Jauhar by Padmini: क्या होता था जौहर, क्यों क्षत्राणियां दे देती थी अपने प्राणों की आहूति
राजस्थान अपनी आन, बान और शान के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां के वीरों ने अपने साहस और बलिदान का जो डंका बजाया है, वह जग जाहिर है। वीरता के मामले में राजस्थान की क्षत्राणियां भी कम नहीं थी। वह अपने पति को तिलक लगाकर और तलवार देकर युद्ध के लिए रवाना करती थी और अगर राजा युद्ध में हार जाते या वीरगति को प्राप्त हो जाते थे तो विधर्मी दुश्मनों की हवस से बचने के लिए वे आग की वेदी में अपना सर्वस्व कुर्बान कर देती थी। नारियों के इस साहसपूर्ण बलिदान को ही जौहर कहा गया है। अनेक अवसरों पर जब वीरांगनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए 'जय हर-जय हर' कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि में प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर 'जौहर' बन गया।

भारतीय नारियों की पवित्रता के आगे संसार नतमस्तक
भारतीय नारियों की इसी पवित्रता और श्रेष्ठता के स्वरूप के आगे संपूर्ण संसार नतमस्तक हैं। क्रूरतम विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त करने वाले वीरों के परिवार की महिलाएं क्रूर और हवशी विधर्मियो के हाथों बंदी बनकर उनके अत्याचार सहने से बेहतर अपनी जान देना समझती थीं। अपनी जान देकर अपने सम्मान की रक्षा करते हुए जो जौहर राजस्थान की नारियों ने किये, वे इतिहास में अद्वितीय व अकल्पनीय हैं। विश्व की किसी भी सभ्यता और समाज के इतिहास में नारियों की इस प्रकार की वीरता का वर्णन नहीं मिलता। भारत और खासकर राजस्थान की नारियों की पवित्रता और शौर्य का इतिहास आज भी अमिट अक्षरों में लिखा मिलता है।
जौहर की गाथाओं में रानी पद्मिनी का नाम सबसे ऊपर
जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित और इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाने वाला पवित्रता और शौर्य का अमिट अध्याय चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है। जिन्होंने अपनी आन, बान और शान की रक्षा के लिए धधकती ज्वाला में प्राणों की आहुतियां देकर चित्तौड़ के किले में जौहर किया था। जिस जौहर की कल्पना से सामान्य जनमानस का मन सिहर उठता है, तब मन में मां पद्मिनी और उन वीर-वीरांगनाओं को लेकर श्रद्धा के भाव पैदा होते हैं। ऐसी जौहर स्थली किसी तीर्थ से कम नहीं है।
पद्मिनी सहित हजारों नारियों ने दी थी अपने प्राणों की आहूति
पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थीं। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहल द्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बना कर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहल द्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर पद्मिनी को चित्तौड़ की रानी बनाकर ले आया। पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी के पास भी पहुंची। वह उसे किसी तरह से प्राप्त करना चाहता था। उसने चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा। पर रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। युद्ध में अलाउद्दीन खिलजी के हजारों सैनिकों को मारकर राव रतनसिंह तथा उनके सैनिक भी बलिदान हो गए। जब रानी पद्मिनी को यह पता लगा तो उन्होंने जौहर का निर्णय लिया।
26 अगस्त 1303 को मां पद्मिनी और किले में उपस्थित तकरीबन 16 हजार नारियों ने संपूर्ण श्रृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। 'जय हर-जय हर' का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम मां पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर सभी वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। अलाउद्दीन जीवन में पद्मिनी के दर्शन नहीं कर पाया। युद्ध जीतकर जब अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा में किले में घुसा तो वहां जलती चिताएं देखकर हाथ मलता रह गया।
रानी पद्मावती पर बनी फिल्म का हुआ था विरोध
पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी को लेकर बॉलीवुड निर्देशक संजय लीला भंसाली ने फिल्म पद्मावती का निर्माण किया था। लेकिन फिल्म मे इतिहास के साथ तोड़-मरोड़ के आरोप लगाते हुए राजस्थान सहित अनेक राज्यों में विरोध प्रदर्शन किया गया था। जिसके बाद फिल्म का नाम बदलकर पद्मावत कर दिया गया। फिल्म में पद्मावती के रोल में दीपिका पादुकोण, राजा रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर और रणवीर सिंह ने अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म 1 दिसंबर 2017 को रिलीज हुई थी।












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