नायब सिंह सैनी ही क्यों, खट्टर से कहां हो गई चूक? हरियाणा में बीजेपी का 'गुजरात मॉडल' वाला पूरा गणित समझिए
Haryana New CM Nayab Singh Saini: हरियाणा में करीब 8 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। राज्य में लोकसभा की भी 10 सीटें हैं और पिछली बार सभी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी जीती थी। मनोहर लाल खट्टर 9 वर्षों से ज्यादा से राज्य के मुख्यमंत्री पद पर थे। ऐसे में उनके अचानक इस्तीफे की वजह क्या हो सकती है?
सोमवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम में कई विकास परियोजनाओं के उद्घाटन के लिए पहुंचे थे। उनके साथ सीएम खट्टर भी थे, जिनकी उन्होंने भरपूर प्रशंसा भी की थी। लेकिन, एक दिन बाद ही उन्हें कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नायब सिंह सैनी के लिए कुर्सी छोड़नी पड़ गई।

एंटी-इंकंबेसी से छुटकारा
भाजपा सूत्रों की मानें तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह 9 साल 4 महीनों की एंटी-इंकंबेसी से छुटकारा पाना है। भाजपा ने कुछ राज्यों में इसका बहुत ही सफल प्रयोग किया है और उसका स्वाद आजतक चख रही है।
'गुजरात मॉडल' वाला फॉर्मूला
जब चुनाव की बात आती है तो भाजपा इसे सिर्फ जीतने के लिए लड़ती है और उसके लिए कसर की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती। गुजरात में बीजेपी 1995 से सत्ता में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह गुजरात से आते हैं।
फिर भी 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले सितंबर, 2021 में पार्टी ने मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को सीएम बना दिया था।
बात गुजरात की थी, इसलिए पूरा मंत्रिमंडल बदलने पर भी कोई चूं तक की आवाज नहीं आई। जब विधानसभा चुनाव हुए तो पार्टी ने गुजरात में जीत के तमाम पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए।
उत्तराखंड में भी सफल रहा प्रयोग
पार्टी उत्तराखंड में भी इस फॉर्मूले का फायदा उठा चुकी है। 2017 में बीजेपी सत्ता में आई तो त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन, यहां भी विधानसभा चुनावों से एक साल पहले एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए नेतृत्व बदल दिया गया।
जब पार्टी को लगा की तीरथ सिंह रावत का प्रयोग भी जीत की गारंटी नहीं है तो पुष्कर सिंह धामी को ले आई। सारी एंटी-इंकंबेंसी की अटकलें हवा हो गई और 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के बाद धामी बहुत ही मजबूत मुख्यमंत्री बनकर सामने आए।
हरियाणा में गैर-जाट मतदाताओं पर भाजपा की रही है नजर
जानकारों की राय में हरियाणा में पिछले चार चुनावों (2014-2019 में लोकसभा और विधानसभा) से बीजेपी गैर-जाट मतदाताओं की लामबंदी से ही जीतती आ रही है। करीब 25% वाली जाट आबादी हरियाणा का सबसे प्रभावी इकलौता वोट बैंक है।
बीजेपी ने वहां जाटों के साथ-साथ गैर-जाट वोटों की लामबंदी को अपना जिताऊ फॉर्मूला बनाया है। एमएल खट्टर भी पंजाबी बनिया बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं।
हरियाणा में लगभग 8% हैं सैनी
अब नायब सिंह सैनी को जो जिम्मेदारी दी गई है, वह ओबीसी की राजनीति में भी पूरी तरह से फिट बैठते हैं। वे ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की सैनी जाति से हैं। हरियाणा में पिछड़ी जाति की आबादी करीब 31% बताई जाती है।
हरियाणा में सैनियों की जनसंख्या लगभग 8% मानी जाती है। कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, अंबाला, हिसार और रेवाड़ी में इनकी अच्छी आबादी है। 2023 के अक्टूबर में इसी जातीय गणित को देखते हुए उन्हें पार्टी के प्रभावशाली जाट चेहरे ओम प्रकाश धनकड़ की जगह प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था।
हरियाणा से बाहर के राज्यों में भी संदेश
सैनी को सीएम बनाकर बीजेपी पड़ोसी राज्य राजस्थान में भी पिछड़ी जातियों को राजनीतिक संकेत देना चाहती है। वहां कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं। यूपी के कुछ इलाकों में भी इनकी काफी जनसंख्या है।
खट्टर के करीबी होने का भी सैनी को मिला फायदा
भाजपा की ओर से नायब सिंह सैनी पर दांव लगाने का एक कारण ये भी है कि वह मनोहर लाल खट्टर के बहुत ही करीबी हैं। खट्टर की वजह से ही उन्हें पार्टी में प्रमोशन मिलता रहा है। उन्हीं के प्रभाव से लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए पिछले साल अक्टूबर में उन्हें प्रदेश बीजेपी की कमान दी गई थी।












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