26 /11 के छह साल बाद भी नहीं मिले हैं कुछ सवालों के जवाब
मुंबई। पहले हिस्से में आपने पढ़ा (CLICK ON PREVIOUS) कि अमेरिका की जेल में बंद डेविडे कोलमेन हेडली को भारत लाना खुद नरेंद्र मोदी के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। वहीं अब जानिए कि आखिर क्यों इन हमलों के छह वर्षों के बाद भी कुछ सवालों के जवाब तलाशने के बाद भी नहीं मिल पाए हैं।

हमलों से जुड़े कुछ सवाल जैसे हमलों का लोकल कनेक्शन, डेविड हेडली की मदद करने वाले तहवुर राणा के खिलाफ केस और सबसे अहम इन हमलों का मास्टरमाइंड अभी तक पाकिस्तान में है और उसके खिलाफ केस, यह और इस जैसे कई सवाल हैं जिनका जवाब हासिल करना बड़ी ही टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
मुंबई क्राइम ब्रांच की खामी
मुंबई हमलों की जांच काफी कठिन प्रक्रिया रही, इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। लेकिन नहीं मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को आज तक जांच को सही तरीके से ना कर पाने की आलोचना का सामना करना पड़ता है।
रॉ के पूर्व अधिकारी वी बालचंद्र की मानें तो जांच को करीब से देखने पर उन्हें इस बात का अहसास होता है कि पुलिस ने जांच में कई गलतियां कीं। उन्होंने जांच को बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ाया और जांच पूरी तरह से अजमल कसाब के कुबूलनामे पर टिकी थी।
बालचंद्र की मानें तो कसाब ने जो कुछ भी किया उसे पूरी दुनिया ने देखा और ऐसे में अगर उसे सजा हो सकी, तो बालचंद्र को नहीं लगा कि इसमें कोई खास तरह से जांच की गई होगी।
वह तो यहां तक कहते हैं कि क्राइम ब्रांच को खुद को भाग्यशाली समझना चाहिए कि वह कसाब के साथ ही 10 आतंकियों को जिंदा पकड़ सके।
जांच में गड़बड़ियां
वी बालचंद्र ने वनइंडिया को बातचीत में बताया कि पुलिस ने जहां सबसे ज्यादा गड़बड़ी की, वह था इन हमलों से जुड़े स्थानीय लिंक को ठीक तरह से न देख पाना। वह कहते हैं कि इस बात के सुबूत थे कि डीजल के एक बड़े घोटाले से जुड़ी एक महिला ने 10 आतंकियों को मुंबई में दाखिल करने में मदद की और फिर भी इस पर कुछ नहीं किया जा सका।
यहां तक कि इन आतंकियों को हमले से एक दिन पहले ही मुंबई में ही जगह दी गई थी और फिर इसके बाद उन्होंने 26 नवंबर को शहर में अपने कदम रखे। पुलिस ने तो जांच के दौरान इस पहलू को छुआ तक नहीं। इसके बजाय उन्होंने फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद की जांच करने का फैसला किया।
गवाही न होने की वजह से छूटे दो आतंकी
अभियोजन पक्ष लगातार इन दोनों के ही खिलाफ गवाही जुटा पाने में नाकामयाब रहा। सही मायनों में अगर देखा जाए तो इन दोनों गैर भारतीय नागरिकों के खिलाफ जांच करने में जल्दबाजी दिखाई गई।
वी बालचंद्र के मुताबिक पुलिस का दावा था कि उन्हें इन दोनों ही आतंकियों के पास से शहर का नक्शा बरामद हुआ है। वहीं यह बात भी काफी चौंकाने वाली थी कि दोनों आतंकियों के पास से जो नक्शा बरामद हुआ उसमें एक सिकुड़न तक नहीं थी जबकि खून के धब्बे मौजूद थे।
जब सबाउद्दीन और फहीम को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सीआरपीएफ पर हमले से जुड़े केस में पकड़ा था, तो उन्होंने इस बात को कुबूल किया था कि सीआरपीएफ पर एक हमले की साजिश बनाई गई थी।
इनके कुबूलनाम के बाद इन्होंने बताया कि मुंबई की कुछ जगहों पर उन्होंने सर्वे किया था ताकि वह इन्हें अपना टारगेट बना सके।लेकिन मुंबई ब्रांच इनसे किसी भी तरह का सच नहीं कुबूल करा सकी। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट को भी इन दोनों को रिहा करना पड़ गया।












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