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'हारी बाजी को जीतना भाजपा को आता है', कुछ इस तरह हरियाणा में आखिरी समय में पार्टी ने पलटा पासा

लोकसभा चुनाव में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी को हरियाणा में झटका लगा था, उसके बाद पार्टी ने प्रदेश में विधान सभा चुनाव को लेकर पूरा दमखम झोंक दिया और चुनाव के नतीजों में भी स्पष्ट तौर पर नजर आया। पार्टी यहां 10 साल से सत्ता में है, तमाम राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि यहां सत्ता विरोधी लहर है, लेकिन इन तमाम कयास और अटकलों को धता बताते हुए भाजपा ने 90 में से 48 सीटों पर जीत दर्ज करके पूर्ण बहुमत हासिल किया है और लगातार तीसरी बार यहां सरकार बनाने जा रही है।

तकरीबन एक वर्ष पहले भाजपा को अपने सहयोगी दल जननायक जनता पार्टी से झटका मिला, जब सरकार में सहयोगी जेजेपी ने अपना दामन खींचते हुए अलग होने का फैसला लिया।

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लेकिन भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ऐसे झटकों के सामने झुकने को तैयार नहीं था। पार्टी ने यहां इसी वर्ष मार्च माह में मुख्यमंत्री बदला और मनोहर लाल खट्टर की जगह नायब सिंह सैनी को कमान सौंपी।

जातियों की शिकायत की दूर

विधानसभा चुनाव से पहले सीएम को बदलने के साथ पार्टी ने कई ऐसे कदम उठाए जो पार्टी के हित में गए। पार्टी ने यहां सत्ता विरोधी लहर को पूरी तरह से थामने में सफलता हासिल की और प्रदेश में अलग-अलग जातियों की शिकायत को भी दूर करने का काम किया।

खट्टर को प्रचार से रखा गया दूर

भाजपा के एक शीर्ष नेता का कहना है कि प्रदेश में मनोहर लाल खट्टर के प्रति लोगों की नाराजगी को मैनेज करने में भाजपा काफी सफल रही है। खट्टर को ज्यादातर चुनाव प्रचार से दूर रखा गया। सैनी को पार्टी के नेता के तौर पर आगे किया गया।

अमित शाह ने संभाला मोर्चा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद प्रदेश की पूरी रणनीति को संभाला और धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में प्रदेश में रणनीति को आगे बढ़ाया। चुनाव के दौरान स्पष्ट किया कि सैनी ही यहां नेता होंगे।

ऐसे में उन तमाम अटकलों को विराम लग गया, जिसमे कहा जा रहा था कि सैनी प्रॉक्सी हैं और वह खट्टर के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। चुनाव के बाद एक बार फिर से खट्टर की वापसी हो सकती है, इन तमाम अटकलों को विराम लग गया।

गैर जाट वोटर्स का ध्रुवीकरण

भाजपा के एक और वरिष्ठ नेता का कहना है कि हरियाणा में गैर जाट वोटर्स का ध्रुवीकरण करने में पार्टी सफल रही, जिस तरह से खट्टर की जगह सैनी को नेता बनाया गया और कांग्रेस के भीतर टकराव देखने को मिला, उसका भारतीय जनता पार्टी का काफी लाभ मिला।

प्रदेश के गैर जाट वोटर्स को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि कांग्रेस की सत्ता में वापसी से एक बार फिर से जाटों का वर्चस्व कायम हो सकता है, जिसके चलते प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासन प्रभावित हो सकता है।

जातियों की सोशल इंजीनियरिंग

इस स्थिति का सामना करने के लिए भाजपा ने अलग-अलग समुदाय से उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। पार्टी ने 21 ओबीसी जिसमे सैनी, अहिर, गुर्जर और कुम्हार समुदाय शामिल हैं, उनके उम्मीदवारों को टिकट दिया।

17 शेड्यूल कास्ट, 12 ब्राह्मण और पंजाबी, पांच बनिया, तीन राजपूत और एक जाट सिख को मैदान में उतारा। यही नहीं पार्टी ने 16 जाट उम्मीदवारों को भी टिकट दिया।

हरियाणा में भाजपा की यह सोशल इंजीनियरिंग काम कर गई। पार्टी ने एक तरफ जहां गैर जाट वोटर्स को साधने की कोशिश की तो दूसरी तरफ जाट प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन किया। जाट वोट में बंटवारे का भाजपा को फायदा हुआ।

जाट समुदाय से आने वाले एक नेता ने कहा कि यह सच है कि भाजपा ने 2014 से हरियाणा में गैर जाट वोटर्स का वोट साधने की रणनीति बनाई है। लेकिन जाट समुदाय व्यक्ति से जुड़ा है नाकि विचारधारा से। भाजपा को जाट समुदाय का भी वोट मिला है।

आरक्षण कर गया काम

सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के लिए उप-वर्गीकरण का प्रस्ताव देकर अनुसूचित जातियों को संबोधित करने की भाजपा की सूक्ष्म रणनीति भी मतदाताओं के बीच अच्छी तरह से गूंजती दिखी, जिससे 2019 की उपलब्धियों से परे एससी आरक्षित सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ।

दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी आंतरिक संघर्षों और रणनीतिक गलतियों से जूझती रही, जिसके कारण जाटों के गढ़ के भीतर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसकी हार हुई। इसके अतिरिक्त, जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) को बड़ नुकसान का सामना करना पड़ा।

उल्लेखनीय रूप से, आईएनएलडी के अभय सिंह चौटाला को एलेनाबाद विधानसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा, जो पार्टी के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि उसे कोई भी सीट हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

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