क्या अरब देशों की तरह अराजक स्थिति बनाना चाहते हैं केजरीवाल

सबको प्रमाणित करते केजरीवाल
यह एक सच है कि अगर केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दिया होता तो आज दिल्लीवासियों के लिए पानी उपलब्ध करवाना, बिजली देना और औद्योगिक विकास करना, उनके सामने बड़ी समस्याएं होती लेकिन उनका हल ढूंढने की जगह उन्होने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि बेहतर प्रशासन और विकास के सभी पैमानों पर फेल होने के बाद भी वह दूसरों के प्रशासन को जज करने निकले। 'आप' ने उन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारने का मन बना लिया है, वह जीतेंगे या नहीं, ये तो वक्त बताएगा पर इससे उनकी चर्चा जरूर होने लगेगी।
खाड़ी देशों मिश्र,ट्यूनीशिया और लीबिया में क्रांति की शुरूआत सोशल मीडिया से हुई।
पुलिस की पूछताछ को मुद्दा बनाया
केजरीवाल को गुजरात में जब पुलिस ने रोंका तो यह एक बड़ा मुद्दा बन गया। जबकि यह केजरीवाल भी जानते हैं कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद आपको स्थानीय प्रशासन से सभा करने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। इसके अलावा सभा करने से पहले पुलिस को सूचना देनी होती है कि कब और कहां कार्यक्रम होना है, जिससे कि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।
गुजरात पुलिस द्वारा रोंके जाने पर जिस तरह 'आप' कार्यकर्ताओं ने शोर मचाया और दिल्ली के भाजपा दफ्तर पर हंगामा किया उससे तो यही लगता है कि वह मीडिया की कवरेज पाने के लिए किसी भी नियम कानून को ताक पर रख सकते हैं। यह केजरीवाल को भी पता था कि ऐसा होने पर उन्हें चर्चा मिलेगी और वह आरोप मोदी पर डाल सकेंगे।
मोदी बनाम केजरीवाल बनाने की तैयारी में
अपनी कानपुर रैली में भी केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया, जिस पर भाजपा के बड़े नेताओं की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर उन्होने गैस के दाम के साथ मोदी का नाम जोड़ दिया। जबकि मोदी अभी पीएम नहीं है अत: उनसे ये पूछना कि गैस के दाम वह बढ़ाएंगे या नहीं निरर्थक सा लगता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस के घोटालों की बात करने वाले केजरीवाल अब सिर्फ मोदी को निशाना बना रहे हैं। उन्होने इस मुद्दे को भी भुला दिया कि शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर भी उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया।
दिल्ली में बेहतर प्रशासन करके दिखाना चाहिए था
केजरीवाल मोदी को जज करने निकले हैं उन्हें यह नही भूलना चाहिए कि वह दिल्ली में 50 दिन भी सरकार नहीं चला सके हैं जबकि गुजरात को बेहतर प्रशासन के लिए संयुक्त राष्ट्र से पुरस्कार भी मिल चुके हैं। केंद्र से मदद न मिलने, मीडिया द्वारा निंदा होने के बावजूद मोदी के नेतृत्व में गुजरात एक ऐसा राज्य बना जहां पिछले दस वर्षों में सर्वाधिक निवेश हुआ। जबकि दिल्ली में केजरीवाल के कार्यकाल के दौरान हर रोज हालात बद से बदतर ही होते गये। ऐसे में सवाल ये भी उठता कि केजरीवाल के शासन का मूल्यांकन कौन करेगा?
हंगामे से कमियों को ढका
इन दिनों केजरीवाल की पार्टी पर टिकट बंटवारे और फंड के स्रोतों को लेकर सवाल उठने लगे थे। वहीं पार्टी के एक नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने 'आप' से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि पार्टी अब राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो रही है, पार्टी के नेता अपने मुद्दों से भटक रहे हैं। पार्टी को अज्ञात स्रोतों से भी धन मिल रहे हैं। बताया जाता है कि फोर्ड फाउंडेशन ने भी पार्टी को फंड दिया है जो कि नक्सलियों का समर्थन करने वाले कई स्वयंसेवी संगठनों को भारत में लगभग 4000 करोड़ रूपये दे चुका है।
मोदी ही होंगे निशाने पर
केजरीवाल ने गुजरात जाकर अपना एजेंडा साफ कर दिया है कि वह अब सिर्फ नरेंद्र मोदी को ही निशाना बनाएंगे। भाजपा कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि केजरीवाल को गुजरात की सड़कें और बिजली व्यवस्था नहीं दिखाई दे रही है। वह सिर्फ कुछ कमियों को ही एक बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। उनके गुजरात में किये गये पब्लिसिटी स्टंट पर चेतन भगत ने ट्वीट किया कि मैं अब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने जा रहा हूं, मेरे साथ तीस मीडियावाले अपने कैमरे के साथ हैं। मैं ओबामा से नहीं मिल सका और अब मैं शोर मचा रहा हूं कि ओबामा मुझसे डर गये और वह भ्रष्ट हैं।
अराजकता बनाना ही मकसद है
केजरीवाल के काम करने के तरीके से अब यह साबित हो गया है कि वह भी भारत का हाल अरब देशों जैसा कर देना चाहते हैं। गौर हो कि अरब देशों मिस्र, ट्यूनीशिया और लीबिया में हुई क्रांति के बाद अब तक प्रशासन में स्थिरता नहीं आ पाई है। अगर 'आप' लोकसभा में 20 से 25 सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है तो देश में वहीं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जो कि दिल्ली में हुई थी।
यह सच है कि आज सिस्टम में बदलाव की जरूरत है, पर यह बदलाव कुछ ही दिनों में नहीं आएगा। इसके लिए सिस्टम में रहना जरूरी है।
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