तेलंगाना-आंध्र प्रदेश में डील तय! चंद्रबाबू-रेवंत में कैसे जमने लगी केमिस्ट्री?

आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना के बने एक दशक से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन दोनों राज्यों के बंटवारे से जुड़े कई मुद्दे आजतक जस के तस लंबित पड़े हैं। लेकिन, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों ही राज्यों में सत्ता परिवर्तन के बाद इनके सुलझने के आसार नजर आ रहे हैं।

सबसे दिलचस्प बात तो ये है कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इस समय कट्टर-विरोधी दलों की सरकारें हैं। तेलंगाना में कांग्रेस शासन में है तो आंध्र प्रदेश में बीजेपी की सहयोगी टीडीपी की अगुवाई वाली सरकार बनी है। लेकिन, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की आपसी ट्यूनिंग से लग रहा है कि सारे मुद्दों का समाधान निकल सकता है।

chandrababu naidu and revanth reddy

चंद्रबाबू ने लिखी रेवंत रेड्डी को चिट्ठी
आंध्र प्रदेश के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू ने सोमवार को तेलंगाना के सीएम ए रेवंत रेड्डी को चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने आंध्र प्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम की वजह से पैदा हुए मुद्दों पर 6 जुलाई को हैदराबाद में उनके साथ आमने-सामने की बातचीत का प्रस्ताव रखा है।

तेलंगाना के सीएम आंध्र के मुख्यमंत्री को दे चुके हैं शुभकामना
इससे पहले 5 जून को जब आंध्र प्रदेश विधानसभा के नतीजे आए थे और उसमें टीडीपी गठबंधन को जबर्दस्त जीत मिली थी, तब 6 जून को रेवंत रेड्डी ने फोन करके नायडू को शुभकामनाएं दी थीं और दोनों प्रदेशों के बीच लंबित मामलों के समाधान निकालने के लिए आपस में सहयोग की बात की थी।

तेलंगाना और आंध्र में है विरोधी दलों की सरकार
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के जगन मोहन रेड्डी की जगह बनी नायूड की नई सरकार में टीडीपी, बीजेपी और पवन कल्याण की जन सेना पार्टी शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों को भी लगता है कि दोनों मुख्यमंत्रियों के आपस में बैठने से दोनों राज्यों के संबंध बेहतर तो होंगे ही, कई मामलों का समाधान भी निकलेगा।

चंद्रबाबू-रेवंत में कैसे जमने लगी केमिस्ट्री?
दरअसल, चंद्रबाबू और रेवंत के बीच राजनीतिक ताल्लुकात काफी पुराने हैं। जब आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ था, उससे पहले और बाद में भी रेवंत रेड्डी कोडंगल (2009 और 2014 में) से टीडीपी के ही एमएलए थे। वे संयुक्त आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू के जूनियर के रूप में टीडीपी के कार्यकारी अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

टीडीपी में रहते हुए वे नायडू के बहुत ही वफादार रहे हैं। यहां तक कि अक्टूबर 2017 में जब उन्होंने टीडीपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने का फैसला किया, तब भी पार्टी से इस्तीफा देने से पहले विजयवाड़ा जाकर नायडू को विश्वास में ले आए थे।

नायडू ने की दोनों राज्यों के मुद्दों को सुलझाने की पहल
अब अपने समकक्ष को लिखी चिट्ठी में नायडू ने कहा है,'विभाजन के 10 वर्ष हो चुके हैं....यह आवश्यक है कि हम इन मसलों को पूरी तत्परता के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके सुलझाएं....'

आंध्र प्रदेश के सीएम ने कहा है, 'इसके आलोक में, मेरा प्रस्ताव है कि 6 जुलाई की दोपहर को हम आपके आवास पर मिलें। मेरा पूरा विश्वास है कि आमने-सामने की बैठक से हमें इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक रूप से बातचीत करने और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए पारस्परिक तौर पर लाभकारी समाधान प्राप्त करने की दिशा में प्रभावी रूप से सहयोग का अवसर मिलेगा। मुझे भरोसा है कि हमारी चर्चा से उत्पादक परिणाम निकलेंगे।'

आंध्र और तेलंगाना के बीच लंबित हैं लगभग 14 मामले
नायडू ने रेड्डी से दोनों तेलुगू भाषी राज्यों की प्रगति और समृद्धि के लिए परस्पर सहयोग पर भी जोर दिया है। दोनों राज्यों के बीच लगभग 14 ऐसे मामले हैं, जिसका अबतक हल नहीं निकल पाया है। इनमें दोनों प्रदेशों के एक-दूसरे पर बिजली का बकाया, 91 संस्थाओं का बंटवारा और कैश और बैंकों में जमा धनराशि का बंटवारा शामिल है। ये मुद्दे 2 जून, 2014 को आंध्र प्रदेश के विभाजन के समय से ही अटके पड़े हैं, जब इससे निकलकर तेलंगाना बना था।

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