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Opinion: हरियाणा ने कश्मीरी विस्थापितों का हर कदम पर दिया साथ

कश्मीर से पलायन करके हरियाणा में रहने वाले विस्थापितों को राज्य सरकार ने वित्तीय सुरक्षा की गारंटी दे रखी है। इसके तहत विस्तापित परिवारों को अधिकतम 5,000 रुपए तक मासिक भत्ता दिए जाने का प्रावधान है।

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जम्मू और कश्मीर में 1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में कश्मीरी पंडितों पर जो जुल्म ढाए गए, उसे कभी शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उससे भी बड़ी प्रताड़ना ये कि इन कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द को कम करने के लिए कई सरकारों के पास मरहम भी कम पड़ गए। आज की तारीख में भी उनके आंसू पोंछने के लिए सारी सरकारें उसी तरह से तैयार नहीं हैं, जो उनकी आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि उनका अधिकार है। क्योंकि, किसी भी भारतीय नागरिक को उसके अपने घर से ही बेघर होना पड़ जाए और वह भी मुट्ठी भर लोगों के निहित स्वार्थों की वजह से, तो यह असहनीय पीड़ा वाली स्थिति है। लेकिन, हरियाणा की सरकार ने प्रवासी कश्मीरी परिवारों को भी सहारा देने का काम किया है। यह सिर्फ मानवीय संवेदना की बात नहीं है। यह भारत में किसी भी चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी भी है; और हरियाणा ने उसे पूरी तरह से निभाने की कोशिश की है।

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कश्मीरी परिवारों को वित्तीय सहायता
जम्मू और कश्मीर से पलायन करके हरियाणा के किसी भी भाग में आकर रह रहे कश्मीरी परिवार को प्रदेश सरकार की ओर से वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की इससे अच्छी खूबसूरती नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात ये है कि यह सहायता कश्मीरी परिवारों के अनुसार ही नहीं दी जाती, बल्कि परिवार में कितने सदस्य हैं, यह उसपर भी निर्भर करता है। यानि जितना बड़ा परिवार, उसी के अनुसार सरकार से वित्तीय सुरक्षा की गारंटी।

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परिवार के हर सदस्य को 1,000 रुपए मासिक
इस योजना का लाभ पाने के लिए आवश्यक है कि जम्मू और कश्मीर से विस्थापित हुए परिवार की सभी स्रोतों से आय सालाना 2,00,000 रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। मतलब, जिस भी कश्मीरी परिवार की कुल आमदनी दो लाख रुपए वार्षिक से कम है, उसके हर सदस्य को हरियाणा सरकार की ओर से 1,000 रुपए हर महीने भत्ते के तौर पर दिए जाते हैं।

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एक परिवार को अधिकतम 5,000 रुपए की राशि
सबसे बड़ी बात ये है कि यह वित्तीय सहायता पूरे पांच वर्ष तक दिए जाने का प्रावधान बनाया गया है। यानि यह इतनी लंबी अवधि है, जिस दौरान परिवार को पुनर्वास का पूरा समय मिल सकता है। 1 नवंबर, 2017 से जो प्रावधान है, उसके तहत कश्मीरी विस्थापित परिवारों को मिलने वाली इस वित्तीय सहायता की अधिकतम राशि 5,000 रुपए प्रति महीने, प्रति परिवार होगी। यानि परिवार के पांच सदस्यों तक को राज्य सरकार से भत्ता दिए जाने की व्यवस्था है।

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पांच साल तक वित्तीय सहायता
हरियाणा सरकार की सहायता से किस तरह से कश्मीर से पलायन करके राज्य में आए कश्मीरी परिवारों को मदद मिली है, उसका अंदाजा इसी से लगता है कि साल 2019-20 में जहां लाभार्थियों की संख्या 9 थी, तो चालू वित्त वर्ष में वह सिर्फ 2 रह गई है। मतलब, इन वर्षों में लगातार इन विस्थापित परिवारों को पुनर्वास का अवसर मिला है और वह अपने-अपने रोजगार-धंधे में लग चुके हैं।

किसी भी भारतीय को जबरन अपना घर छोड़कर कहीं दूसरी जगह रहने को मजबूर किया जाए तो यह स्थिति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। लेकिन, दूसरी जगह भी उसके लिए हाथ न बढ़ाया जाए, तो वह अच्छी बात नहीं है। लेकिन, हरियाणा ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा कर दिखाया है। जहां, तक कश्मीरी विस्थापितों की बात है तो आर्टिकल 370 हटने के बाद उनके अपने घरों को वापस कब्जे में लेने के भी हालात बन रहे हैं। बीते करीब साढ़े तीन दशकों में उन्हें जितना भुगतना पड़ा है, उसे वापस तो नहीं किया जा सकता, लेकिन भविष्य में किसी भी भारतीय के सामने अपना घर-द्वार छोड़ने की मजबूरी न हो, यह तो सुनिश्चित जरूर किया जाना चाहिए।

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