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Azadi Ka Amrit Mahotsav: 'चाह नहीं मैं सुरबाला के... ' कहकर माखनलाल चतुर्वेदी ने किया सबको भावविभोर

नई दिल्ली, 9 अगस्त। आजादी के अमृत महोत्सव पर अगर कवि माखनलाल चतुर्वेदी का नाम ना लिया जाए तो ये गुस्ताखी होगी। 4 अप्रैल 1889 को जन्मे माखनलाल की कविताओं में प्रकृति प्रेम और अंग्रेजों के खिलाफ फैली उस वक्त की नफरत और गुलामी में सांस ले रहे देश का दर्द बखूबी छलकता है। वो एक मशहूर लेखक, कवि और पत्रकार थे। जिन्होंने अपने तीक्ष्ण शब्दों के बाण से अंग्रेजों को परेशान कर दिया था।

India@75: मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक

उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ ' प्रभा' और 'कर्मवीर' जैसे पत्रों का संपादन किया था। जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के गुस्से का भी शिकार होना पड़ा था लेकिन कहते है ना जिसने वतन से मोहब्बत कर ली, उसे फिर किसी और चीज का डर क्या होगा? माखनलाल चतुर्वेदी भी उसी में से एक थे, जिन्होंनें अंग्रेजों के डंडे के डर से अपनी कलम को ना तो झुकाया और ना ही रोका। उनकी रचनाएं आज भी दिलों में जोश भर देती हैं।

आइए एक नजर डालते हैं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि माखनलाल चतुर्वेदी की कुछ मशहूर कविताओं पर...

'पुष्प की अभिलाषा'

  • चाह नहीं मैं सुरबाला के
  • गहनों में गूँथा जाऊँ,
  • चाह नहीं, प्रेमी-माला में
  • बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
  • चाह नहीं, सम्राटों के शव
  • पर हे हरि, डाला जाऊँ,
  • चाह नहीं, देवों के सिर पर
  • चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
  • मुझे तोड़ लेना वनमाली
  • उस पथ पर देना तुम फेंक,
  • मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
  • जिस पर जावें वीर अनेक

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प्यारे भारत देश

तेरे पर्वत शिखर कि नभ को भू के मौन इशारे
तेरे वन जग उठे पवन से हरित इरादे प्यारे
राम-कृष्ण के लीलालय में उठे बुद्ध की वाणी
काबा से कैलाश तलक उमड़ी कविता कल्याणी

बातें करे दिनेश
प्यारे भारत देश।।

जपी-तपी, संन्यासी, कर्षक कृष्ण रंग में डूबे
हम सब एक, अनेक रूप में, क्या उभरे क्या ऊबे
सजग एशिया की सीमा में रहता केद नहीं
काले गोरे रंग-बिरंगे हममें भेद नहीं

श्रम के भाग्य निवेश
प्यारे भारत देश।।

वह बज उठी बासुँरी यमुना तट से धीरे-धीरे
उठ आई यह भरत-मेदिनी, शीतल मन्द समीरे
बोल रहा इतिहास, देश सोये रहस्य है खोल रहा
जय प्रयत्न, जिन पर आन्दोलित-जग हँस-हँस जय बोल रहा,

जय-जय अमित अशेष
प्यारे भारत देश।।

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