गया में वन विभाग की छापेमारी में भालू का नाखून, सेही का काँटा और पैंगोलीन बरामद, दुकान सील

वन्यजीवों और वन्यजीव उत्पादों के लिए भारत न केवल एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि अवैध व्यापार का अड्डा भी है। वन्यजीवों की तस्करी से तात्पर्य जीवित या मृत जंगली जानवरों और पौधों के अवैध व्यापार से है। इससे दुनिया के पर्यावरण, जैव विविधता, अर्थव्यवस्था, शासन और स्वास्थ्य पर भारी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध का एक रूप है जो कई देशों में फैला हुआ है। इस अपराध के तहत वन्यजीवों का अवैध शिकार और फिर उसकी तस्करी की जाती है। ताज़ा जानकारी के अनुसार बिहार के गया में वन विभाग ने कन्हाई साव नामक जड़ी बूटी की एक दुकान में छापेमारी कर भालू का नाखून, सेही का कांटा और पैंगोलिन सहित कई अन्य प्रतिबंधित जड़ी-बूटी भी बरामद की हैं।

भालू का नाखून, सेही का कांटा और पैंगोलिन बरामद

भालू का नाखून, सेही का कांटा और पैंगोलिन बरामद

दरअसल बिहार के गया में स्तिथ यह दुकान काफी पुरानी है और यहां से लोग पूजा पाठ व गंभीर बीमारी के लिए जड़ी-बूटी ले जाते हैं। इसी दौरान डीएफओ राजीव रंजन को जानकारी प्राप्त हुई कि यहाँ दुर्लभ प्रजाति के जानवरों और उनके अंगों की बिक्री की जाती है। डीएफओ तत्काल एक टीम लेकर दुकान में छापेमारी के लिए पहुंच गए। जानकारी अनुसार गया में वन विभाग की टीम ने कोतवाली थाना क्षेत्र के बजाज रोड में स्थित कन्हाई साव नामक जड़ी बूटी की दुकान में छापेमारी की, इस छापेमारी के दौरान दुकान में छोटे-छोटे डब्बों में रखें दुर्लभ जानवरों के कुछ अंग बरामद किये गए हैं, जिसमें भालू के नाखून, सेही का कांटा और पैंगोलिन के भी अंग बरामद हुए हैं। इसके इलावा कई अन्य प्रतिबंधित जड़ी-बूटी भी बरामद की गए हैं। सभी बरामद प्रतिबंधित जानवरों के अंग और जड़ी बूटियों को वन विभाग की टीम अपने साथ ले गई है। टीम का मानना है कि एक्सपर्ट की टीम के आने के बाद और ज्यादा जानकारी मिल सकती है। वहीं वन विभाग की टीम के द्वारा दुकान में मौजूद दो कर्मियों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। कन्हाई साव नामक दुकान को सील कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि बरामद अंगों का मूल्य लाखों रुपए है।

क्यों होता है वन्यजीवों का शिकार ?

क्यों होता है वन्यजीवों का शिकार ?

भारत में वन्यजीवों की तस्करी काफी बड़े पैमाने पर की जाती है हालाँकि आधुनिकता के चलते इसमें सरकार काफी हद तक रोक लगाने में सफल हो पाई है। लेकिन आज भी कई अन्धविश्वासी प्रथाएँ या इलाज के नाम पर यह अपराध सामूहिक तरीके से किया जा रहा है। आखिर इसके पीछे की वजह क्या होती है?
सेही के कांटे की तस्करी
सेही, जिसे अंग्रेजी में क्रेस्टेड पॉरकपाइन कहते हैं। इसके पूरे शरीर पर बालों की जगह नुकीले कांटे होते हैं। कांटों से भरा यह जानवर चंबल के बीहड़ों में घूमता दिखाई देता है। चूहे से थोड़ा बड़ा यह जानवर चिपक जाए तो खून चूस लेता है। दुश्मन के ऊपर मिसाइल जैसा कांटा भी फेंकता है। इसके कांटे को लोग तांत्रिक विद्याओं में इस्तेमाल करते है और इसीलिए इसका शिकार किया जाता है।
पैंगोलिन का शिकार
भारतीय पैंगोलिन, जिसका वैज्ञानिक नाम मैनिस क्रैसिकाउडाटा है, पैंगोलिन समूह की बजाय अकेला रहना पसंद करता है और नर व मादा केवल प्रजनन के लिए ही मिलते हैं। इसका अत्याधिक शिकार होता है जिसमें रोग-निवारण के लिए इसके अंगों को खाने की झूठी और अन्धविश्वासी प्रथाएँ भी भूमिका निभाती हैं। इस कारणवश यह विलुप्ति की कागार पर आ गया है।
भालू के दांत, नाखून बालों की तस्करी
भालू के दांत, नाखून बालों को टोने टोटके के काम में लेने का प्रचलन है। बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए भालू के दांत और बालों को गले बांधना का शुभ मानते हैं। इसके अलावा भालू के दांत को सोने में गढ़ कर लगाना भी आजकल फैशन बन गया है। भालू के दांत, नाखून और बालों की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। ऐसे में भालू की हत्या को आरंभिक तौर पर उसके अंगों के लिए होना माना जाता रहा है।

वन्यजीव संबंधी संवैधानिक प्रावधान

वन्यजीव संबंधी संवैधानिक प्रावधान

42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से वन और जंगली जानवरों एवं पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था।
संविधान के अनुच्छेद 51 A (g) में कहा गया है कि वनों एवं वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद 48A के मुताबिक, राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेगा और देश भर में जंगलों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा की दिशा में कार्य करेगा।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 यह अधिनियम पौधों और जानवरों की प्रजातियों के संरक्षण हेतु अधिनियमित किया गया था। यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू है। इस कानून से पहले भारत में केवल पाँच नामित राष्ट्रीय उद्यान थे। वर्तमान में भारत में 101 राष्ट्रीय उद्यान हैं।

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