मार्वल की अनूठी मुस्लिम सुपरहीरो 'मिस मार्वल' में अपनी झलक देख रहे हैं मुस्लिम फैन

नई दिल्ली, 13 जुलाई। जुमाना जाकिर ने फैसला कर लिया है कि इस साल हैलोवीन पर वो क्या बनेंगी. उनकी नई मनपसंद सुपरहीरो कई मायनों में उन्हीं के जैसी है. महिला, किशोर, मुस्लिम, अमेरिकी और "पूरी तरह से गजब की." कैलिफॉर्निया के ऐनहाइम की रहने वाली 13 वर्षीय जुमाना कहती हैं, "कमाला खान मैं ही हूं. वो बिल्कुल मेरे जैसी है."
कमाला खान अपना खुद का टीवी शो पाने वाली मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की पहली मुस्लिम सुपरहीरो हैं. "मिस मार्वल" डिज्नी प्लस पर आठ जून को शुरू हुआ था और तब से उसने पश्चिम में बसे दक्षिण एशियाई मूल के मुस्लिमों के दिलों में एक खास जगह बना ली है.

समावेश और प्रतिनिधित्व का समर्थन करने वाले उम्मीद कर रहे हैं कि इस शो की वजह से टीवी के परदे पर मुसलमानों और उनकी समृद्ध विविधता के बेहतर चित्रण के लिए दरवाजे खुलेंगे. शो में पाकिस्तानी कैनेडियन एक्टर ईमान वेल्लानी ने कमाला खान का किरदार अदा किया है.
चित्रण की अहमियत
खान में एक जादुई कड़ा पहनते ही जादुई शक्तियां आ जाती हैं जिनसे वो हवा पर चल सकती हैं और जगमगाती रोशनी के शील्ड पैदा कर सकती हैं. लेकिन वो एक सामान्य दक्षिण एशियाई मुस्लिम किशोरी भी हैं जो मस्जिद जाती हैं, कभी कभी सल्वार कमीज जैसे पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, अपने भाई की शादी में बॉलीवुड के गानों पर नाचती हैं और कभी कभी देर रात अपने दोस्त ब्रूनो कारेली के साथ घूमने फिरने भी निकल जाती हैं.
पूर्वी लंदन में पले बढ़े 50 वर्षीय पाकिस्तानी मुनीर जमीर कहते हैं कि पहले कॉमिक्स में "न्यू जर्सी में रहने वाली एक भूरी, पाकिस्तानी मुस्लिम लड़की" को देखना और अब अपने किशोर बच्चों के साथ "मिस मार्वल" देखना एक शक्तिदायी तजुर्बा है. जमीर सात साल की उम्र से मार्वल फैन रहे हैं और उन्होंने 2014 में कॉमिक्स में मिस मार्वल की शुरुआत से ले कर अब तक कमाला खान के किरदार के विकास को देखा है.

वो कहते हैं, "विशेष रूप से मुस्लिमों के लिए चित्रण बहुत मायने रखता है क्योंकि कई सालों से गलत चित्रण के कहीं ज्यादा मायने रहे हैं." जमीर बताते हैं कि मार्वल की दुनिया में "डस्ट" के नाम से जानी जाने वाली सुरैया कादिर जैसे और भी मुस्लिम सुपरहीरो हैं. कादिर एक लहराती हुई काली पोशाक पहनती हैं, अपने बाल और चेहरे को ढक कर रखती हैं और अपने शरीर को धूल के एक बादल में बदल सकती हैं.
जमीर कहते हैं, "उस विवरण में भी कुछ क्लासिक रूपक हैं...लेकिन कमाला खान किसी मुस्लिम देश की कोई एक्सॉटिक महिला नहीं हैं. यह उन्हें मार्वल यूनिवर्स में तुरंत सबसे अलग कर देता है." "मिस मार्वल" में मुस्लिम महिलाओं के अलग अलग किस्म के तजुर्बे पिछले साल छपी एक रिपोर्ट में सामने लाए गए तथ्यों से बिल्कुल अलग हैं.
फिल्मों में मुस्लिम किरदार
रिपोर्ट में अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 2017 से 2019 के बीच रिलीज हुई फिल्मों में मुस्लिमों के चित्रण का अध्ययन किया गया. अध्ययन में सामने आया कि इन फिल्मों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व विशेष रूप से कम रहा. इन फिल्मों के मुस्लिम किरदारों में से सिर्फ 23.6 प्रतिशत महिलाएं थीं. यह भी पाया गया कि इन में से 90.5 फिल्मों में बोलने वाले मुस्लिम किरदार थे ही नहीं.
यह भी पाया गया कि इसके बावजूद 39 प्रतिशत प्रमुख और दूसरे क्रम के मुस्लिम किरदारों को हिंसा करने वालों के रूप में दिखाया गया. अध्ययन दक्षिणी कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय के एनेनबर्ग इन्क्लूजन इनिशिएटिव ने कुछ और लोगों के समर्थन से कराया था.
शो की एक एग्जीक्यूटिव प्रोडूसर और कमाला खान के किरदार को बनाने वालों में से एक सना अमानत कहती हैं कि मिस मार्वल को जानबूझकर और ज्यादा इस तरह का बनाया गया जिससे दर्शक खुद को जोड़ सकें. वो एक ऐसा मुस्लिम किरदार बनाना चाहती थीं वो "किसी परिचित जैसा लगे."
वो कहती हैं, "उसे किसी आसान पर नहीं रखा गया. वो अटपटी है. वो मजाकिया है. वो एक अच्छी लड़की है जो कुल मिला कर और अच्छा ही करना चाहती है." अमानत और उनके साथियों को लगा कि एक मुस्लिम अमेरिकी किशोरी के तौर पर खान की रोजमर्रा की जिंदगी को दिखाना जरूरी था.
भाषा का भी छिन जाना
शो की एक और फैन पाकिस्तानी अमेरिकी हिबा भट्टी को विशेष रूप से खान के पिता यूसुफ का किसी डरावने स्टीरियोटाइप की जगह "एक लाड करने वाले पिता" के रूप में चित्रण अच्छा लगा. लॉस एंजेलेस में रहने वाले भट्टी के लिए यह शो इस बात का उदाहरण है कि उसके समुदाय के कितने लोग अब सिर्फ "सामान्य अमेरिकी" जैसा दिखाया जाना नहीं चाहते बल्कि अपनी अपनी कहानियां का बताया जाना देखना चाहते हैं.

मुस्लिम नेताओं और कलाकारों को समर्थन देने वाले "पिलर्स फंड" में सांस्कृतिक बदलाव के प्रबंधक निदेशक आरिज मिकाती कहते हैं कि मिस मार्वल शो "मुसलमानों के खिलाफ हथियार बनाई जा चुकी भाषा को भी वापस ले रहा है." एक दृश्य में खान के भाई की शादी का जश्न मनाते समय खान और उनका परिवार खुशी से "अल्लाहु अकबर" के नारे लगाने लगता है.
मिकाती कहते हैं, "आप जब टीवी पर नमाज की अजान सुनते हैं तो वो अमूमन इस बात का संकेत होती है कि आप किसी असुरक्षित जगह पर हैं. और इस शो में इन सब चीजों को समुदाय के लिए वापस लिया जा रहा है...ये बेहद खूबसूरत है क्योंकि हमारे धर्म से जुड़े वो रोजमर्रा के छोटे छोटे लम्हे मीडिया में हमसे छीन लिए गए हैं."
सीके/एए (एपी)
Source: DW
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