Malegaon Blast Case में बड़ा खुलासा, गवाह बोला- योगी आदित्यनाथ का नाम लेने का दबाव था, ATS की जांच पर उठे सवाल
Yogi Adityanath Malegaon Case: मालेगांव ब्लास्ट मामले में विशेष एनआईए अदालत के जज एके लाहोटी के फैसले ने महाराष्ट्र एटीएस की जांच पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने न सिर्फ सातों आरोपियों को बरी किया, बल्कि जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि गवाहों को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उन्हें शारीरिक व मानसिक यातनाएं देकर जबरन बयान दिलवाए गए।
इन बयानों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत पांच आरएसएस नेताओं का नाम लेने का दबाव भी डाला गया था, जो एक गंभीर संवैधानिक सवाल खड़ा करता है।

39 गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस केस में 39 गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए। इनमें से एक ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि उसे कई दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया और जबरन कुछ खास नाम लेने को मजबूर किया गया। इस खुलासे ने सिर्फ मालेगांव ब्लास्ट केस को ही नहीं, बल्कि भारत में आतंकवाद मामलों की जांच प्रक्रिया, गवाहों के अधिकार और जांच एजेंसियों की जवाबदेही को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
सबूतों को अदालत ने अविश्वसनीय बताया
अदालत ने माना कि इन गवाहों की ओर से एटीएस के खिलाफ औपचारिक शिकायत न करने का मतलब यह नहीं कि उनके आरोप झूठे हैं। जज ने कहा कि डर, मानसिक दबाव और व्यक्तिगत खतरे की आशंका के चलते शिकायतें न की जाना आम बात हो सकती है। एनआईए को इस मामले में क्लीन चिट दी गई है, जबकि एटीएस की ओर से जुटाए गए सबूतों को अदालत ने अविश्वसनीय बताया है।
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क्या है मालेगांव ब्लास्ट केस?
मालेगांव ब्लास्ट केस 2008 में महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के मालेगांव शहर में हुए बम धमाकों से जुड़ा एक संवेदनशील और चर्चित आतंकवाद मामला है। 29 सितंबर 2008 को शाम के समय एक मोटरसाइकिल में रखे गए विस्फोटक उपकरण से धमाका हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।
शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की और हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों को आरोपी बनाया गया। इनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, सेवानिवृत्त कर्नल श्रीकांत पुरोहित और अन्य कई आरोपी शामिल थे। इस केस को 2011 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान कई गवाह मुकर गए, और अदालत में यह बात सामने आई कि गवाहों पर दबाव डालकर बयान लिए गए। अब अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।
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