बाघ और हाथियों के बाद अब गांवों पर लोमड़ियों के हमले

नई दिल्ली, 23 नवंबर। कोलकाता से सटे दक्षिण 24-परगना जिले के सुंदरबन इलाके में तो शायद ही कोई ऐसा महीना बीतता है जब दो-चार मछुआरे रॉयल बंगाल टाइगर का निवाला ना बनते हों. इन घटनाओं से साफ है कि लगातार बढ़ती आबादी, शहरीकरण की तेज गति और पेड़ों की अवैध कटाई से सिकुड़ते जंगल के कारण इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष के मामले लगातार तेज हो रहे हैं. पर्यावरणविद इन घटनाओं के लिए जलवायु परिवर्तन को भी जिम्मेदार मानते हैं.
लोमड़ियों के हमले
हाल में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में लोमड़ियों के एक झुंड के हमले में कम से कम 40 लोग घायल हो गए. इससे नाराज गांव वालों ने दो लोमड़ियों को पत्थरों और लाठियों से मार डाला. घायल लोगों में से 20 की हालत गंभीर है और अब तक उनका विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है.
वैसे, उस इलाके में पहले भी एकाध बार लोमड़ी के हमले में लोगों के घायल होने की खबरें आती रही हैं. ऐसी आखिरी घटना दो साल पहले हुई थी. लेकिन अब लोमड़ियों के झुंड के किसी गांव पर हमले ने वन विभाग के लोगों को भी हैरत में डाल दिया है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि इलाके में जंगल तेजी से कम हो रहे हैं. इसी वजह से जानवर अब भोजन की तलाश में झुंड में इंसानी बस्तियों तक पहुंच रहे हैं. सुंदरबन के बाघों का मामला हो या फिर उत्तर और दक्षिण बंगाल के गांवों में जंगली हाथियों के हमले का, सबके पीछे यही दो-तीन ठोस कारण हैं.
सुंदरबन में बढ़ता संघर्ष
आबादी के बढ़ते दबाव और पर्यावरणीय असंतुलन की वजह से सुंदरबन लगातार सिकुड़ रहा है. इसके चलते आसपास रहने वाले लोग बाघों की जद में आ रहे हैं. सुंदरबन इलाके में कुल 102 द्वीप हैं. इनमें से 54 द्वीपों पर आबादी है.
मछली मारना और खेती करना ही यहां आजीविका के प्रमुख साधन हैं. हाल ही में एक अध्ययन में इलाके के मैंग्रोव जंगलों के तेजी से घटने पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि यही स्थिति रही तो वर्ष 2070 तक सुंदरबन में बाघों के रहने लायक जंगल नहीं बचेगा.
सुंदरबन इलाके पर लंबे अरसे से शोध करने वाले कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञान अध्ययन संस्थान के निदेशक डॉ. सुगत हाजरा कहते हैं, "इलाके में इंसानों और बाघों के बीच संघर्ष अब चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है."
वन विभाग की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने कुछ समय पहले अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि सुंदरबन से सटी बंगाल की खाड़ी का जलस्तर और पानी में खारापन बढ़ने, शिकार की जगह घटने और पसंदीदा भोजन नहीं मिलने से बाघ भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आने लगे हैं. सुंदरबन टाइगर रिजर्व के एक अधिकारी बताते हैं कि बाघ तभी जंगल से बाहर निकलते हैं, जब वे बूढ़े हो जाते हैं और जंगल में आसानी से कोई शिकार नहीं मिलता.
दूसरी ओर, उत्तर बंगाल इलाके में जंगल, वन्यजीव अभयारण्यों और नेशनल पार्कों की भरमार होने की वजह से देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष की घटनाओं में तेजी आई है. तेजी से कटते जंगल की वजह से जानवरों के घर यानी जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं.
यही वजह है कि भोजन की तलाश में हाथी और दूसरे जानवर अक्सर जंगल से बाहर निकल कर नजदीक की बस्तियों में पहुंचते रहते हैं. इस दौरान अपनी जान बचाने के लिए लोग कई बार इन जानवरों को मार भी देते हैं.
एक सींग वाले गैंडों के लिए मशहूर जलदापाड़ा नेशनल पार्क में लंबे समय से फॉरेस्ट रेंजर रहे रंजन तालुकदार कहते हैं, "जंगलों की कटाई और दूसरी वजहों से जानवर भोजन की तलाश में अक्सर इंसानी बस्तियों में पहुंच जाते हैं और जान-माल का नुकसान करते हैं."
वह कहते हैं कि जंगल से सटी बस्तियों में स्थानीय लोग पीढ़ी दर पीढ़ी जानवरों के साथ रहने-जीने के अभ्यस्त हैं. लेकिन जंगल के सिकुड़ने की वजह से अब इन दोनों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं. इन पर अंकुश लगाने के लिए जहां जंगल को बचाना जरूरी है, वहीं इंसानों को यह याद दिलाना भी जरूरी है कि हमारे पर्यावरण के लिए जंगल और दूसरे जीव भी काफी महत्वपूर्ण हैं.
जलवायु परिवर्तन भी वजह
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय और पारिस्थितिकी तंत्र केंद्र में जीव विज्ञान के सहायक प्रोफेसर ब्रियाना अब्राहम की अगुआई में हाल में किए गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक तंत्र को तनावपूर्ण बना रहा है. इसके कारण वहां रहने वाले जीवों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है. इसी वजह से इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है. अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन इंसानी गतिविधियों और वन्यजीव आबादी के बीच मुकाबलों को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है.
अब्राहम के मुताबिक, शोध से पता चलता है कि जैव विविधता, मानव स्वास्थ्य, अर्थशास्त्र, जीवन की गुणवत्ता और भी बहुत सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. लेकिन इंसान-जानवर संघर्ष पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर विचार करने के लिए वैज्ञानिकों के ठोस प्रयास से यह अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है कि यह संघर्ष कब होंगे. वैसी स्थिति में शायद उनसे बचा भी जा सकता है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि अधिकतर अध्ययनों में जलवायु की भूमिका पर विचार नहीं किया गया है. यह इतनी जटिल प्रक्रिया है कि इसे समझना काफी कठिन है. बहुत सारे ऐसे कारण होते हैं जो संघर्ष पैदा करते हैं. उन कारणों को समझने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को समझना जरूरी है. इसके अलावा सामाजिक या आर्थिक कारण भी हैं जो लोगों को जगहों या संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं. इनसे जानवरों के साथ संघर्ष का अंदेशा बढ़ता है.
Source: DW
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