बिक रही है ये झील, कीमत इतनी कि होश उड़ा दे

आपने कई चीजें बिकती हुई देखी होंगी, लेकिन इस बार एक पूरी की पूरी झील ही बिकने के लिए तैयार है। इस झील का कुल क्षेत्रफल करीब 13 एकड़ और 24 गुंटास (लगभग 6 फुटबॉल के मैदानों के बराबर) है। यह झील बेंगलरु-चेन्नई एक्सप्रेसवे के बगल में है, जिससे इसकी कीमत और अधिक बढ़ गई है। आपको बता दें कि यह एक्सप्रेसवे तकनीक के हब कोरामंगला से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक इस झील की कीमत 400 करोड़ रुपए रखी गई है। फिलहाल लैंड शार्क (झील) और पर्यावरण की सुरक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच होसुर रोड (Hosur Road) के समीप स्थित इस गार्वेभावी पाल्या झील को लेकर केस चल रहा है। यह लड़ाई तब से जारी है, जब से इस झील के मालिकाना हक के दस्तावेज एक परिवार के नाम पर पाए गए हैं।

कार्यकर्ताओं को जब परिवार द्वारा इस झील (या जमीन) के बेचे जाने के इरादे का पता चला तो उन्होंने खुद को उस परिवार के सामने एक खरीदार की तरह प्रस्तुत किया और परिवार के उस जमीन के दस्तावेज ले लिए। इन दस्तावेजों में एक ऐसी फाइल है, जिसमें मुख्य मंत्री सिद्धारमैया ने अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए कहा है। इससे यह बात सत्यापित होती है कि परिवार द्वारा जमीन का मालिकाना मांगे जाने की मांग पर मुख्यमंत्री ने भी मुहर लगा दी है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मुख्यमंत्री के पास ऐसा करने का अधिकार है भी या नहीं।

दस्तावेजों में अगस्त 2014 का कर्नाटक हाईकोर्ट का भी एक निर्देश है, जिसमें बेंगलुरु के स्पेशल डिप्टी कमिश्नर को जमीन का मालिकाना हक उस परिवार के नाम पर करने को कहा गया है। ब्रूहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) के सलाहकार शरद बाबू आर ने इन दस्तावेजों को लेकर स्पीकर केबी कोलिवाड़ से शिकायत की है, जो कि बेंगलुरु में झील अतिक्रमण की कमेटी के प्रमुख हैं।

गार्वेभावी पाल्या झील की ये कहानी शुरू हुई थी 1973 में जब मुनिस्वामप्पा नाम के एक शख्स ने इसे 13 एकड़ 23 गुंटास की इस जमीन को खरीजा था और होंगासान्द्रा गांव के 41 नंबर के सर्वे के तहत रजिस्टर कराया था। 1974 में मुनिस्वामप्पा की मौत के बाद उनके परिवार वालों ने उस जमीन को अपने नाम करवा लिया।

कुछ समय बाद परिवार ने हाईकोर्ट में दावा किया कि झील के आसपास की करीब 3 एकड़ जमीन का मालिकाना हक सर्वे संख्या 41 के अनुसार उनके पास है। हालांकि, कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया था। अप्रैल 1996 में बेंगलुरु जिले के स्पेशल डिप्टी कमिश्नर ने कर्नाटक लैंड रिफॉर्म एक्ट की धारा 136(3) के तहत कार्रवाई की और बेंगलुरु साउथ तालुक तहसीलदार को आदेश दिए कि सर्वे संख्या 41 के आधार पर उस जमीन पर मालिकाना हक जताने वाले परिवार का नाम हटा दिया जाए।

ऐसा करने की पीछे उनका कहना था कि वह जगह एक झील है, इसलिए उसे राज्य सरकार के नाम पर कर दिया गया। इसके बाद मुनिस्वामप्पा के परिवार वालों ने कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर की, लेकिन तब भी कोर्ट ने स्पेशल डिप्टी कमिश्नर के आदेश को जस का तस रखा।

2009 में हाईकोर्ट के आदेश पर स्पेशल डिप्टी कमिश्नर ने एक जांच शुरू की, जिसमें मालिकाना हक का दावा करने वाले परिवार ने अपने तथ्य प्रस्तुत किए। परिवार ने कहा कि उन्होंने कोर्ट से सर्वे के तहत झील के आस-पास की 3 एकड़ जमीन का मालिकाना हक मांगा था। परिवार ने आरोप लगाते हुए कहा कि कमिश्नर ने बिना उन्हें बताए ही जमीन (झील) का मालिकाना हक सरकार के नाम कर दिया। अगस्त 2014 में हाईकोर्ट ने स्पेशल डिप्टी कमिश्नर को आदेश दिया कि जमीन का मालिकाना हक परिवार वालों के नाम कर दिया जाए।

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