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1999 में जयललिता ने एक वोट से कैसे गिरा दी थी वाजपेयी सरकार? दिलचस्प है किस्सा

भारतीय राजनीति के लिए 17 अप्रैल, 1999 एक तारीख बन चुकी है। इस दिन अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार का विश्वास प्रस्ताव संसद में सिर्फ एक वोट से गिर गया। यह सब जिस तरह से हुआ वह देश की संसदीय राजनीति के लिए एक किस्सा बन चुका है।

लोकसभा में वाजपेयी सरकार का विश्वास प्रस्ताव 269 के मुकाबले 270 वोटों से गिरा था। इससे पहले अपने पहले कार्यकाल में अटलजी की सरकार लोकसभा में आवश्यक बहुमत नहीं जुटा पाने की वजह से सिर्फ 13 दिन ही चल पाई थी।

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एक वोट से गिरी थी वाजपेयी सरकार
17 अप्रैल, 1999 को लोकसभा में सदन के अंदर कई चीजें ऐसी हुईं, जो भारतीय राजनीति की इतिहास में दर्ज हो चुकी है। वाजपेयी सरकार को सत्ता से बेदखल करने की कोशिशों की शुरुआत सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से आयोजित एक टी-पार्टी से हुई थी। हालांकि हाल तक स्वामी बीजेपी की ओर से राज्यसभा में भी रहे हैं।

जयललिता ने अटल सरकार से समर्थन वापस लिया था
तब अटल सरकार की एक प्रमुख सहयोगी एआईएडीएमके की नेता जे जयललिता ने कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी से हाथ मिला लिया था और अटल सरकार को गिराने की बुनियाद तैयार कर दी गई थी। टी-पार्टी के करीब दो हफ्ते बाद ही जयललिता दिल्ली वापस लौटीं और तमिल नव वर्ष के मौके पर 14 अप्रैल को तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन से मुलाकत किया और वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेने की चिट्ठी सौंप दी। इसके बाद तत्कालीन पीएम वाजपेयी से कहा गया कि वह यह साबित करें कि संसद में उनकी सरकार बहुमत में है।

मायावती ने अचानक किया था विरोध में वोटिंग का ऐलान
17 अप्रैल को संसद पहुंचने तक तत्कालीन पीएम अटलजी को यकीन था कि लोकसभा में वह बहुमत का आंकड़ा जुटा लेंगे। उन्हें कहीं से भरोसा मिला था कि बीएसपी के पांच सांसद सरकार के पक्ष में मतदान करने वाले हैं। वाजपेयी के भरोसेमंद मंत्री दिवंगत प्रमोद महाजन ने पूरा अंकगणित तैयार कर रखा था। लेकिन, विश्वास मत पर मतदान की प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले लोकसभा में बसपा की नेता मायावतीं उठीं और सदन में ऐलान किया कि उनकी पार्टी बीजेपी के खिलाफ वोट करेगी। बसपा सुप्रीमो की इस घोषणा ने अटलजी और उनकी पूरी पार्टी को हैरानी में डाल दिया।

बसपा के बाद भी दो अप्रत्याशित घटनाएं हुईं
लेकिन, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। इसके बाद भी दो अप्रत्याशित घटनाएं हुईं, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। वाजपेयी सरकार की ओर से फ्लोर मैनेजमेंट देख रहे नेताओं को तबतक यकीन था कि बसपा के खिलाफ हो जाने के बाद भी अंतिम आंकड़ा उनकी सरकार के पक्ष में ही रहेगा। लेकिन, उनका अनुमान और भरोसा दोनों गलत साबित हुआ।

सैफुद्दीन सोज ने पार्टी के फरमान को नहीं माना
तब फारूक अबदुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस वाजपेयी सरकार की सहयोगी थी और विश्वास मत के पक्ष में वोटिंग का ऐलान कर चुकी थी। लेकिन, पार्टी के एक सांसद सैफुद्दीन सोज ने अपनी पार्टी के फरमान का उल्लंघन किया और विश्वास मत के खिलाफ वोट डाल दिया।

गिरिधर गमांग को सदन में देखकर हैरान रह गए थे लोग
दूसरी घटना तो भारतीय संसदीय इतिहास की अद्वितीय घटना साबित हुई। जब विश्वास मत के लिए तत्कालीन स्पीकर दिवंगत जीएमसी बालयोगी के निर्देश पर वोटिंग की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी, तभी सत्तापक्ष के लोगों की नजर सदन में मौजूद उड़ीसा (ओडिशा) के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता गिरिधर गमांग पर पड़ गई। सदन में हंगामा मच गया। वे 17 फरवरी, 1999 को उड़ीसा (अब ओडिशा) के सीएम नियुक्त हो चुके थे, लेकिन अभी तक उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था।

एक वोट से सरकार गिरने की घोषणा करते हुए भावुक हो गए थे स्पीकर
व्यवस्था का सवाल उठा। सत्तापक्ष ने नैतिकता का हवाला दिया। संसदीय नियम पढ़कर सुनाए गए। लेकिन, तकनीकी तौर पर गमांग की लोकसभा सदस्यता खत्म नहीं हुई थी, इसलिए उन्हें कांग्रेस के सदस्य के रूप में वोटिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेने की स्पीकर बालयोगी ने अनुमति दे दी; और वाजेपयी सरकार मात्र एक वोट से विश्वास प्रस्ताव हार गई। तब इसकी घोषणा करते हुए खुद लोकसभा अध्यक्ष भी बेहद भावुक हो गए थे।

हालांकि, इसके बाद जो लोकसभा चुनाव हुए उसमें वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और अपना कार्यकाल पूरा किया।

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