भारतीय जेलों में 77% क़ैदी विचाराधीन, आधे बिता चुके हैं 3 महीने से 2 साल
26 नवम्बर को संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सवाल उठाया कि अगर देश विकास की तरफ जा रहा है तो और देश में ज़्यादा जेलें बनाने की क्या ज़रूरत है, बल्कि उन्हें कम किया जाना चाहिए.
ये बात मुर्मू ने इस सन्दर्भ में कही कि अक्सर ये बात होती है कि चूंकि जेलों में भीड़ बढ़ गई है इसलिए और ज़्यादा जेलें बनाई जानी चाहिए. आंकड़े भी यही बताते हैं कि क़ैदियों की भीड़ से जूझती भारत की जेलें एक विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी हैं.
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की जेलों की स्थिति पर ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया कि 31 दिसंबर 2021 तक देश की कुल 1,319 जेलों में औसतन हर 100 क़ैदियों के लिए निर्धारित जगह में 130 क़ैदी रह रहे थे.
इस आंकड़े को समझने में ध्यान देने की बात ये है कि ये देशभर की जेलों की कुल क्षमता और कुल आबादी पर आधारित राष्ट्रीय औसत है.
बहुत-सी जेलों में क़ैदियों की संख्या इस राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा है. मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश की ज़िला जेलों में हर 100 क़ैदियों के लिए उपलब्ध जगह में 208 क़ैदी और उत्तराखंड की उप-जेलों में हर 100 क़ैदियों के लिए जगह में क़रीब 300 क़ैदी रह रहे थे.
सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?
सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर जेलों में बढ़ती भीड़ पर चिंता जताती रही है. इसी साल जुलाई में इस विषय पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने कहा था कि आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रक्रिया ही सज़ा बन गई है.
उन्होंने कहा कि अंधाधुंध गिरफ्तारी से लेकर जमानत हासिल करने में आ रही मुश्किलों की वजह से विचाराधीन क़ैदियों को लंबे समय तक क़ैद में रखने की प्रक्रिया पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है.
साथ ही जस्टिस रमन्ना ने ये भी कहा था कि बिना किसी मुक़दमे के बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक क़ैद में रखने पर ध्यान देने की ज़रूरत है और उन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाया जाना चाहिए जिनकी वजह से ऐसे हालत बनते हैं जिनमें एक बड़ी संख्या में लोगों को बिना किसी मुक़दमे के लम्बे समय तक क़ैद में रखा जा रहा है.
कौन हैं वो लोग जिनसे ये जेलें भरी पड़ी हैं? आइए इन आठ चार्ट्स की मदद से समझते हैं.
31 दिसंबर, 2021 तक भारतीय जेलों में कुल 5,54,034 क़ैदी थे. लेकिन इसमें से 22 प्रतिशत क़ैदी ही ऐसे थे जिनका दोष साबित हो चुका था और वे उसकी सज़ा काट रहे थे. बाक़ी 77.1 प्रतिशत क़ैदी (4,27,165 क़ैदी) अंडरट्रायल या विचाराधीन क़ैदी थे जिनका दोष अभी साबित नहीं हुआ था.
पिछले कुछ सालों में भारतीय जेलों में विचाराधीन क़ैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. साल 2020 की तुलना में साल 2021 में भारतीय जेलों में अंडरट्रायल क़ैदियों की संख्या क़रीब 15 फ़ीसदी बढ़ गई.
कुल 4,27,165 विचाराधीन क़ैदियों में से क़रीब 51 फ़ीसदी ज़िला जेलों में बंद थे और 36 फ़ीसदी सेंट्रल जेलों में.
जेलों में इतनी ज़्यादा संख्या में अंडरट्रायल क़ैदियों का होना न केवल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के कामकाज पर एक सवालिया निशान लगाता है, बल्कि जेलों में बंद क़ैदियों के लिए अमानवीय स्थिति भी पैदा करता है.
जेलों में भीड़ की बड़ी वजह यही है कि अंडरट्रायल क़ैदियों के मामले लम्बे समय तक चलते रहते हैं.
एनसीआरबी के आंकड़ो पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश वो तीन राज्य हैं जहां एक से दो साल तक जेल में रहने वाले अंडरट्रायल क़ैदियों की संख्या सबसे ज़्यादा है.
अंडरट्रायल क़ैदी के तौर पर जेल में तीन महीने से दो साल तक का समय बिता चुके क़ैदियों की संख्या 2.13 लाख है जिसमें 8,822 महिलाएं भी शामिल हैं.
अदालतों में लंबित मामलों का पहाड़
देशभर की निचली अदालतों में मामले सालों-साल चलते रहते हैं और इन मामलों में आरोपी के तौर पर गिरफ्तार किए गए लोग अंडरट्रायल के तौर पर जेलों में बंद रहते हैं.
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के डाटा के मुताबिक़ देशभर की ज़िला और तालुका अदालतों में क़रीब 4.2 करोड़ मामले लंबित हैं. इन 4.2 करोड़ मामलों में से 60 फ़ीसदी ऐसे हैं जो एक साल से ज़्यादा पुराने हैं.
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कुल सिविल और क्रिमिनल पेंडेंसी की मामलों में से 20 फ़ीसदी से ज़्यादा तीन से दस साल तक लंबित थे. इन्हीं दो राज्यों में कुल लंबित मामलों में से क़रीब आठ फ़ीसदी ऐसे थे जो 10 साल से 30 साल तक लंबित थे.
जेलों में दोषी क़ैदी घटे, विचाराधीन बढ़े
साल 2016 से 2021 के बीच भारतीय जेलों में कुल क़ैदियों की संख्या में 28 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जहां दोषी साबित हो चुके क़ैदियों की संख्या में 9.5 फ़ीसदी की कमी आई, वहीं अंडरट्रायल क़ैदियों की संख्या में 45.8 फ़ीसदी का उछाल आया.
उत्तर प्रदेश और बिहार की जेलों में ही देश के कुल अंडरट्रायल क़ैदियों में से 35 फ़ीसदी क़ैदी हैं.
जेलों में बंद अंडरट्रायल क़ैदियों के बारे में एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा ये है कि तक़रीबन 48 फ़ीसदी अंडरट्रायल क़ैदी 18 से 30 साल की उम्र के हैं.
तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण समय के कई क़ीमती महीने और साल ये अंडरट्रायल क़ैदी जेल में इस इंतज़ार में बिता देते हैं कि उनके मामले का फ़ैसला हो जाए.
25 फ़ीसदी अंडरट्रायल अनपढ़
भारत में क़ैदियों का एक बड़ा वर्ग सामाजिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आता है जिसकी वजह से बहुत से क़ैदी साक्षर नहीं होते. इसका सबसे बड़ा नुक़सान ये भी होता है कि वे अपने मामले से जुड़े दस्तावेज़ों को न पढ़ पाते हैं और न ही क़ानूनी प्रक्रियाओं को समझ पाते हैं. बहुत से अंडरट्रायल क़ैदियों को क़ानून के तहत मिलने वाले अधिकारों तक की जानकारी नहीं होती.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी संविधान दिवस पर दिए अपने भाषण में कहा था कि जेलों में बंद बहुत से लोगों को न तो अपने मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में पता है और न ही संविधान की प्रस्तावना के बारे में.
राष्ट्रपति मुर्मू ने ये भी कहा था कि इनमें से कई क़ैदी इसलिए भी जेल से बाहर नहीं आना चाहते क्योंकि उन्हें बाहर आने पर समाज के उनके साथ संभावित बुरे बर्ताव की चिंता होती है.
कैसे घट सकती है जेलों की भीड़
पिछले कई सालों से ये लगातार चर्चा का विषय रहा है कि जेलों में भीड़ कम करने के लिए क़दम उठाए जाने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर इस बात पर चिंता जताती रही है.
इसी चर्चा का क्रियान्वन इस साल जुलाई देखने को मिला जब नेशनल लीगल सर्विसिज़ ऑथॉरिटी (नालसा, एनएएलएसए) ने आज़ादी के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में उन अंडरट्रायल क़ैदियों की पहचान करने के लिए एक अभियान चलाया जिन्हें तय की गई 16 शर्तों के मुताबिक़ रिहा किया जा सकता है.
16 जुलाई से 13 अगस्त के बीच चलाए गए इस अभियान में अंडरट्रायल रिव्यू कमिटियों की सिफ़ारिशों पर 24,789 अंडरट्रायल क़ैदियों को रिहा किया गया जिससे जेलों में बंद कुल क़ैदियों की संख्या में 4.47 प्रतिशत की कमी आई.
जिन राज्यों से सबसे ज़्यादा अंडरट्रायल क़ैदी रिहा किए गए उनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और दिल्ली थे.
तो अगर एक महीने से भी कम के अभियान में जेलों की भीड़ क़रीब पांच फ़ीसदी घटाई जा सकती है तो क्या इस तरह के अभियान को चलाकर इस समस्या से और बेहतर तरीक़े से नहीं निपटा जा सकता?
क्या है समाधान?
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं जेलों में बढ़ रही भीड़ की वजह से पैदा हो रही स्थिति केवल राष्ट्रपति की परेशानी नहीं है बल्कि ये पूरे देश के लिए परेशानी की बात है.
उनका मानना है कि जेल सुधारों पर कोई दीर्घकालिक योजना का न होना इस समस्या की एक बड़ी वजह है. लेकिन साथ ही वे ये भी कहते हैं कि इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है.
विक्रम सिंह कहते हैं, "जस्टिस कृष्णा अय्यर ने कहा कि नियम 'जेल नहीं, बेल' होना चाहिए. लेकिन आज नियम बन गया है 'बेल नहीं, जेल'. सात साल तक की सज़ा वाले अपराध में तो किसी भी आरोपी को जेल जाना ही नहीं चाहिए. हक़ीक़त ये है कि किसी ने किसी को थप्पड़ मार दिया तो भी जेल, किसी ने जेब काट ली तो भी उसे जेल भेजा जा रहा है."
वे कहते हैं कि जेलों में जो 70 साल से ज़्यादा उम्र के क़ैदी हैं, जो बीमार हैं, बूढ़े हैं या विकलांग हैं और जो अपनी सज़ा का एक बड़ा हिस्सा काट चुके हैं, उन्हें रिहा किया जा सकता है.
वे कहते हैं, "ये तो जेल मैन्युअल भी कहता है. अगर इतना भी कर लिया जाए तो जेलों में भीड़ की समस्या से निपटा जा सकता है. अतीत में हमने देखा है कि रविवार के दिन लोक अदालतें लगाकर हज़ारों मामलों का निपटारा कर दिया जाता था."
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव में प्रिज़न प्रोग्राम की प्रमुख मधुरिमा धनुका कहती हैं, "नालसा जैसे अभियानों का स्वागत करना चाहिए, लेकिन राज्य और ज़िला स्तर पर जेलों में बढ़ती भीड़ की नियमित निगरानी ज़रूरी है. आज हर ज़िले में जेलों में भीड़ की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के जज मौजूद हैं. हर जेल की ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ की नियमित रिपोर्ट मांगी जानी चाहिए और जेलों में कैदियों की संख्या कम करने के उपाय किए जाने चाहिए."
"अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटी के मदद से शीघ्र ट्रायल, गिरफ़्तारों की विवेचना और वैधानिक ज़मानत को लागू करके क़ैदियों की आबादी को घटाने के लिए अधिक वैज्ञानिक नज़रिया अख़्तियार करने की ज़रूरत है."
मधुरिमा कहती हैं, "हमें सवाल करना चाहिए कि जब सरकारी स्कूल क्षमता से अधिक स्टूडेंट को स्वीकार नहीं करते, सरकारी अस्पताल भी ऐसा ही करते हैं तो जेलों में उनकी क्षमता से अधिक क़ैदी क्यों भरे जाते हैं?"
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