2019 में पार्टनर जेडीयू के लिए बीजेपी का फॉर्मूला फाइनल, पासवान को भेजा जा सकता है राज्यसभा
नई दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर बिहार में सियासत गरमाने लगी है। खास तौर से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के अंदर भले ही सीटों का फॉर्मूला तय हो चुका हो लेकिन कौन सी पार्टी किस सीट पर लड़ेगी इस पर माथापच्ची जारी है। पिछले दिनों दिल्ली में बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की, जिसके बाद शाह ने ऐलान किया कि बिहार के अंदर बीजेपी और जेडीयू बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। इस दौरान गठबंधन में शामिल बाकी सहयोगियों को रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी को सम्मानजनक सीटें देने का ऐलान किया गया। फिलहाल सीटों का गणित कैसा रहेगा और किसे-कौनसी सीट दी जाएगी इस पर चर्चा शुरू हो गई है। माना यही जा रहा है कि आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग की लिस्ट फाइनल हो जाएगी। जेडीयू, एलजेपी, आरएलएसपी के साथ बीजेपी कैसे सीटों का तालमेल बिठाएगी, पढ़िए, पूरा गणित...

एनडीए के अंदर ऐसा हो सकता है सीटों का फॉर्मूला
बीजेपी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बिहार में लोकसभा की 40 सीटों के लिए शुरूआती बातचीत में जो फॉर्मूला उभरकर सामने आ रहा है उसके मुताबिक बीजेपी और जेडीयू दोनों ही पार्टियां 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, 4 सीट एलजेपी को और दो सीट आरएलएसपी को दी जा सकती है। इसके साथ-साथ फॉर्मूले के मुताबिक एलजेपी को राज्यसभा की एक सीट भी दी जा सकती है। कहा जा रहा है कि इस फॉर्मूले में बीजेपी को अपनी कुछ सीटें छोड़नी पड़ेंगी। ऐसा इसलिए क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने लोकसभा की 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 22 पर उसे जीत मिली थी, वहीं एलजेपी ने 7 सीटों पर उम्मीदवारी की, 6 पर जीत मिली। इसके अलावा आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि इस बार जेडीयू के रूप में नए पार्टनर के आने से एनडीए में सीट शेयरिंग फॉर्मूला बदल गया।

रामविलास पासवान को भेजा जा सकता है राज्यसभा
एचटी में छपी खबर के मुताबिक बीजेपी सूत्रों ने बताया कि बीजेपी की रणनीति यही है कि जिन सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा है वो सीट पार्टी अपने पास रखना चाहेगी। इसके अलावा कुछ सीटें उसे सहयोगियों के लिए छोड़नी होंगी। हालांकि सीटों में कटौती बाकी सहयोगियों में भी होगी। वहीं बीजेपी से जुड़े एक नेता ने बताया कि इस बार हो सकता है एलजेपी के मुखिया रामविलास पासवान अपने गढ़ हाजीपुर से चुनाव मैदान में नहीं उतरें। स्वास्थ्य कारणों की वजह से वो ऐसा फैसला ले सकते हैं, हालांकि अभी पार्टी की ओर से इस पर फैसला नहीं लिया गया है। माना जा रहा है कि अगर रामविलास पासवान चुनाव नहीं लड़ते हैं तो उन्हें संभवतः राज्यसभा भेजा जा सकता है। वहीं हाजीपुर से पासवान के बेटे चिराग पासवान उम्मीदवारी कर सकते हैं।

कुछ बीजेपी सांसदों के कट सकते हैं टिकट
इसके अलावा एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान जो कि समस्तीपुर से सांसद हैं, उन्हें भी ये सीट दी जा सकती है। हालांकि एलजेपी को वैशाली और मुंगेर की लोकसभा सीट नीतीश कुमार के लिए छोड़नी पड़ सकती है। एचटी में छपी खबर के मुताबिक बीजेपी सूत्रों के मुताबिक इसके अलावा माना जा रहा है कि बीजेपी से निलंबित सांसद कीर्ति आजाद और पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को भी इस बार बीजेपी का टिकट नहीं मिलेगा। हालांकि पटना साहिब बीजेपी अपने पास रखेगी, वहीं दरभंगा की सीट जेडीयू को दी जा सकती है।

कई मौजूदा सांसदों की सीटों में होगा बदलाव
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी से जुड़े तीन नेता पार्टी से जुड़े कई नेताओं से सीटों की अदला-बदली को लेकर बातचीत में जुटे हुए हैं। जिन सांसदों की सीटों में बदलाव हो सकता है उनमें केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का नाम है, जो कि नवादा से सांसद हैं, वो बेगुसराय सीट से मैदान में उतरना चाहते हैं। बेगुसराय से बीजेपी नेता भोला सिंह सांसद थे, जिनका पिछले महीने निधन हो गया। केंद्रीय मंत्री और बक्सर से सांसद अश्विनी चौबे अपने गृहनगर भागलपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं। जहां से शाहनवाज हुसैन 2014 में लोकसभा चुनाव हार गए थे, हालांकि हुसैन खुद भागलपुर से दावेदारी कर रहे हैं।

पार्टनर जेडीयू के लिए बीजेपी में जारी है माथापच्ची
इस बीच खबर ये भी है कि अभी पार्टी आरएलएसपी को दो सीट दे सकती है, हालांकि अगर आरएलएसपी इस फॉर्म्यूले से संतुष्ट नहीं होगी और एनडीए छोड़ने की कोशिश करेगी तो उसकी दो सीटें एलजेपी को दी जा सकती हैं। ऐसे में आरएलएसपी के खाते में 6 सीटों हो जाएंगी। फिलहाल बीजेपी से जुड़े नेता सहयोगियों के साथ सीटों पर तालमेल बिठाने के लिए लगातार कोशिश में जुटे हुए हैं। हालांकि सीट शेयरिंग फॉर्फ्यूला में कौन सी पार्टी किस सीट से उतरेगी इसका फाइनल ड्राफ्ट आने से पहले बिहार में सियासी हंगामा थमता नहीं दिख रहा। देखना होगा कि बीजेपी कैसे अपने सहयोगियों को पूरी तरह से साधने में कामयाब होगी।
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