अपने ही जीते हुए विधायको पर आम आदमी पार्टी को नहीं भरोसा
नई दिल्ली। दिल्ली चुनावों में सभी पार्टियां अपना सब कुछ दांव पर लगा चुकी है। महज एक साल के भीतर दिल्ली में दुबारा विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो भाजपा और कांग्रेस ने अपने सभी जीते हुए उम्मीदवारों को इस बार भी टिकट दिया है। लेकिन आम आदमी पार्टी अपने जीते हुए उम्मीदवारों को इस बार टिकट देने में सबसे पीछे है।

भाजपा/अकाली दल ने 32 में से 29 को दिया टिकट
भारतीय जनता पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव कुल 32 सीटें जीती थी। भाजपा ने 32 में से 29 जीते हुए उम्मीदवारों को टिकट दिये हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि जिन तीन उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया गया है वो तीनों ही लोकसभा चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच चुके हैं। डॉ हर्षवर्धन, परेश शर्मा और रमेश बिधुड़ी को भाजपा ने इस बार टिकट नहीं दिया है। ये तीनों ही उम्मीदवार सांसद बन गये हैं जिनकी जगह पर भाजपा ने अन्य उम्मीदवारों को टिकट दिया है।
कांग्रेस ने 8 में से 7 उम्मीदवारों को दिये टिकट
वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में अगर कांग्रेस की स्थिति पर नजर डालें तो कांग्रेस ने भी 8 जीते हुए उम्मीदवारों में से 7 उम्मीदवारों को इस बार के चुनाव में टिकट दिया हैं। एक मात्र उम्मीदवार जिन्हें कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया है वो अरविंदर सिंह लवली हैं। यहां गौर करने वाली बात ये है कि लवली ने खुद ही विधानसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया था जिसके चलते पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया है।
आम आदमी पार्टी ने 28 में से सिर्फ 21 को दिये टिकट
आम आदमी पार्टी ने इस चुनाव में अपने जीते हुए उम्मीदवार में से 21 को टिकट दिये हैं। गौर करने वाली बात है कि जिन 7 उम्मीदावारों को आप ने टिकट नहीं दिया है उनमें से 2 जीते हुए विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। विनोद कुमार बिन्नी और एम एस धीर ने हाल ही में भाजपा की सदस्यता ली है जिन्हें भाजपा ने इस विधान सभा चुनाव के लिए टिकट दिया है।
लेकिन जिन पांच उम्मीदवारों को आप ने टिकट नहीं दिया उनके बार में पार्टी की ओर कोई भी बयान नहीं दिया गया है। हरीश खन्ना, राजेश गर्ग, वीना आनंद, अशोक कुमार, धर्मेंद्र सिंह ये आम आदमी पार्टी के जीते हुए उम्मीदवार हैं। गौर करने वाली बात यह है कि ये पांचों उम्मीदवार ना तो मीडिया के सामने आये ना ही पार्टी ने इनके बारे में कोई बयान दिया।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि इन पांचो उम्मीदवारों ने खुद चुनाव लड़ने से मना कर दिया, या इन उम्मीदवारों ने पार्टी की नीतियों से नाराज होकर पार्टी से किनारा कर लिया। वहीं पार्टी ने इन उम्मीदवारों के उपर कोई भी आरोप भी नहीं लगाया है, फिर सवाल यह उठता है कि एक साल के भीतर ऐसा क्या हुआ कि इन उम्मीदवारों के जीतने पर आम आदमी पार्टी को शक होने लगा।









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