अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट 2008: 13 साल का इंतजार, 38 को फांसी, जानिए कैसे रची गई साजिश
अहमदाबाद, 18 फरवरी। वर्ष 2008 में अहमदाबाद में एक साथ अलग-अलग जगहों पर 21 सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इस धमाके के 13 साल बीतने के बाद आज कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 49 दोषियों में से 38 को फांसी की सजा सुनाई है जबकि 11 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार है जब एक साथ 38 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। दोषियों पर यूएपीए के तहत आरोप साबित किए गए और उन्हें सजा सुनाई गई है। बता दें कि 13 साल पहले 26 जुलाई 2008 में अहमदाबाद में 70 मिनट के भीतर 20 जगहों पर 22 धमाके किए गए थे। इस सीरियल ब्लास्ट में 56 लोगों की मौत हो गई थी। जबकि 240 लोग इस आतंकी हमले में घायल हुए थे।
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मुआवजे का ऐलान, दोषियों पर लगा लाखों का जुर्माना
इस मामले में सजा का ऐलान करते हुए कोर्ट ने ब्लास्ट में मारे गए लोगों के परिजनों को 1-1 लाख रुपए का मुआवजा देने को भी कहा है। साथ ही जो लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं उन्हें 50 हजार रुपए और मामूली रूप से घायलों को 25 हजार रुपए देने को कहा है। दोषियों में उस्मा अगरबत्तीवाला को को आर्म एक्ट के तहत फांसी की सजा सुनाई गई है जबकि उसे एक साल की अतिरिक्त जेल की सजा आर्म्स एक्ट में दोषी साबित होने के लिए सुनाई गई है। कोर्ट ने सबी 48 दोषियों पर 2.85-2.85 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। जबकि अगरबत्तीवाला पर 2.88 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है।

13 साल चली सुनवाई
इस पूरे मामले में 13 साल तक सुनवाई चली। सुनवाई के दौरान कई बार जज भी बदले लेकिन आज आखिरकार इस ब्लास्ट में दोषियों को सजा सुनाई गई। इस पूरे मामले को 19 दिन में ही सुलझा लिया गया था। । मामले में 30 आरोपियों को पकड़ा गया था, जबकि 35 से अधिक एफआईआर इस मामले में दर्ज की गई। जिसके बाद 2009 में इस ब्लास्ट को लेकर मुकदमा दायर किया गया। इस पूरे मामले में कुल 78 आरोपियों के खिलाफ केस चलाया गया और 1100 लोगों की इस मामले में गवाही हुई। केस में 521 चार्जशीट दाखिल हुई थी।

7 जज बदले गए
अहमदाबाद ब्लास्ट की सुनवाई 13 साल तक चली इस दौरान 7 जजों को बदला गया। 13 साल तक लंबे इंतजार के बाद आज आखिरकार 49 आरोपियों को दोषी करार दिया गया जबकि 28 को मामले में बरी कर दिया गया। इस हमले को इस तरह से अंजाम दिया गया था कि अधिक से अधिक लोगों की जान जाए। अहमदाबाद में गुजरात सिविल अस्पताल, एलजी अस्पताल, बस, पार्किंग में खड़ी बाइक और कारों में बम लगाए गए थे। अस्पताल में बम लगाने के पीछे मकसद यह था कि जब घायल यहां पहुंचे तो यहां भी उन्हें राहत ना मिले। कलोल और नरोदा में लगाए गए दो बम नहीं फटे थे। अहम बात है कि 2008 में जयपुर, बेंगलुरू के बाद अहमदाबाद तीसरा शहर था जहां पर विस्फोट हुआ था।

इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी जिम्मेदारी
तमाम मीडिया हाउस को भेजे गए ईमेल में इंडियन मुजाहिदीन ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। 27 जुलाई को भी इसी तरह के हमले सूरत में किए गए थे। यहां एक सफाई कर्मचारी रेडियो अपने घर ले गया था उसे लगा यह रेडियो है लेकिन इसमे बम रखा हुआ था। । 9 अगस्त तक कुल 29 लाइव बम को पुलिस ने ट्रैक करने में सफलता हासिल की थी, जिसमे से एक भी फटा नहीं क्योंकि इनकी बैटरी काफी लो वोल्टेज की थी। 2010 और 2011 में पुणे की जर्मन बेकरी और मुंबई
में भी विस्फोट को अंजाम दिया गया। जिसमे आरडीएक्स और एनएफओ का इस्तेमाल किया गया था।












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