अगर एनडीए से अलग होते हैं कुशवाहा तो बीजेपी को होगा कितना नुकसान?
नई दिल्ली। 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी-जेडीयू में सीट शेयरिंग फॉर्म्यूला फाइनल होने के बाद बिहार में सियासत गरमाने लगी है। सूबे के प्रमुख सियासी दलों के बीच मुलाकात और बातचीत का दौर शुरू हो चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या आगामी आम चुनाव से पहले बिहार में एनडीए गठबंधन का पूरा स्वरूप बदल चुका रहेगा? ये सवाल इसलिए क्योंकि शुक्रवार को जैसे ही नीतीश कुमार और अमित शाह ने सीट शेयरिंग फॉर्म्यूले का ऐलान किया उसके कुछ देर बाद ही बिहार में तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा के मुलाकात की तस्वीरें सामने आ गई। हालांकि इस मुलाकात को लेकर दोनों नेताओं ने साफ किया ये औपचारिक मुलाकात है। लेकिन जानकारों के मुताबिक कहीं न कहीं ये आगे आने वाले समय में नए सियासी समीकरण की भी एक तस्वीर हो सकती है। अगर ऐसा होता है और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए से अलग होते हैं तो क्या ये एनडीए और खास तौर पर बीजेपी के लिए नुकसान का सौदा होगा या फिर फायदे का?

क्या एनडीए से अलग हो जाएंगे कुशवाहा?
चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख के मुताबिक अगर उपेंद्र कुशवाहा एनडीए से अलग होते हैं इससे गठबंधन को ज्यादा नुकसान नहीं होगा। इसके लिए उन्होंने पिछले चुनाव के आंकड़े भी पेश किए हैं। यशवंत देशमुख ने ट्वीट करके बताया कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने एनडीए गठबंधन के साथ थी लेकिन पार्टी अकेले दम पर वोट शेयर महज 3 फीसदी का रहा था। दूसरी ओर उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 फीसदी वोट शेयर हासिल किया था।
वोट शेयर के मामले में जेडीयू से काफी पीछे है आरएलएसपी
कुल मिलाकर वोट शेयर के मामले में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी से नीतीश कुमार की जेडीयू ने पांच गुना ज्यादा वोट शेयर हासिल किए थे। इस बार सियासी समीकरण बदल गए हैं नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए हैं। उनके एनडीए से इस बात की पूरी संभावना है कि गठबंधन का वोट शेयर और बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में अगर उपेंद्र कुशवाहा एनडीए से अलग भी होते हैं तो बीजेपी को इसका खास मलाल नहीं होगा। खुद चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख ने भी ट्वीट में कहा है कि बीजेपी आलाकमान ने उपेंद्र कुशवाहा को गुडबॉय करने का मन बना लिया है।

तो इसलिए बीजेपी अध्यक्ष ने नहीं लिया था उपेंद्र कुशवाहा का नाम
इस बात का खुलासा एक तरह से शुक्रवार को अमित शाह की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखने को मिला था। जब उन्होंने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार के सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता सुशील मोदी और एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान एनडीए का नेतृत्व करेंगे और चुनाव प्रचार में अहम जिम्मेदारी निभाएंगे। हालांकि अमित शाह ने इस दौरान आरएलएसपी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा का नाम तक नहीं लिया। कहीं न कहीं इसे ये संकेत माना जा सकता है कि भाजपा, जेडीयू को सम्मानजनक सीटें देने के फेर में कुछ अपनी सीटों की कुर्बानी देने के साथ-साथ आरएलएसपी की भी कुर्बानी ले सकता है।

तेजस्वी से मुलाकात के बाद गरमाई सियासत
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा होने की पूरी संभावना नजर आ रही है। इसका अंदाजा इसलिए भी लगाया जाने लगा है क्योंकि दिल्ली में नीतीश कुमार और अमित शाह की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद बिहार के अरवल से एक सियासी तस्वीर सामने आई, जहां आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, उपेंद्र कुशवाहा से मिलने पहुंचे थे। इस मुलाकात के बाद सियासी गलियारे में चर्चा का बाजार गर्म हो गया।

क्या होगा उपेंद्र कुशवाहा का फैसला?
हालांकि तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा की अरवल के सर्किट हाउस में हुई इस मुलाकात को लेकर जल्दी ही राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के मुखिया ने ज्यादा कुछ नहीं कहते हुए इसे एक औपचारिक बातचीत बताया। कुशवाहा ने कहा कि सीटों के बंटवारे को लेकर अभी कुछ तय नहीं हुआ है। हालांकि उनके इस बयान के बाद कयास लगने लगे कि क्या कुशवाहा सीटों की संख्या का इंतजार कर रहे हैं। सीट शेयरिंग फॉर्म्यूले में कितनी सीटें उनके हाथ आएंगी ये साफ होने के बाद क्या उपेंद्र कुशवाहा NDA से अलग होने को लेकर कोई फैसला लेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा...।












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