गेहूं निर्यात रोकने पर जी-7 ने की भारत की आलोचना

जर्मनी के कृषि मंत्री ओज्देमीर

नई दिल्ली, 16 मई। जर्मनी के श्टुटगार्ट में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जर्मन कृषि मंत्री सेम ओज्देमीर ने कहा, "अगर हर कोई निर्यात पर पाबंदियां लगाना शुरू कर दे या फिर बाजारों को बंद करना शुरू कर दे तो संकट और गहरा जाएगा."

शनिवार कोभारत ने तत्काल प्रभाव से गेहूं के निर्यात पर रोक का ऐलान कियाथा. अपनी खाद्य सुरक्षा और यूक्रेन युद्ध का हवाला देते हुए भारत सरकार ने कहा है कि अब सिर्फ उसी निर्यात को मंजूरी दी जाएगी जिसे पहले ही लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किया जा चुका है. इसके साथ ही उन देशों को जिन्होंने "भोजन की सुरक्षा की जरूरत" को पूरा करने के लिए सप्लाई का आग्रह किया है.

ओज्देमीर ने कहा कि जी-7 के मंत्रियों ने दुनिया के सभी देशों से निर्यात पर पाबंदियां लगाने वाली कार्रवाई से परहेज करने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा, "उन्होंने निर्यात पर रोक का विरोध किया और बाजार को खुला रखने का आग्रह किया. हम भारत से जी-20 सदस्य के तौर पर अपनी जिम्मेदारी समझने का अनुरोध करते हैं."

जी-7 के देश इस मुद्दे पर जर्मनी में जून में होने वाली बैठक में चर्चा की भी सिफारिश करेंगे. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस बैठक में आमंत्रित किया गया है.

महंगाई बढ़ा सकता है भारत का फैसला

बीते शुक्रवार को भारत के विदेश व्यापार निदेशालय की तरफ से जारी सरकारी गजट में आए नोटिस में कहा गया कि दुनिया में बढ़ती कीमतों के कारण भारत, उसके पड़ोसियों और अन्य संकटग्रस्त देशों में खाद्य सुरक्षा को खतरा है. नोटिस के मुताबिक गेहूं का निर्यात रोकने का प्रमुख कारण घरेलू बाजार में उसकी कीमतों को बढ़ने से रोकना बताया गया.

इस प्रतिबंध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें और ज्यादा बढ़ने की आशंका है, जो इस साल की शुरुआत से अब तक 40 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं. भारत के कुछ बाजारों में इसकी कीमत 25,000 रुपये प्रति टन है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 20,150 रूपये ही है.

यूक्रेन और रूस दुनिया भर में पैदा होने वाले गेहूं का एक तिहाई उगाते हैं. लेकिन दोनों देशों के बीच युद्ध का असर उत्पादन और सप्लाई दोनों पर पड़ा है. निर्यात तो लगभग पूरी तरह से बंद हो गया क्योंकि यूक्रेन के बंदरगाह पर रूसी सेना की घेराबंदी है और बुनियादी ढांचे के साथ ही अनाजों के गोदाम भी युद्ध में तबाह हो रहे हैं.

इधर भारत में इसी वक्त गेहूं की फसल को अभूतपूर्व लू के कारण काफी नुकसान हुआ है और उत्पादन घट गया है. उत्पादन घटने की वजह से भारत में गेहूं की कीमत पहले ही अपने उच्चतम स्तर पर चली गई हैं.

भारत में भी मुश्किल

रूस और यूक्रेन से गेहूं खरीदने वाले अंतरराष्ट्रीय आयातकों को भारत से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन मध्य मार्च में भारत में अचानक बदले मौसम के मिजाज ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. दिल्ली के एक ग्लोबल ट्रेडिंग फर्म के मालिक ने आशंका जताई है कि इस साल उपज घट कर 10 करोड़ टन या इससे भी कम रह सकती है.

सरकार ने इससे पहले उत्पादन 11.13 करोड़ टन रहने की उम्मीद जताई थी जो अब तक का सर्वाधिक है. ट्रेडिंग फर्म के मालिक ने कहा, "सरकार की खरीद 50 फीसदी से भी कम है, बाजारों को पिछले साल की तुलना में कम सप्लाई मिल रही है. यह सब इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि फसल कम है."

दुनिया में बढ़ती कीमतों का फायदा उठाने के लिए भारत ने इस साल मार्च तक करीब 70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया जो पिछले साल की तुलना में 250 प्रतिशत ज्यादा है. अप्रैल में भारत ने रिकॉर्ड 14 लाख टन गेहूं का निर्यात किया और मई में पहले से ही 15 लाख टन गेहूं के निर्यात के सौदे हो चुके हैं.

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2022-23 के लिए भारत ने 1 करोड़ टन गेहूं के निर्यात का लक्ष्य रखा था. गेहूं की सप्लाई में आ रही दिक्कतों की स्थिति में भारत ने अपना निर्यात बढ़ाने का फैसला किया था और अपने गेहूं के लिए यूरोप, अफ्रीका और एशिया में नए बाजार खोजने की फिराक में था. इसमें से ज्यादातर हिस्सा इंडोनेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों को भेजा जाता.

वीके/एए (एएफपी, रॉयटर्स)

Source: DW

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