हिंसा बने राजनीतिक हथियार, इसके लिये केजरीवाल हैं तैयार

इस बात को सिद्ध करने के लिये मैं सबसे पहले गुजरात की उस घटना का जिक्र करूंगा, जिसमें केजरीवाल के काफिले को रोका गया। रोके जाने का एक मात्र कारण था आचार संहिता का उल्लंघन। टेलीविजन पर प्रसारिते हुई इस खबर में अधिकारी साफ कहते नजर आये, "केजरीवाल जी आचार संहिता लागू हो चुकी है अब आपको किसी भी ऐसी यात्रा के लिये नियमों का पालन करना होगा... "
आचार संहिता की बात करें तो वो सिर्फ केजरीवाल पर ही लागू नहीं हुई है। वर्ष 2004 में लाल कृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री थे और पटना में जनसभा कर रहे थे। उसी समय चुनाव आयोग ने तिथियां घोषित कर दीं। पटना के जिलाधिकारी तुरंत जनसभा के मंच पर पहुंचे और उनसे भाषण को वहीं रोकने का आग्रह किया। आडवाणी ने जिलाधिकारी की बात का सम्मान किया और वहीं पर भाषण को रोक दिया।
Did You Know: अपना पहला चुनाव हारे थे अंबेडकर
इसी से एक मंझे हुए राजनेता और एक अराजक व्यक्तित्व में क्या फर्क पता चलता है। और अगर पिछले चुनावों को ध्यान से देखें तो एक समय में चुनावों में अराजकता हुई, फिर हिंसा बढ़ी और फिर चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से होने लगे। यह सब संभव हुआ है चुनाव आयोग की सख्ती की वजह से। तो आखिर क्या कारण है जो केजरीवाल की पार्टी चुनाव आयोग को नियमों के पटल पर ललकार रही है। वो भी सिर्फ गुजरात में नहीं, बल्कि दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद व अन्य कई स्थानों पर आप पार्टी के कार्यकर्ता आचार संहिता का उल्लंघन करने पर उतारू हैं।
राज मोहन गांधी, महात्मा गांधी के पौत्र जो हाल ही में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए, वो भाजपा कार्यलय पर पथराव करने वाली भीड़ में शामिल थे। आशुतोष गुप्ता, पूर्व पत्रकार, जो एक समय में राजनेताओं को आचार संहिता का पाठ पढ़ाते थे, आज खुद भाजपा कार्यालय के गेट पर चढ़ गये और अटल बिहारी वाजपेयी के पोस्टर फाड़ दिये, पत्थर फेंके और भाजपा के खिलाफ नारे लगाये। शाजिया इलमी ने भी मीडिया पर जमकर निशाना साधा। ये वही थीं जो कल शाम भाजपा कार्यालय के सामने पथराव करने वाली भीड़ में शामिल थीं। दिल्ली पुलिस ने आशुतोष और शजिया के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।
ये सिर्फ केजरीवाल नहीं हैं, जिनसे आचार संहिता की गाईडलाइंस को फॉलो करने के लिये कहा गया है। मुंबई से लेकर बैंगलोर तक तमाम राजनेता हैं, जो कल वैसी ही परिस्थिति में थे। लेकिन क्या किसी ने आप कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार किया?
कांग्रेस और वामपंथी दलों का मिश्रण हैं केजरीवाल
सच पूछिए तो कांग्रेस से लेकर सभी के लिये नरेंद्र मोदी एक चुनौती बने हुए हैं। इस चुनौती के लिये कांग्रेस ने अपने यूथ आइकन को गरीबों का मसीहा बना दिया, लेकिन एक टीवी इंटरव्यू ने सब कुछ पलट कर रख दिया। इससे पहले वामपंथी दल आये और बंगाल समेत कई राज्यों का क्या हाल किया सब जानते हैं। अब अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस व वामपंथी नीतियों पर चल रहे हैं। उनकी नीति भी यही है कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाये उसे कमजोर बना दो। इससे ज्यादा से ज्यादा लोग गरीब बने रहेंगे और गरीबों के उद्योग पर आपकी राजनीति फलतीफूलती रहेगी।
सामाजिक मुद्दों को लें तो केजरीवाल यहां भी कांग्रेसियों जैसी बात करते हैं। समान आचार संहिता को नहीं मानते, फिर चाहे संविधान की किताब से कानून बना हो या सुप्रीम कोर्ट का आदेश हो। और हर उस चीज का विरोध करना जो देश के लिये अच्छी हो, या जिससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती हो। सच पूछिए तो केजरीवाल एक नई कांग्रेस पार्टी है और वो पार्टी जिसमें वामपंथी सोच भरी हुई है। अपनी बात मनवाने के लिये किसी भी हद तक जाने के लिये आम आदमी पार्टी तैयार है। और अब चुनाव आ चुका है। लोकसभा में सीटें पाने के लिये केजरीवाल किसी भी रास्ते को अख्तियार कर सकते हैं फिर चाहे वो हिंसा का रास्ता ही क्यों न हो।
Did You Know: अनुसूचित जाति के नेता व संविधान के निर्माता डा. भीम राव अम्बेडकर 1951 में हुए देश के पहले चुनाव में मुंबई संसदीय सीट पर हार गये थे। उन्हें काजरोलकर नाम के एक छोटे से नेता ने हराया था।












Click it and Unblock the Notifications