DDU University के प्रोफेसर के शोध ने विश्व में मचाई हलचल, विशालकाय तारों को लेकर कहीं ये बातें
DDU University Gorakhpur Latest News Hindi Uttar Pradesh: पिछली सदी से वैज्ञानिक एक गहन प्रश्न से जूझ रहे हैं और यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि जब कोई विशाल तारा अपने जीवन के अंतिम दौर में पहुँचता है और उसका गुरुत्वाकर्षण उसे भीतर की ओर खींचकर गिरा देता है, तो आखिरकार उसकी अंतिम स्थित क्या होगी ? तारकीय पिंडों (जैसे कि तारें) के गुरुत्वीय पतन का अंतिम परिणाम क्या होता है? इसका समाधान गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत में छिपा है, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह अब तक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।
1939 में दो अमेरिकी वैज्ञानिकों ने तारों में दबाव-रहित द्रव्य की आदर्श स्थिति के साथ इस समस्या का पहला सैद्धांतिक हल प्रस्तुत किया और बताया कि जब तारा पूरी तरह ढह जाता है तो उसका अंत ब्लैक-होल के रूप में होता है। इसके बाद से ही ब्लैक-होल खगोल-भौतिकी में सबसे बड़ा शोध-विषय बन गया।

1986 में भारतीय वैज्ञानिक पंकज एस. जोशी ने एक नया सिंद्धांत प्रस्तुत किया और बताया कि विशालकाय तारों के जीवन का अंतिम चरण एक नग्न-सिंगुलरिटी भी हो सकता है। यानी ऐसी स्थिति जहाँ गुरुत्वाकर्षण अनंत हो जाता है लेकिन उसके चारों ओर ब्लैक-होल की तरह कोई सीमा नहीं होता है। वर्ष 1998 में एक और भारतीय वैज्ञानिक अभास मित्रा ने ब्लैक-होल के विकल्प के रूप में चुम्बकीय गुरत्वीय-पतन का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के गणित एवं सांख्यिकी विभाग के सहायक आचार्य, डॉ. राजेश कुमार के शोध ने इस बहस को एक नया मोड़ दिया है। उनका कहना है कि तारे का पतन वास्तव में कभी भी एक निश्चित सीमित अंतिम बिंदु तक नहीं पहुँचता- यानि न तो ब्लैक-होल बनता है और न ही नग्न-सिंगुलरिटी और न ही चुम्बकीय गुरत्वीय-पतन ।
डा. राजेश कुमार के शोध परिणाम बताते हैं कि समानरूपी गुरुत्वीय पतन प्रणालियाँ कभी भी सीमित सिंगुलरिटी तक नहीं पहुँचतीं- बल्कि विशालकाय तारों में गुरत्वीय-पतन प्रक्रिया अनंत काल तक चलती रहती है। उनका यह निष्कर्ष गुरुत्वीय पतन के दौरान बनने वाली अपेक्षित क्षितिज सतह के समय और सिंगुलरिटी बनने के समय की तुलना करने पर यह सामने आया है जिससे कि विशालकाय तारों का पतन एक निश्चित बिंदु पर समाप्त न होकर एक अनिश्चितकालीन पतन प्रक्रिया के तहत लगातार सिकुड़ता रहता है।
डॉ. कुमार ने इस नई प्रक्रिया और अवस्था को "इटरनल कोलैप्स फिनॉमिना अर्थात सतत गुरुत्वीय पतन" नाम दिया है | चूँकि डा. कुमार द्वारा प्रस्तुत यह मॉडल पूरी तरह से सिंगुलरिटी- रहित है , तो उनकी यह खोज न सिर्फ विशालकाय तारों की नियति को समझने में मदद करेगी बल्कि भविष्य में वर्म-होल तथा समय-यात्रा के महत्वपूर्ण अनुसंधान में नई संभावनाओं और दृष्टिकोणों के द्वार खोलेगी ।
हाल ही में, डा. राजेश कुमार के इस शोध को भारत सरकार के प्रतिलिप्याधिकार कार्यालय द्वारा कॉपीराइट प्रदान किया गया है। डा. कुमार ने बताया कि कुछ और खगोल-भौतिकीय आँकड़ों के विश्लेषण के बाद उनका ये अनुसन्धान अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए भेजा जायेगा। डा. राजेश कुमार के इस महत्वपूर्ण शोध और उपलब्धि के लिए कुलपति प्रो0 पूनम टंडन और विभाग एवं विश्वविद्यलाय के शिक्षकों ने बधाई और शुभकामनाये दी।












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