के उदालगिरी ज़िले के रहने वाले फ़ैसल अहमद ने चार महीने पहले ही कोच्चि में हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम करना शुरू किया था. उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, ''मेरे परिवार ने कहा कि वापस आओ और वोट डालो. मैं 28 मार्च को रवाना हो रहा हूं और वहां चार दिन रहूंगा. मैं अपना वोट डालकर बस से वापस आ जाऊंगा.''
कोच्चि में सब्ज़ी की दुकान लगाने वाले राशिद अहमद असम के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया, ''वहां रहने वाले परिवार के लोग परेशान हैं कि भविष्य में क्या होगा, वो इसलिए वोट देने के लिए जा रहे हैं. हमें कहा गया है कि इस बार वोट नहीं दिया तो भविष्य में वोट देने के लायक नहीं रहेंगे. दुकान पर आने वाले मेरे कई दोस्त भी इसी वजह से चले गए हैं, हालांकि मुझे कोई दिक्कत नज़र नहीं आती.''
महंगी टिकट और लंबा सफ़र
हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में सुपरवाइज़र सैयद नूर-उल-हक़ कहते हैं, ''मेरा एक साथी बस से गुवाहाटी के लिए रवाना हुआ है. उसने बस के टिकट के लिए 4200 रुपये चुकाए हैं. कुछ अन्य लोगों ने साढ़े सात से आठ हज़ार तक ख़र्च करके फ्लाइट का टिकट लिया है.''
प्लाइवुड इंडस्ट्री में काम करने वाले एक सुपरवाइज़र ने अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा कि ''वो कोरोना वायरस की वजह से लंबे लॉकडाउन के बाद हाल के महीनों में ही काम के लिए यहां आए थे, ऐसे में वो अपने आर्थिक हालात कैसे संभालेंगे.''
सेंटर फॉर माइग्रेशन एंड इनक्लूसिव डिवेलपमेंट के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर बिनॉय पीटर ने बीबीसी से कहा, ''अकेले एर्नाकुलम ज़िले में ही लगभग 20 प्रतिशत प्रवासी मज़दूर असम के और लगभग 40 प्रतिशत मज़दूर पश्चिम बंगाल के हैं. हम बाकी केरल की तो बात ही नहीं कर रहे हैं. संख्या बहुत अधिक है.''
'पहले कोरोना और अब चुनाव'
केएलआर फेसिलिटी मैनेजमेंट के डायरेक्टर कृष्ण कुमार का कहना है, ''कोरोना के बाद काम-धंधा पटरी पर लौटा ही था कि अब चुनाव आ गए हैं. हम पूरे राज्य में 50 प्रतिशत कम स्टाफ़ से जूझ रहे हैं. आमतौर पर हाउसकीपिंग स्टाफ़ को हर महीने 15 हज़ार रुपये वेतन मिलता है.''
बिनॉय पीटर का कहना है कि ''हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री बंद नहीं होगी लेकिन उस पर असर ज़रूर पड़ेगा. इस सेक्टर में अधिकतर प्रवासी मज़दूर पूर्वोत्तर, नेपाल और पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग इलाके के रहने वाले हैं. इन इलाकों से आने वाले कामगार अंग्रेज़ी बोल लेते हैं और दिखने में अच्छे लगते हैं, इसलिए उन्हें फ्रंट ऑफिस के काम में लगाया जाता है. हाउसकीपिंग के मामले में भाषा और रंग-रूप मायने नहीं रखता.''
बिनॉय पीटर की बात का एक मतलब ये निकलता है कि केरल जैसे राज्य में कुछ समय के लिए असम के लोगों का विकल्प मिल सकता है. पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के लोग उनके विकल्प बन सकते हैं. लेकिन प्लाइवुड और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योग-धंधों में प्रवासी मज़दूरों के जाने की वजह से ज़बरदस्त असर पड़ेगा.
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