अकेले रह गए 'व्यथित' आडवाणी
नई दिल्ली। नौवें दशक में भाजपा के सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लालकृष्ण आडवाणी शुक्रवार को तब अकेले रह गए जब पार्टी ने अगले आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम घोषित कर दिया। पार्टी ने इस मामले में आडवाणी की नाराजगी और आपत्तियों को दरकिनार कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद कद्दावर नेता आडवाणी (85) पार्टी के भीतर मोदी के पक्ष में हो रहे ध्रुवीकरण को पचापाने में असमर्थ रहे। उनकी दृष्टि में इसका वर्ष 2014 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है।
आडवाणी भाजपा नीत राष्ट्रीय-जनतांत्रिक गठबंधन के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और पार्टी के वर्तमान व संभावित राजनीतिक सहयोगी दलों के सबसे पसंदीदा नेता माने जाते हैं।
भाजपा सूत्रों ने कहा कि आडवाणी के साथ सुषमा स्वराज ने भी पार्टी के नेताओं से कहा था कि प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के बारे में कोई भी फैसला इस वर्ष के अंत में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद लिया जाए।
मोदी के नाम की घोषणा करने का हालांकि पार्टी में कुछ वरिष्ठ नेताओं से लेकर निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं का दबाव था।
सुषमा स्वराज और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी पार्टी का मूड और मोदी के पक्ष में व्यापक समर्थन को भांप गए और समर्थकों की कतार में जा खड़े हुए, लेकिन आडवाणी ने इससे खुद को दूर ही रखना बेहतर समझा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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