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Gorakhpur news: प्राचीन कुंभकारी कला पर संकट के बादल,कुम्हार परेशान

मिट्टी के बर्तन बनाने की प्राचीन कला है कुंभकारी। मृत्तिका तथा अन्य सिरैमिक पदार्थों का उपयोग करके 'बर्तन एवं अन्य वस्तुए बनाना कुंभकारी' या पॉटरी कहलाता है। इन बर्तनों को कठोर और टिकाऊ बनाने के लिए उच्च ताप पर पकाया जात

गोरखपुर,10सितंबर: मिट्टी के बर्तन बनाने की प्राचीन कला है कुंभकारी। मृत्तिका तथा अन्य सिरैमिक पदार्थों का उपयोग करके 'बर्तन एवं अन्य वस्तुए बनाना कुंभकारी' या पॉटरी कहलाता है। इन बर्तनों को कठोर और टिकाऊ बनाने के लिए उच्च ताप पर पकाया जाता है। कुंभकारी एक व्यापक शब्द है और इसके अन्तर्गत मिट्टी के बर्तन, पत्थर के बर्तन तथा चीनी मिट्टी के बर्तन एवं वस्तुएँ बनाने का कार्य सभी आ जाते हैं।वर्तमान समय में कुंभकारी कला पर ग्रहण नजर आ रहा है।गोरखपुर के कुछ कुंभकारों ने इसमें आ रही समस्या के बारे में बताते हुए सरकार से सहयोग की मांग की है।

kumhar

कड़ी मेहनत पर फिर रहा पानी
कुम्हार जाति से जुड़े इन कलाकारों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि मिट्टी को भिगोकर कड़ी मेहनत कर परम्परागत पत्थर की चाक पर रखकर बर्तन सहित उसे विभिन्न आकार देते हैं। ऐसे में मटकी घड़ा दीपक सहित कई अन्य बर्तनों और आम दिनचर्या में काम आने वाले संसाधनों का निर्माण करते हैं। मिट्टी से बर्तन बनाने के बाद इन्हें आग के हवाले किया जाता है । कई बार बारिश होने की वजह से कुंभकार परिवार की मेहनत पर पानी फिर जाता है और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है ।

कम हो रही मांग
मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाने वाले कुंभकार अधिकतर कुम्हार जाति के लोग हैं।इस कला का जितना बढ़ावा मिलना चाहिए उतना नहीं मिला है। मिट्टी के बर्तनों को उनके कद्रदान भी कम मिल रहे हैं । ऐसे में पीढिय़ों से इस कला को जीवित रख कर अपना पेट पालने वालों को अब मिट्टी के बर्तन बेचकर आजीविका चलाने के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है । ऐसा ही कुछ गोरखपुर जिले के पिपराइच रोड स्थित लाला बाजार के कुम्हारों में देखने को मिला। जहां पर कुम्हार अपनी आजीविका चलाने के लिए चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाकर इस कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन परिस्थितियां उनके प्रतिकूल बनी हुई है ।

सरकार की उदासीनता
कुम्हार ब्रम्हा प्रजापति का कहना है कि वर्तमान समय में हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।सरकार का जरा सी ध्यान इस कला पर नहीं है।यह कला बिल्कुल उपेक्षित है।जैसे सरकार हर कला को बढ़ावा दे रही है।वैसे ही इस कला पर भी कई ध्यान देने की जरुरत है।

मिट्टी की अनउपलब्धता
बैजनाथ कहते है कि मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए सबसे जरुरी है मिट्टी।जिसे लाने के लिए भारी रकम देनी पड़ती।उसके साथ ही स्टोर करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है।ऐसे में सरकार अगर इसमें कुछ रियायत दे तो कुछ बढ़ावा मिलेगा।

बर्तन पकाने के लिए जगह का आभाव
ब्रम्हा बताते हैं कि मिट्टी पकाने के लिए जगह का आभाव है।घर के सामने ही सड़क किनारे बर्तन पकाने का काम होता है।इतनी जगह बहुत कम है।कभी-कभी सड़क किनारे होने की वजह से वाहन भी नुकसान पहुंचा देते है।सरकार यदि जगह उपलब्ध करा दे तो हम सभी को राहत मिलेगी।

प्लास्टिक व कागज से निर्मित सामानों का उपयोग
रमाशंकर बताते है कि वह तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं।मिट्टी के बर्तनों की मांग एक-एक दिन कम होती जा रही है।उसका कारण है प्लास्टिक से निर्मित सामानों की तेज हो रही बिक्री।अब लोग प्लास्टिक से बने सामानों को ही बढ़ावा दे रहे हैं।जो व्यक्ति व प्रकृति सभी के लिए हानिकारक है।

सरकार से मांग
कुम्हार वर्ग के लोगों की सरकार से मांग है कि उन्हें मिट्टी आसानी से उपलब्ध कराई जाए।बिजली दर सस्ती हो। बर्तन पकाने के लिए अलग जगह उपलब्ध कराई जाए।सरकारी योजनाओं में वरीयता मिले।

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