Disinvestment: क्या होता है विनिवेश, जिससे मोदी सरकार ने अब तक कमाए 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा
2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार ने कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी सरकारी उद्यमों (PSUs) में लगातार अपनी हिस्सेदारी कम की है। लेकिन विनिवेश की यह प्रक्रिया तीस से अधिक वर्षों से चल रही है।

वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भी केंद्र सरकार ने विनिवेश यानी डिसइन्वेस्टमेंट के जरिये 65 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। बीते कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने एयर इंडिया, एलआईसी जैसे कई उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया को मंजूरी दी है।
क्या होता है डिसइन्वेस्टमेंट?
जब केंद्र सरकार अपने स्वामित्व या साझीदारी वाले किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम से अपनी हिस्सेदारी को बेचती या कम करती है, तो इस प्रक्रिया को विनिवेश यानी डिसइन्वेस्टमेंट कहा जाता है। बड़े निवेशक या सरकारें आमतौर पर विनिवेश का फैसला घाटे में चल रहीं कंपनियों के लिए ही करती हैं। वैसे, विनिवेश के लिए यह कोई तय नियम नहीं है। कई बार सरकारें अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए ऐसी कंपनी को भी बेचने का फैसला लेती हैं, जो मुनाफे में चल रही होती है। आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता है, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार इस मामले में थोड़ा अलग सोच रखती है।
जब पीएम ने कहा सरकार का काम बिजनेस करना नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निजीकरण पर आयोजित एक वेबिनार में कहा था कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है। सरकार का काम देश में व्यापार को सहारा देना है। उन्होंने कहा था कि सरकारी कंपनियों को केवल इसलिए नहीं चलाना चाहिए कि वो विरासत में मिली हैं। सरकार को खुद कोई व्यापार करने की जरूरत नहीं है। पीएम मोदी ने निजीकरण पर अपना रुख साफ करते हुए कहा था कि उनकी सरकार रणनीतिक क्षेत्र में कुछ सीमित संख्या में सरकारी उपक्रमों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों के सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण को प्रतिबद्ध है।
कब हुई थी डिसइन्वेस्टमेंट की शुरुआत?
1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के नेतृत्व में देश में उदारीकरण की शुरुआत हुई थी। उस दौरान सरकारी स्वामित्व की 31 कंपनियों में विनिवेश कर 3,038 करोड़ रुपये जुटाए गए थे। तत्कालीन सरकार ने उदारीकरण के रास्ते पर चलते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी निवेश कम करने, निजी कंपनियों को बढ़ावा देने जैसे कई फैसले लिए थे। आज भी कांग्रेस उदारीकरण को अपने एक बड़े फैसले के तौर पर गर्व से पेश करती रहती है।
क्यों किया जाता है विनिवेश?
सरकारें आमतौर पर पब्लिक सेक्टर की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को कम करने की कोशिश करती हैं। सरकारें घाटे वाली या बीमारू कंपनियों और मुनाफा न देने वाली कंपनियों में अपना स्वामित्व खत्म कर उन्हें निजी हाथों में दे देती हैं। वहीं, विनिवेश के तहत जुटाई गई रकम को सरकारें जनहित की योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में खर्च करने के लिए भी इस्तेमाल करती हैं।
विनिवेश और निजीकरण में अंतर
विनिवेश के तहत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में अपना एक निश्चित हिस्सा बेचती हैं। जिसके चलते कंपनी पर सरकार का नियंत्रण बना रहता है। वहीं, निजीकरण में सरकार अपनी ज्यादातर हिस्सेदारी निजी कंपनियों को बेच देती है। जिसके चलते कंपनी का स्वामित्व निजी हाथों में चला जाता है। उदाहरण के तौर पर एयर इंडिया में विनिवेश की प्रक्रिया पूरी होने पर यह कंपनी फिर से टाटा के स्वामित्व वाली हो गई है।
मोदी सरकार ने कमाए 4.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा
यूपीए सरकार के 10 सालों के कार्यकाल के दौरान भी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया जारी थी। यूपीए सरकार के दौरान 1.32 लाख करोड़ का डिसइन्वेस्टमेंट किया गया था। वहीं, 2014 से बीते साल दिसंबर तक मोदी सरकार ने विनिवेश और पब्लिक सेक्टर यूनिट में हिस्सेदारी बेचकर 4.04 लाख करोड़ से ज्यादा रुपये की कमाई की है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने एचएएल लाइफकेयर लिमिटेड, पवनहंस, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसी कई कंपनियों में विनिवेश के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं।
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