Justice DY Chandrachud बने देश के CJI, जानिए कैसा रहा है अब तक का सफर
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (Justice DY Chandrachud) ने बुधवार को देश के नए सीजेआई के तौर पर शपथ ली। उनका कार्यकाल तकरीबन दो साल का होगा और वे 11 नवंबर 2024 को रिटायर होंगे। पूर्व चीफ जस्टिस यूयू ललित ने डीवाई चंद्रचूड़ के नाम का प्रस्ताव रखा था, जिसके बाद आज उन्हें राष्ट्रपति ने शपथ दिलाई।

व्यक्तिगत जीवन
जस्टिस चंद्रचूड़ के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उनका जन्म 11 नवंबर 1959 को हुआ था। उनका पूरा नाम धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ है। उनके पिता का नाम जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ है, जोकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर सबसे लंबे समय तक रहने वाले जज हैं। जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ 22 फरवरी 1978 से लेकर 11 जुलाई 1985 तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। जस्टिस चंद्रचूड़ की मां का नाम प्रभा था, जोकि शास्त्रीय संगीतज्ञ थीं।

बतौर जज
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बात करें तो उन्हें 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया था। इससे पहले वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। जस्टिस चंद्रचूड़ को 31 अक्टूबर 2013 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने करियर की शुरुआत 29 मार्च 2000 से बॉम्बे हाई कोर्ट के जज के तौर पर की थी। जिसके बाद वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। यही नहीं जस्टिस चंद्रचूड़ बॉम्बे हाई कोर्ट के जज के पद पर नियुक्त होने से पहले 1998 से 2000 तक अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया थे। उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट ने जून 1998 में सीनियर एडवोकेट के तौर पर नियुक्त किया था। जस्टिस चंद्रचूड़ इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट में एडवोकेट थे।

कई जगह पर रहे विजिटिंग प्रोफेसर
जस्टिस चंद्रचूड़ का करियर काफी मिलाजुला रहा है, वह ना सिर्फ कानून के बेहतर जानकार के तौर पर जाने जाते हैं बल्कि उन्हें व्यवहारिक जानकारी का भी अच्छा अनुभव है। इसके साथ ही वह शैक्षिक स्तर पर भी काफी अनुभवी हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ मुंबई यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं, वह यहां पर तुलनात्मक संवैधानिक कानून (Comparative Constitutional Law) पर लेक्चर देते थे। इसके साथ ही वह अमेरिका के ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ में भी विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया भाषण
जस्टिस चंद्रचूड़ ने ना सिर्फ विजिटिंग प्रोफेसर की भूमिका निभाई है बल्कि वह ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल, येल लॉ स्कूल और दक्षिण अफ्रीका के यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटर्सरैंड में भी लेक्चर दे चुके हैं। यूनाइटेड नेसंश द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में वक्ता रह चुके हैं। साथ ही यूनाइटेड नेसंश हाई कमिशन ऑन ह्मून राइट्स, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन, यूनाइटेड नेसंश इनवॉयरमेंट प्रोग्राम, वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक में भी भाषण दे चुके हैं।

सेंट स्टीफेंस से की पढ़ाई
जस्टिस चंद्रचूड़ की पढ़ाई की बात करें तो उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स ऑनर्स किया है। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की। उन्होंने एलएलएम की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के हॉर्वर्ड लॉ स्कूल से ज्यूडिशियल साइंसेज से डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी की।

महिलाओं के अधिकार, व्यक्तिगत अधिकार पर जोर
अगर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा मुकदमों की सुनवाई की बात करें तो उन्होंने तकरीबन हर बड़े फैसले में हिस्सा लिया है। जस्टिस चंद्रचूड़ का रवैया सुधारवादी जज के तौर पर रहा है। महिलाओं के अधिकार, मौलिक अधिकार, नागरिकों की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के वह पक्षधर रहे हैं। हाल ही में अकेली महिलाओं को लेकर फैसला दिया था कि उन्हें भी सुरक्षित गर्भपात कराने का पूरा अधिकार है।। इसके अलावा सेना में महिलाओं की सहभागिता पर जोर देते हुए उन्हें स्थायी तौर पर नियुक्त किए जाने का फैसला सुनाया।

कई बड़े फैसले दिए
यही नहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने व्यक्तिगत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया। सेना और नौसेना में महिलाओं की शॉर्ट टर्म सेवा को स्थायी कमीशन के तौर पर रखने को बरकरार रखा। यही नहीं जस्टिस चंद्रचूड़ महिलाओं को अपनी पसंद से शादी करने के अधिकार के भी पक्षधर रहे। सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म की उम्र की महिलाओं के प्रवेश की भी उन्होंने तरफदारी की और उनके इस अधिकार को बरकरार रखा। निजता मौलिक अधिकार है, इसको लेकर 9 जजों की संवैधानिक बेंच का भी जस्टिस चंद्रचूड़ हिस्सा थे। पांच जजों की बेंच जिसने रामजन्मभूमि पर फैसला दिया उसमे भी जस्टिस चंद्रचूड़ शामिल थे। हाल ही में ज्ञानवापी मस्जिद केस में जस्टिस चंद्रचूड़ ने वाराणसी के डीएम को आदेश दिया था कि जहां पर कथित रूप से शिवलिंग पाया गया है, उस इलाके को सुरक्षित किया जाए। साथ ही यह आदेश भी दिया कि मुसलमानों को यहां नमाज अदा करने से ना रोका जाए।












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